भारत का आर्थिक इतिहास (Economic history of India) Part 1

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धन का निष्कासन

धन का निष्कासन के संबंध में सर्वप्रथम दादा भाई नौरोजी ने अपने पत्र ’पोवर्टी (दरिद्रता) एंड (और) अनब्रिटश रूल (नियम)- इन इंडिया’ (भारत में) में अपने विचार रखे। वह धन जो भारत से इंग्लैंड को भेजा जाता था और जिसके बदले भारत को कुछ प्राप्त नहीं होता था, संपदा का निष्कासन कहलाया। इसका एक माध्यम ’अतिरिक्त निर्यात व्यापार’ था। भारत से प्राप्त होने वाले धन से ही माल खरीदकर अंग्रेज व्यापारी उन्हें इंग्लैंड और दूसरी जगहों में भेजते थे। इस प्रकार अंग्रेज दोनों तरह से संपत्ति प्राप्त कर रहे थे। व्यापार से भारत को किसी प्रकार का धन प्राप्त नहीं होता था। इसके अतिरिक्त भारत से स्वदेश वापस जाने वाले अंग्रेज भी अपने साथ पर्याप्त धन ले जाते थे। कंपनी (संघ) के कर्मचारी वेतन, भत्ते, पेंशन आदि के रूप में पर्याप्त धन इकट्‌ठा कर इंग्लैंड ले जाते थे। यह धन सिर्फ सामान के रूप में ही नहीं था, बल्कि धातु (सोना, चाँदी) के रूप में भी पर्याप्त धन इंग्लैंड भेजा गया। इस धन-निर्गम को इंग्लैंड एक ’अप्रत्यक्ष उपहार’ समझकर प्रतिवर्ष भारत से साधिकार ग्रहण करता था। भारत से कितना धन इंग्लैंड ले जाया गया इसका सही अनुमान लगाना कठिन है। सरकारी आँकड़ों में दी गई राशि से भी अधिक धन अंग्रेज भारत से ले जाने में सफल रहे। इस संपदा-निष्कासन का भारत की अर्थव्यवस्था पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा। धन निष्कासन के प्रमुख स्त्रोत की पहचान निम्नरूप से की गई थी:

  • कंपनी (संघ) के कर्मचारियों का वेतन, भत्ता एवं पेंशन।

  • बोर्ड (परिषद) ऑफ (के) कंट्रोल (नियंत्रण) एवं बोर्ड (परिषद) ऑफ डायरेक्टर्स (निर्देशक) के वेतन एवं भत्ते।

  • 1858 के बाद कंपनी की सारी देनदारियां।

  • उपहार से प्राप्त धन।

  • कर्मचारियों दव्ारा किए जा रहे निजी व्यापार से प्राप्त लाभ।

  • साम्राज्यवाद के विस्तार में भारतीय सेना का उपयोग एवं रक्षा बजट का बोझ भारत पर (20वीं सदी के प्रारंभ में यह रक्षा बजट 52 प्रतिशत तक चला गया था)

  • रेल जैसे उद्योग में धन लगाने वाले पूंजीपतियों को निश्चित लाभ का दिया जाना, आदि।

इस संपदा-निष्कासन का परिणाम भारत के लिए बुरा साबित हुआ। दादाभाई नौरोजी ने इसे ’अंग्रेजों दव्ारा भारत का रक्त चूसने’ की संज्ञा दी। अन्य राष्ट्रवादी इतिहासकारों और व्यक्तियों ने भी अंग्रेजों की इस नीति की तीखी आलोचना की है। इतिहासकारों का एक वर्ग (साम्राज्यवादी विचारधारा से प्रभावित) इस बात से इनकार करता है कि अंग्रेजों ने भारत का आर्थिक शोषण किया। उनका तर्क है कि इंग्लैंड को जो धन प्राप्त हुआ वह भारत की सेवा करने के बदले प्राप्त हुआ। जॉन स्ट्रेची का विचार था कि भारत में उत्तम प्रशासनिक व्यवस्था, कानून और न्याय की स्थापना के बदले ही इंग्लैंड भारत से धन प्राप्त करता था। किन्तु इस तर्क में दम नहीं है। यह निर्विवाद है कि अंग्रेजों ने भारत का आर्थिक शोषण किया। सरकारी आर्थिक नीतियों के कारण संपदा का निष्कासन कर भारत को दरिद्र बना दिया गया। संपदा के निष्कासन के परिणामस्वरूप भारत में ’पूँजी संचय’ नहीं हो सका, जीवन-स्तर लगातार गिरता गया, गरीबी बढ़ती गई। यह बात इससे स्पष्ट हो जाती है कि 19वीं-20वीं शताब्दी में भारत में अनेक दुर्भिक्ष पड़े, जिनमें लाखों व्यक्तियों को अपने प्राण गँवाने पड़े। परिणामस्वरूप, निर्धनता में वृद्धि हुई। राजस्व का बहुत ही कम भाग ग्रामों पर खर्च किया गया। धन-निष्कासन के कारण जनता पर करों का बोझ अत्यधिक बढ़ गया। इसके साथ-साथ भारत के कुटीर उद्योगों का विनाश हुआ, भूमि पर अधिक दवाब बढ़ता गया और भूमिहीन कृषि मजदूर की संख्या में वृद्धि हुई। भारत की इस विपन्नता के लिए धन-निष्कासन उत्तरदायी था।