भारत का आर्थिक इतिहास (Economic history of India) Part 2

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भारतीय हस्तक्षिल्प का हृास

1813 के चार्टर (राज-पत्र) एक्ट (अधिनियम) दव्ारा ब्रिटिश नागरिकों को भारत से व्यापार करने की छूट मिलने के फलस्वरूप भारतीय बाजार सस्ते एवं मशीन (यंत्र) निर्मित आयात से भर गया। दूसरी ओर, भारतीय उत्पादों के लिये यूरोपीय बाजारों में प्रवेश करना अत्यंत कठिन हो गया। 1820 के पश्चात्‌ तो यूरोपीय बाजार भारतीय उत्पादों के लिए लगभग बंद ही हो गए। भारत में रेलवे के विकास ने यूरोपीय उत्पादों को भारत के दूर दराज के क्षेत्रों तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी।

भारत में परंपरागत हस्तशिल्प उद्योग का हृास इसलिये नहीं हुआ कि यहां औद्योगकीकरण या औद्योगिक क्रांति हुयी। बल्कि यह हृास अंग्रेजी माल के भारतीय बाजारों में भर जाने से हुआ क्योंकि भारतीय हस्तशिल्प, अंग्रेजों के सस्ते माल का मुकाबला नहीं कर सका। लेकिन इस अवधि में यूरोप के अन्य देशो के परंपरागत हस्तशिल्प उद्योग में भी गिरावट आयी पर इसका कारण वहां कारखानों का विकसित होना था। यह वह समय था जहां एक ओर भारतीय हस्तशिल्प उद्योग तेजी से पतन की ओर अग्रसर था तथा वह अपनी मृत्यु के कगार पर पहुंच गया था, वहीं दूसरी ओर इस काल में इंग्लैंड में औद्योगिक क्रांति तेजी से अपने पैर जमा रही थी तथा देश का तेजी से औद्योगीकरण हो रहा था। इस समय भारतीय शिल्पकार एवं दस्तकार पर्याप्त सरंक्षण के अभाव में विषम परिस्थितियों के दौर से गुजर रहे थे। वहीं नये पाश्चात्य अनुप्रयोगों तथा तकनीक ने उनके संकट को और गंभीर बना दिया।

अनौद्योगीकरण का एक और नकारात्मक प्रभाव था- भारत के अनेक शहरों का पतन तथा भारतीयों शिल्पियों का गांवों की ओर पलायन। अंग्रेजों की शोषणकारी तथा भेदभावमूलक नीतियों के कारण बहुत से भारतीय दस्तकारों ने अपने परंपरागत व्यवसाय को त्याग दिया तथा वे गांवों में जाकर खेती करने लगे। (बंगाल में कंपनी शासन के दौरान दस्तकारों एवं शिल्पकारों को बहुत कम दरों पर काम करने तथा अपने उत्पाद अत्यंत कम मूल्यों पर बेेचने हेतु विवश किया गया) इससे भूमि पर दबाव बढ़ा। अंग्रेज सरकार की कृषि विरोधी नीतियों के कारण यह क्षेत्र पहले से ही संकटग्रस्त था और भूमि पर दबाव बढ़ने के कारण ग्रामीण अर्थव्यवस्था बिल्कुल चरमरा गयी। भारत एक निर्यातक देश से संपूर्ण आयातक देश बन गया।