गाँधी युग (Gandhi Era) Part 11 for Competitive Exams

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बारदोली सत्याग्रह

1928 ई. में सरदार वल्लभभाई पटेल के नेतृत्व में संचालित बारदोली सत्याग्रह किसानों का एक प्रमुख आंदोलन था। बारदोली में किसानों की स्थिति अत्यंत दयनीय थी और इसका एक प्रमुख कारण था, वहाँ प्रचलित बंधुआ मजदूरी व्यवस्था, जिसे ’हाली व्यवस्था’ कहा जाता था। जो जमींदार थे, उन्हें ’उजली पराज’ या स्वेतजन कहा जाता था और रैयतों को ’काली पराज’ या अस्वेतजन। हाली व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाने में प्रमुख भूमिका निभाने वाले थे-कुंवर जी मेहता, केसवजी गणेशजी, नरहरि पारिख तथा जगत राम दावे। बारदोली ताल्लुके में 60 गांव को बामनी गांव कहा गया और यहां के किसानों ने हि वल्लभभाई पटेल को अपने आंदोलन को नेतृत्व देने के लिये आमंत्रित किया। इससे पूर्व मार्च, 1927 ई. में भीमभाई नायक तथा शिवदासाणी किसानों के प्रतिनिधि के रूप में बंबई में राजस्व परिषद के सदस्यों से मुलाकात कर चुके थे। 1928 ई. कि जनवरी में पटेल आमंत्रित किए गए और 4 फरवरी, 1928 ई. को बारदोली पहुंचे। उन्होंने कर वृद्धि पर प्रस्तावों के खिलाफ आंदोलन का संगठन तथा नेतृत्व किया। 2 अगस्त, 1928 ई. तक गांधी जी भी बारदोली पहुंच गए। कई महिलाओं ने इस आंदोलन में भाग लिया, जैसे-मिठु बेन, भक्तिबा, मणिबेन पटेल, शारदा बहना आदि। पटेल तथा गांधी जी के नेतृत्व से प्रेरित होकर बारदोली के किसानों ने सभी तरह के खतरे उठाकर भी कर न देने का आंदोलन चलाया। मजबूर होकर ब्रिटिश सरकार ने भ्रूम (झाडू) फिल (महसूस) तथा मैक्सवेल के अधीन एक जांच आयोग बनाया जिसकी सिफारिशों के आधार पर राजस्व में भारी कमी की गई।

साइमन कमीशन (आयोग)

1919 के अधिनियम में इस बात की व्यवस्था की गई थी कि 10 वर्ष बाद सरकार एक कमीशन का गठन करेगी, जो अधिनियम में परिवर्तन की संभावनाओं पर विचार करेगा। इस व्यवस्था के अनुसार कमीशन का गठन 1919 में किया जाना था। किन्तु भारत में बढ़ती राष्ट्रीय चेतना को ध्यान में रखते हुए कमीशन दो वर्ष पहले ही नियुक्त कर दिया गया। सर जॉन साइमन की अध्यक्षता में नियुक्त इस कमीशन के सभी 6 सदस्य अंग्रेज थे। कमीशन में किसी भारतीय को शामिल न किए जाने के कारण अधिकांश भारतीय राष्ट्रीय नेताओं ने इसके बहिष्कार का फैसला किया। 1927 में मद्रास में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ, जिसमें साइमन कमीशन के विरोध का निर्णय किया गया। साइमन कमीशन भारत में जहां भी गया इसके विरोध में हड़ताल, विरोध सभाएँ, प्रदर्शनों तथा काले झंडे दिखाने का आयोजन किया गया। लाहौर में लाला लाजपत राय तथा लखनऊ में पंडित जवाहरलाल नेहरू और गोविंद वल्लभ पंत साइमन कमीशन के खिलाफ प्रदर्शन करते हुए पुलिस लाठी चार्ज में घायल हो गए।

साइमन कमीशन की रिपोर्ट जून, 1930 को प्रकाशित हुई। रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएँ निम्न थीं-

  • भारत के लिए एक संघीय संविधान की व्यवस्था हो।

  • केन्द्र में भारतीयों को कोई उत्तरदायित्व न दिया जाए।

  • प्रांतों में पूर्ण स्वायत्ता लागू की जाए।

  • गवर्नर के अधिकार पूर्ववत बने रहे जबकि गवर्नर जनरल के अधिकारों में वृद्धि की जाए।

  • भारतीय विषयों पर विचार विमर्श के लिए एक कौंसिल (परिषद) की स्थापना की जाए जिसमें भारतीयों राज्यों तथा ब्रिटिश भारत के प्रतिनिधि हों।

  • प्रांतीय विधान सभाओं के सदस्यों की संख्या में वृद्धि की जाए।

  • उच्च न्यायालय को भारत सरकार के अधीन कर दिया जाए।

  • प्रांतों में दव्ैध शासन व्यवस्था-समाप्त की जाए।

  • मुस्लिमों को विशेष प्रतिनिधिक्व दिया जाए।

  • सेना का भारतीयकरण किया जाए।

  • भारत सचिव के कौंसिल के सदस्यों की संख्या तथा उसके अधिकारों में कमी कर दी जाए।

  • उड़ीसा को बिहार से अलग कर स्वतंत्र राज्य का दर्जा दिया जाए।

  • बर्मा को भारत से अलग किया जाए।

  • मताधिकार का विस्तार कर उसे कुल जनसंख्या का कम से कम 10 से 15 प्रतिशत तक ले जाया जाए।

रिपोर्ट (विवरण) प्रकाशन से पूर्व कमीशन ने उस पर विचार के लिए गोलमेज सम्मेलन बुलाने का सुझाव दिया था। नवंबर, 1930 में यह गोलमेज सम्मेलन बुलाया गया।

साइमन कमीशन की उपलब्धि यह रही कि इसके कारण भारतीय दलों के मतभेद कम हुए तथा राष्ट्रीय आंदोलन को गति मिली। संवैधानिक विकास की दृष्टि से इसका कोई खास महत्व नहीं है।

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