गाँधी युग (Gandhi Era) Part 13

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सविनय अवज्ञा आंदोलन

उत्तेजनापूर्ण और क्षुब्ध वातावरण में लाहौर में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ। 1929 ई. के 31 दिसंबर को अर्द्धरात्रि के समय रावी नदी के किनारे कांग्रेस अधिवेशन में स्वतंत्रता प्रस्ताव पारित हुआ, जिसमें औपनिवेशक स्वराज्य का अर्थ पूर्ण स्वतंत्रता बताया गया अर्थात्‌ कांग्रेस का उद्देश्य औपनिवेशक स्वराज्य न होकर पूर्ण स्वराज्य बनाया गया। कांग्रेस को कार्यसमिति में 1930 ई. की 2 फरवरी की बैठक में 26 जनवरी को प्रतिवर्ष स्वतंत्रता दिवस मनाने का निश्चय किया गया।

सविनय अवज्ञा आंदोलन के कारण

  • ब्रिटिश सरकार ने नेहरू रिपोर्ट को अस्वीकार कर दिया। भारतीयों के लिए संघर्ष या आंदोलन करने के अतिरिक्त दूसरा कोई चारा नहीं रहा।

  • विश्व में फैली आर्थिक मंदी से भारत अछूता नहीं रहा। इसके फलस्वरूप देश की आर्थिक स्थिति शोचनीय हो गई थी।

  • औद्योगिक तथा व्यावसायिक वर्ग के लोग सरकार की नीति से असंतुष्ट थे। कल-कारखानों में हड़ताल का ताँता लग गया था। मजदूरों में बड़ी उत्तेजना फैली हुई थी।

  • सारे देश में असंतोष की लहर फैल रही थी और हिंसात्मक आंदोलन बढ़ रहा था। फरवरी, 1930 में कांग्रेस की कार्यकारिणी ने गांधी जी को सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू करने का अधिकार प्रदान किया।

आंदोलन का कार्यक्रम

  • नमक कानून तथा ब्रिटिश कानूनों का उल्लंघन।

  • कानूनी अदालतों, सरकारी विद्यालयों महाविद्यालयों एवं सरकारी समारोहों का बहिष्कार।

  • भू-राजस्व लगान तथा अन्य करों की अदायगी पर रोक।

  • शराब तथा अन्य मादक पदार्थों का विक्रय करने वाली दुकानों पर शांतिपूर्ण धरना।

  • विदेशी वस्तुएं एवं कपड़ों का बहिष्कार।

  • सरकारी नौकरियों का त्याग।

सरकार की कठोर नीति

आंदोलन के दमन के लिए सरकार ने कठोर नीति अपनाई। हर जगह गिरफ्तारी, लाठी-चार्ज, घुड़सवारों दव्ारा लोगों को घोड़ें के टापों के नीचे कुचलना आदि सरकारी कार्यक्रम बन गए थे। सरकारी आँकड़ों के अनुसार 29 बार गोलियां चलाई गई, जिनसे 110 व्यक्ति मारे गए और 420 घायल हुए। एक साल से कम समय में 90 हजार व्यक्ति जेल गए। पुलिस की ज्यादत्तियां इतनी बढ़ गई थी कि विद्यार्थियों को विद्यालय में घेरकर एवं कक्षाओं में घुसकर पिटा जाता था। सामान्यत: आंदोलन अनुशासित था, लेकिन सरकार का सत्याग्रहियों के साथ व्यवहार अत्यंत पाशविक तथा अमानवीय था। नमक कानून भंग करने के अतिरिक्त विदेशी वस्त्रों और मादक द्रव्यों का बहिष्कार किया गया था और शराब की दुकानों पर पिकेटिंग (धरना) की गई थी। देश में तेरह अध्यादेश जारी किए गए। जनता को तरह-तरह से उत्पीड़ित किया गया। लेकिन इस कठोर दमनकारी नीति के बावजूद सविनय अवज्ञा आंदोलन शिथिल नहीं पड़ा।

आंदोलन का परिणाम

1934 ई. के मध्य में सविनय अवज्ञा आंदोलन के समाप्त हो जाने से अनेक कांग्रेसी नेता तथा स्वयंसेवक प्रसन्न नहीं हुए। उन लोगों का यह कहना था कि इस आंदोलन का परिणाम नगण्य रहा। लेकिन उन लोगों का यह सोचना गलत था। इस आंदोलन ने भारतीय जनता के हृदय में आत्मविश्वास पैदा किया और स्वतंत्रता के लिए मर-मिटने की भावना पैदा की। यह एक बड़ी उपलब्धि थी। भारतीय राष्ट्रीयता पूर्ण रूप से जागृत हो गई थीं। 1935 ई. का अधिनियम इसी का परोक्ष परिणाम था।