गाँधी युग (Gandhi Era) Part 14

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दांडी यात्रा (नमक सत्याग्रह)

26 जनवरी, 1930 के दिन सारे देश में स्वतंत्रता दिवस मनाया गया। 2 मार्च, 1930 को महात्मा गांधी के नेतृत्व में सविनय अवज्ञा आंदोलन चलाया गया। गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन का शुभारंभ नमक कानून का उल्लंघन कर किया। उन्होंने समुद्र तट पर स्थित दांडी जाकर नमक कानून तोड़ने का निश्चय किया और वायसराय को उचित चेतावनी देकर वे सेवाग्राम से 78 साथियों के साथ 375 किलोमीटर दूर स्थित दांडी चल पड़े। 1930 ई. के 12 मार्च को गांधी जी ने दांडी के लिए प्रस्थान किया और वे 6 अप्रैल को पहुँचे। यह घटना दांडी यात्रा के नाम से विख्यात है। मार्ग में जनता ने सत्याग्रहियों का शानदार स्वागत किया। ’बांबे क्राॅंनिकल (इतिहास)’ में इस घटना का वर्णन इस प्रकार किया गया ’इस महान राष्ट्रीय घटना से पहले, उसके साथ-साथ और बाद में जो दृश्य देखने में आए वे इतने उत्साहपूर्ण, शानदार और जीवन फूँकने वाले थे कि उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। इस महान अवसर पर भारतीयों के हृदय में देश प्रेम की जितनी प्रबल धारा बह रही थी उतनी पहले कभी नहीं बही थी। यह एक महान आंदोलन का महान प्रारंभ था और निश्चय ही भारत की राष्ट्रीय स्वतंत्रता के इतिहास में इसका महत्वपूर्ण स्थान होगा।’ 6 अप्रैल को प्रात: काल गांधी जी दांडी पहुँचे और वहाँ उन्होंने नमक कानून तोड़ा। इसी प्रकार, देश के विभिन्न भागों में नमक कानून भंग करने का आंदोलन चल पड़ा। आम लोगों ने भी नमक कानून का उल्लंघन किया। किसानों ने भू-राजस्व देना बंद कर दिया। पूर्वी भारत में चौकीदारी कर देना भी अस्वीकार किया गया।

इस आंदोलन की विशेषता यह थी कि इसमें हजाराेें की संख्या में स्त्रियों ने भी भाग लिया। सरकार का दमन चक्र भी तेजी से चल पड़ा। 6 मई की रात को गांधी जी गिरफ्तार कर लिए गए। उनकी गिरफ्तारी से देश में बिजली की तरह प्रतिक्रिया हुई। बंबई में पंचास हजार मजदूरों ने प्रदर्शन में भाग लिया। बंबई, कलकत्ता तथा अन्य महत्वपूर्ण स्थानों में हड़तालें हुई। व्यवसायी वर्ग ने छह दिनों तक हड़तालें रखी। शोलापुर में पुलिस चौकियाँ जला दी गई। हावड़ा और पँचतल्ला में विरोध प्रदर्शन हुए, धरसाना के सत्यग्राहियों में जबरदस्त धावा बोल दिया। वस्तुत: गांधी की गिरफ्तारी का प्रभाव विश्वव्यापी हुआ। पनामा के भारतीयों ने पच्चीस घंटे तक हड़ताल जारी रखी, नैरोबी के भारतीयों ने भी हड़तालें की। सुमात्रा के पूर्वी समुद्रवासी भारतीयों ने खेद प्रकट किया। उत्तरी, पश्चिमी सीमांत प्रदेश में भी खान अब्दुल गफ्फार खांंँ तथा उनके अनुयायियों ने इस आंदोलन में भाग लिया।