गाँधी युग (Gandhi Era) Part 21

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1942 ई. की अगस्त क्रांति

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के इतिहास में 1942 ई. की अगस्त क्रांति एक महत्वपूर्ण स्थान रखती है। इस क्रांति ने भारत में ब्रिटिश साम्राज्यवाद की नींव हिला दी और यह सिद्ध कर दिया कि स्वाधीनता के चमकीले प्रकाश के लिए भारतवासी मर मिटने को तैयार हैं।

क्रांति के कारण

एक लेखक के अनुसार, ’यदि हम संसार की क्रांतियों का अध्ययन करें तो हमें मालूम होगा कि वे एकाएक पैदा नहीं हो जाती। उनके अधिकांश कारण पूर्ववर्ती होते हैं। देखने में तो ऐसा विदित होता है कि वातावरण शांत है किन्तु भीतर-भीतर आग सुलगती रहती है और उपयुक्त अवसर पाते ही वह विस्फोट की भांति फूटकर क्रांति में परिवर्तन हो जाती है।’

1942 ई. की अगस्त क्रांति के भी अनेक पूर्ववती कारण थे। उनमें प्रमुख थे-

  • क्रिप्स मिशन की असफलता - इसकी असफलता से यह स्पष्ट हो गया कि ब्रिटिश सरकार भारतीय समस्या के समाधान के लिए प्रयत्नशील नहीं है। क्रिप्स योजना की असफलता के बाद भारतीय स्वतंत्रता का अध्याय बंद कर दिया गया था और सरकार ने कठोर दमनकारी नीति अपनाई थी। इससे देश में नैराश्य और उत्साह हीनता छा गई थी। इस स्थिति में कांग्रेस के समक्ष आंदोलन चलाने के सिवा कोई दूसरा चारा नहीं था।

  • प्रारंभ में युद्ध में ब्रिटिश सरकार की असफलता - ब्रिटिश सरकार युद्ध में जापान का मुकाबला सफलतापूर्वक नहीं कर सकी। मलाया, सिंगापुर, बर्मा आदि देशों में ब्रिटिश फौजों को पीछे हटना पड़ा, जिससे भारतीयों को विश्वास हो गया कि ब्रिटेन भारत की रक्षा नहीं कर सकता।

  • अंग्रेजों का लज्जापूर्ण व्यवहार - युद्ध के नाम पर सरकार देश में साम्राज्यवाद का नाटक खेल रही थी। देश में भ्रष्टाचार और कालाबाजारी का बाजार गर्म था। इससे जनता में विदेशी सरकार के प्रति असंतोष फैला हुआ था। 27 जुलाई को ब्रिटिश सरकार ने लंदन से एक घोषणा की कि भारत को युद्ध का अड्‌डा बनाया जाएगा और उसके लिए आवश्यक कार्यवाही की जाएगी।

भारतीय नेता इससे बहुत क्षुब्ध हुए और इस घोषणा के लगभग बारह दिनों के बाद भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ।

अगस्त क्रांति के धीमा पड़ जाने के कारण

  • विद्रोहियों के बीच समन्वय का अभाव।

  • संगठन का अभाव।

  • निश्चिय कार्य प्रणाली का अभाव।

  • समृद्ध व्यक्तियों एवं पूँजीपतियों का असहयोग।

  • सरकार की तीव्र दमनकारी नीति।

  • बड़े नेताओं की गिरफ्तारी

  • योग्य नेतृत्व का अभाव।

  • दूसरे स्तर के नेताओं एवं जनता के मध्य संपर्क का अभाव।

क्रांति का आरंभ और विस्तार

नेताओं की गिरफ्तारी से देश में जनविप्लव शुरू हो गया। सरकार विरोधी प्रदर्शन हुए। हड़ताल हुई, सभाएँ हुई और जुलूस निकले। सरकार के प्रति घृणा और रोष से उत्तेजित जनता ने हिंसात्मक मार्ग अपनाया। रेलों की पटरियाँ उखाड़ दी गई, और अग्निकांड, हत्या, तोड़फोड़ आदि शुरू हुए। टेलीफोन और टेलीग्राम (विद्युत यंत्र) की रेखाएं काट दी गई। सरकारी भवनों में आग लगा दी गई। जमशेदपुर, अहमदाबाद और बंबई में मजदूरों ने हड़ताल कर दी। विद्यालय और महाविद्यालय बंद हो गए। रेलों का चलना बंद हो गया। ऐसा प्रतीत होने लगा कि देश के कई भागों में पूर्वी उत्तरप्रदेश में बलिया, बंगाल के मिदनापुर में स्थित तामलुक तथा महाराष्ट्र के सतारा में ब्रिटिश शासन का अंत हो गया और समनांतर सरकारें बैठा दी गई। कई जगह जेलों पर भी आक्रमण हुए और अनेक केदी जेल से निकलकर भाग गए।

अगस्त क्रांति के परिणाम

1942 ई. की अगस्त क्रांति भारतीय राष्ट्रीयता के इतिहास में विशेष महत्वपूर्ण है। सरकार के कठोर दमनचक्र और नेताओं की बंदी के कारण आंदोलन असफल रहा। किन्तु, इससे क्रांति का महत्व कम नहीं होता है। इसने यह प्रमाणित कर दिया कि अब अधिक दिनों तक भारत में ब्रिटिश शासन कायम नहीं रह सकता। सरकार को यह पता चल गया कि भारतीय जनता में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध व्यापक असंतोष है और भारत में ब्रिटिश शासन को कायम रखने के एक समुचित पृष्ठभूमि तैयार कर दी। क्रांति में भारतीय जनता ने अपूर्व साहस और धैर्य का परिचय दिया। लाखों युवक मातृभूति की स्वतंत्रता हेतु मर मिटने को तैयार हो गए। इससे स्पष्ट हो गया था कि राष्ट्रीयता की भावना अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच चुकी है और ऐसी स्थिति में ब्रिटिश शासन का कायम रहना संभव नहीं है।

सरकार का दमन चक्र

ब्रिटिश सरकार ने क्रांति के दमन की नीति अपनाई। फौजी दस्ते सारे देश में दौड़ा दिए गए। जनता को मशीनगनों (यंत्र बंधूक) और गोलियों का शिकार बनाया गया। पुलिस ने तपती धूप में खड़ा कर लोगों पर गोली चला देना, उन्हें नंगा कर पेड़ों में उल्टा टांग देना और कोड़े मारना जैसे कार्यो को जनता को आतंकित करने के लिए अपनाए। पुलिस एवं सैनिकों की गोली से हजारों व्यक्तियों की जान गई। सैकड़ों-हजारों स्त्री पुरुषों को कोड़ों से पीटा गया। सैकड़ों गांवों पर सामूहिक दंड लगाए गए। सचमुच ब्रिटिश अधिकारियों का दमनचक्र अपने अंतिम बिन्दु पर पहुँच गया था। पटना सचिवालय पर राष्ट्रीय झंडे फहराते समय सात छात्र गोली के शिकार हुए। इस प्रकार सरकार की दमनकारी नीति पराकाष्ठा पर पहुँच गई थी। इतना ही नहीं, देश के कुछ हिस्सों में अप्राकृतिक अकाल उत्पन्न कर दिया गया। प्रारंभ होने के छह महीने के बाद क्रांति की गति धीमी पड़ गई, यद्यपि कुछ नेता गुप्त रूप से आंदोलन चलाते रहे।