गाँधी युग (Gandhi Era) Part 25 for Competitive Exams

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कैबिनेट (मंत्रिमंडल) मिशन (लक्ष्य) योजना

24 मार्च, 1946 को कैबिनेट मिशन भारत आया। इसका उद्देश्य युद्ध बाद भारत के लिए कुछ सुधारों की घोषणा करना था। संवैधानिक विकास की दृष्टि से इन सुधारों का काफी महत्व है। इसके निम्न सुझाव थे- भारत में एक संघ की स्थापना, जिसमें देशी नरेश भी शामिल होंगे। सांप्रदायिक प्रश्न उस संप्रदाय के सदस्यों दव्ारा ही सुलझाए जाएं। प्रांत परस्पर मिलकर गुट बना सकेंगे। एक अंतरिम सरकार का गठन, जिसमें सभी राजनीतिक दल शामिल हों, योजना में संविधान सभा के सदस्यों की संख्या तथा उनके निर्वाचन का तरीका भी बताया गया था। इसमें संविधान सभा को तीन भागों में विभक्त किया गया।

कैबिनेट मिशन योजना के प्रति सभी राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया सामान्यतया अनुकूल थी। महात्मा गांधी के मत में यह वर्तमान परिस्थितियों में ब्रिटिश सरकार दव्ारा प्रस्तुत सर्वोत्तम दस्तावेज था। कैबिनेट मिशन योजना के अंतर्गत भारतीय एकता को सुरक्षित रखने का प्रयास किया गया था। मिशन ने पाकिस्तान की मांग को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया था। एकल राष्ट्रवाद के अनिवार्य सिद्धांत का बलिदान किए बिना विभिन्न तत्वों को संतुष्ट करने का यह सफलतम प्रयास था। भारतीय राज्यों की दृष्टि से भी योजना अनुकूल थी। प्रस्ताव में राज्यों की जनता को मान्यता तथा महत्व दिया गया था।

अनेक विशेषताओं के बावजूद योजना दोषमुक्त नहीं थी। भारत विभाजन की मांग अस्वीकार करने के बाद भी परोक्ष रूप से पाकिस्तान की व्यवस्था थी। मुस्लिम लीग की पृथककरण की मांग को कांग्रेस की संयुक्त भारत की मांग के अनुरूप बनाने के प्रयास ने अखिल भारतीय परिसंघ के भीतर एक उप संघ के विचार को जन्म दिया। प्रांतों के समूहीकरण से संबंधित मिशन के प्रस्ताव की अस्पष्ट भाषा ने कांग्रेस तथा लीग के बीच विवाद को जन्म दिया। कैबिनेट योजना के प्रस्तावों के अंतर्गत प्रांतों का अनिवार्य वर्गीकरण सिक्खों के हितों के विपरीत था। सिक्खों को मुसलमानों की दया पर छोड़ दिया गया था। भारतीय राज्यों से संबंधित व्यवस्था भारतीय एकता और अखंडता के विरुद्ध थी। भारतीय राज्य भारत संघ में शामिल होने अथवा पृथक रहने के लिए स्वतंत्र थे।

प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस

शिमला सम्मेलन की असफलता के पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू कैबिनेट मिशन भारत आया। इसने अंतरिम सरकार की व्यवस्था की परन्तु पाकिस्तान की मांग को ठुकरा दिया। बदले में कांग्रेस और लीग दोनों ने मिशन को तो स्वीकार किया, परन्तु अंतरिम सरकार में शामिल होने के प्रश्न पर एक समस्या खड़ी हो गई। पहले कांग्रेस ने इसमें शामिल होना स्वीकार नहीं किया। इसलिए, लीग ने दावा किया कि वह कांग्रेस के बिना भी सरकार बना सकती है, परन्तु वायसराय कांग्रेस को अलग रखकर सरकार बनाने के पक्ष में नहीं थे इसलिए लीग के दावे को ठुकरा दिया। इस पर क्रोधित होकर लीग ने 27 जुलाई, 1946 को कैबिनेट मिशन की योजना को अस्वीकार कर दिया एवं 16 अगस्त, 1946 को पाकिस्तान के लिए सीधी कार्रवाई करने का निश्चय किया। बाद में जब कांग्रेस सरकार बनाने के लिए तैयार हुई तो नेहरू ने जिन्ना को भी सरकार में शामिल होने का सुझाव दिया, परन्तु वह अपनी जिद्द पर अड़े रहे।

16 अगस्त, 1946 को कलकता में भयानक दंगे हुए। लीगियों ने नारा लगाया ’लड़कर लेंगे पाकिस्तान’। इस सांप्रदायिक दंगे ने भीषण रूख अख्तियार किया जिसमें हजारों जानें गई। सुहरावर्दी की सरकार ने दंगों को दबाने की कोशिश नहीं की बल्कि सांप्रदायिक तत्वों को बढ़ावा दिया।

गांधी-जिन्ना वार्ता

देश की सांप्रदायिक समस्या को हल करने के लिए गांधी जी और जिन्ना में वार्ता आरंभ हुई। दो सप्ताह से अधिक समय तक चलने के पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू भी यह वार्ता असफल रही। गांधी जी ने सी. आर. फार्मूला की भांति पंजाब और असम के विभाजन की बात कही जिसे जिन्ना ने स्वीकार नहीं किया। जिन्ना दव्ारा मुसलमानों के पृथक कौम होने की बात गांधी जी ने नहीं मानी। गांधी जी बंटवारे को स्वीकार करने के लिए तैयार थे लेकिन उसी भांति जैसे एक संयुक्त परिवार के सदस्य पारिवारिक संपत्ति का बंटवारा करा लेते हैं। दोनों नेताओं में इस बात पर भी मतभेद था कि बंटवारा स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व हो अथवा बाद में। जिन्ना यह बंटवारा पहले चाहते थे गांधी जी बाद में। गांधी जी इस बात के इच्छुक थे कि दोनों राज्यों में कुछ सम्मिलित विषयों के प्रबंध की भी व्यवस्था हो इस वार्ता के असफल होने से पूरा लाभ जिन्ना को मिला। जहाँ एक और देश विभाजन की समस्या अधिक चर्चा का विषय बनी वहीं दूसरी और गांधी जी के साथ वार्ता के बाद जिन्ना का महत्व अधिक बढ़ा। मुस्लिम बहुसंख्यक प्रांतों के नेताओं के समक्ष भी अब कोई विकल्प नहीं रहा और वे जिन्ना के नेतृत्व को स्वीकार करने पर सहमत हो गए। उनके लिए जिन्ना के बढ़ते हुए महत्व को रोकना कठिन होता गया।

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