गाँधी युग (Gandhi Era) Part 6

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आंदोलन का आरंभ और प्रगति

1920 में इलाहाबाद की बैठक में कांग्रेस ने खिलाफत कमिटी (समिति) के साथ मिलकर असहयोग आंदोलन चलाने का निश्चय किया। बेेसेंट ने इस आंदोलन का विरोध किया। फिर 1920 ई. के दिसंबर में कांग्रेस के नागपुर सम्मेलन में इसे स्वीकृति दी गई।

जनवरी, 1921 से असहयोग आंदोलन प्रारंभ किया गया। यह आंदोलन अत्यंत ही संगठित रूप् से शुरू हुआ। यह पूर्णत: सत्य और अहिंसा पर आधारित था। गांधी ने अपनी उपाधि कैसर-ए-हिन्द वायसराय को लौटा दी। उन्होंने सारे देश का दौरा किया और इस कार्यक्रम का जनता के बीच प्रचार किया। आंदोलन आरंभ होते ही बहुत से विद्यार्थियों ने सरकारी विद्यालयों को त्याग दिया, सरकारी उपाधियों को लौटाने का सिलसिला प्रारंभ हो गया और हजारों वकीलों ने वकालत छोड़ दी, इनमें प्रमुख थे-चितरंजन दास, मोतीलाल नेहरू, लाला लाजपत राय, आसफ अली, वल्लभ भाई, राजेन्द्र प्रसार, डॉ. प्रकाशम आदि। इस आंदोलन में मुस्लिम नेताओं की भी सक्रिय भागीदारी थी। प्रमुख मुस्लिम नेता थे-अलीबधु, डॉ. अंसारी, मौलाना आजाद। कुछ ऐसे लोग भी थे जिन्होंने इस आंदोलन को नापसंद किया- ये थे जिन्ना, खापार्डे, विपिनचन्द्र पाल एवं बिसेंट। अनेक राष्ट्रीय संस्थानों की स्थापना हुई। विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार शुरू हुआ और स्वदेशी वस्तुओं का प्रयोग होने लगा। मादक पदार्थों के विरुद्ध आंदोलन होने से सरकार को भारी आर्थिक क्षति उठानी पड़ी। कांग्रेस ने नव सुधार योजना के अनुसार बनने वाली व्यवस्थापिका सभाओं का बहिष्कार किया। कांग्रेस ने प्रिंस ऑफ (का) वेल्स के आगमन का बहिष्कार किया। कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में प्रस्ताव पारित किया गया कि अहिंसात्मक आंदोलन को जारी रखा जाए। इस आंदोलन को मजदूरों एवं किसानों ने भी अपना समर्थन दिया।

सरकार ने आंदोलन रोकने के लिए दमनचक्र चलाया। राजद्रोहत्मक सभा अधिनियम को कठोरता से लागू किया गया। समस्त सार्वजनिक सभाओं पर सख्त पाबंदी लगा दी गई और राष्ट्रीय संस्थाओं को गैर कानूनी घोषित कर दिया गया।

5 फरवरी, 1922 को उत्तरप्रदेश के गोरखपुर जिलांतर्गत चौरी चौरा नामक स्थान में ऐसी घटना घटी कि महात्माजी को असहयोग आंदोलन स्थगित कर देना पड़ा। जनता ने आवेश में आकार थानेदार और कई सिपाहियों की हत्या कर दी और पुलिस स्टेशन (स्थान) को जला दिया। इससे पूर्व भी मालाबार और बंबई में दंगे हो चुके थे। गांधी जी ने अनुभव किया कि आंदोलन अपना अहिंसात्मक रूप खो रहा है और जनता में हिंसात्मक प्रवृत्ति बढ़ रही है। उन्होंने आंदोलन को स्थगित कर दिया। इससे बहुत से नेता क्षुब्ध हो उठे। सुभाषचन्द्र बोस ने कहा- जिस समय जनता का जोश सबसे ऊँचे शिखर पर था उस समय पीछे लौट आना राष्ट्रीय दुर्घटना से किसी प्रकार कम नहीं। गांधी जी को गिरफ्तार कर यरवदा जेल में रखा गया।