गाँधी युग (Gandhi Era) Part 7

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मूल्यांकन

इस आंदोलन के स्थगत से देश में निराशा का वातावरण छा गया। राजनीतिक संघर्ष में उमड़ती हुई हिंसा को अवश्य दबा दिया गया, किन्तु इस दबी हुई हिंसा से निकलने का मार्ग खोज लिया और भविष्य में इसी कारण भारत में सांप्रदायिक दंगे हुए। आंदोलन वस्तुत: इसलिए स्थगित किया गया था कि नेताओं के गिरफ्तार हो जाने से योग्य नेतृत्व का अभाव हो गया था और जनता में प्रतिशोध की भावना बलवती हो गई थी। बीच में आंदोलन रोकने के कारण कुछ लोगों का कहना है कि यह पूर्णत: असफल रहा परन्तु ऐसी धारणा भ्रामक है। सुभाषचन्द्र ने देश को निस्संदेह एक सुव्यवस्थित पार्टी (दल)-संगठन प्रदान किया। गांधी जी ने इसे नया विधान ही नहीं दिया, अपितु इसे एक क्रांतिकारी संगठन में परिवर्तित कर दिया। कांग्रेस ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया। खादी कांग्रेसियों की नियमित पोशाक बन गई। देश के एक कोने से दूसरे कोने तक एक जैसे नारे लगाए जाने लगे और एक जैसी नीति और एक जैसी विचारधारा सर्वत्र दृष्टिगोचर होने लगी। इस आंदोलन के कारण गुजरात विद्यापीठ, बिहार विद्यापीठ, महाराष्ट्र विद्यापीठ, काशी विद्यापीठ, जामिया मिलिया इस्लामिया इत्यादि राष्ट्रीय शैक्षणिक संस्थाएँ स्थापित हुई।

सांप्रदायिकता में वृद्धि

असहयोग आंदोलन के स्थगित होने से हिन्द एवं मुसलमानों में तनाव पैदा हो गया। इस समय तक खिलाफत आंदोलन भी समाप्त हो चुका था। मुस्तफा कमालपाशा के नेतृत्व में तुर्की में प्रजातंत्र की स्थापना हो चुकी थी और 1924 ई. में खलीफा का पद समाप्त कर दिया गया था। हिन्दू भी अलग संगठन स्थापित कर रहे थे। इन परिस्थितियों में दोनों संप्रदायों में कटुता आ गई। कांग्रेस और लीग (संघ) का सम्मिलित मंच टूट गया और अलीबंधु तथा जिन्ना कांग्रेस से अलग हो गए। वातावरण दूषित होने लगा और हिन्दू-मुसलमान पुन: आपस में लड़ने लगे। इन सांप्रदायिक दंगों के फलस्वरूप न जाने कितने व्यक्ति मारे गए। फरवरी, 1924 में अस्वस्थता के कारण गांधी जेल से छोड़ दिए गए। उनके बाहर आने से कांग्रेस को बल मिला और स्वराज दल तथा राष्ट्रवादी दल के झगड़े का अंत हो गया। किन्तु हिन्दू-मुस्लिम एकता स्थापित नहीं हो सकती। सितंबर, 1924 में गांधी जी ने सांप्रदायिक दंगों में सैकड़ों व्यक्तियों की हत्या के विरोध में 21 दिनों का उपवास किया।

1926 ई. में लार्ड इरविन भारत का वायसराय होकर आया। हिन्दू-मुस्लिम सांप्रदायिक दंगों को रोकने के लिए जो भी प्रयत्न किए गए थे, सभी असफल रहे। सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में बारदोली के किसान सत्याग्रह कर रहे थे। भारत में किसान, मजदूरों की साम्यवादी संस्थाएँ स्थापित हो चुकी थी और मिलों तथा कारखानों में हड़ताल हो रही थी। अत: औद्योगिक केन्द्रों का वातावरण अशांत था। हिन्दू -मुस्लिम दंगे भी अपनी चरम सीमा पर थे। सारे देश में निराशा का वातावरण छाया हुआ था।