गाँधी युग (Gandhi Era) Part 9

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स्वराजी आंदोलन

असहयोग आंदोलन की समाप्ति के बाद, वे लोग जो सिद्धांत रूप से पूर्ण असहयोग में विश्वास नहीं रखते थे, कांग्रेस के कार्यक्रम में परिवर्तन की मांग करने लगे। इनमें चितरंजनदास एवं मोतीलाल नेहरू प्रमुख थे। इन नेताओं का विचार था कि केन्द्रीय एवं प्रांतीय विधान मंडलों का बहिष्कार करना उचित नहीं है। बल्कि विधान-मंडलों पर कब्जा करना चाहिए और उनके भीतर राजनीतिक लड़ाई लड़नी चाहिए। इस प्रकार विधान-मंडलों के माध्यम से जनता की आवाज और मांगे सरकार तक पहुंचायी जा सकती हैं तथा सरकारी नीतियों की आलोचना कर सरकारी कार्यों में अवरोध उत्पन्न किया जा सकता है। साथ ही उनका मानना था कि असहयोग आंदोलन के असामयिक समाप्ति के पश्चात्‌ उनका आंदोलन राष्ट्रवादी भावना को जगाए रखेगा तथा असहयोग आंदोलन विधान मंडल के अंदर चलाया जा सकेगा। 1923 ई. में इलाहाबाद में चित्तरंजन दास वं मोतीलाल नेहरू ने स्वराज दल का गठन किया। इस दल के उद्देश्य निम्नलिखित थे-

  • स्वराज अथवा औपनिवेशिक स्वशासन की प्राप्ति।

  • विधान मंडलों के चुनाव में भाग लेना और अपने अधिक से अधिक सदस्यों को चुनाव में जिताकर कौंसिलों में भेजना ताकि सरकार के स्वेच्छाचारी तरीकों पर नियंत्रण स्थापित किया जा सके।

  • इसके सदस्यों ने सरकारी पद स्वीकार नहीं करने, नगरपालिका चुनावों में भाग नहीं लेने की प्रतिज्ञा की।

  • इसने विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और कांग्रेस के रचनात्मक कार्यों में सहयोग देने का भी निर्णय लिया।

नेहरू रिपोर्ट (विवरण)

साइमन कमीशन (आयोग) की नियुक्ति के साथ ही भारत सचिव लार्ड बर्कनहेड ने भारतीय नेताओं को यह चुनौती दी कि यदि वे विभिन्न दलों तथा संप्रदायों की सहमति से एक संविधान तैयार कर सकें तो इंग्लैंड सरकार उस पर गंभीरता से विचार करेगी। इस चुनौती को भारतीय नेताओं ने स्वीकार करके इस बात का प्रयास किया कि एक सम्मिलित संविधान का प्रारूप तैयार किया जाए। इसके लिए मोतीलाल नेहरू की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया, जिसका काम संविधान का प्रारूप तैयार करना था। लखनऊ में अगस्त, 1928 में एक सर्वदलीय सम्मेलन में इस रिपोर्ट के प्रारूप पर विचार किया गया। इसकी मुख्य विशेषताएँ निम्न थीं-

  • भारत को एक डोमिनियन (अधिराज्य) राज्य का दर्जा दिया जाए।

  • केन्द्र में दव्सनात्मक प्रणाली स्थापित की जाए।

  • कार्यकारिणी पूर्ण रूप् से व्यवस्थापिका सभा के प्रति उत्तरदायी रहे।

  • समस्त दायित्व भारतीय प्रतिनिधियों को सौंपा जाए।

  • भारत में संघीय प्रणाली की स्थापना की जाए।

  • अवशिष्ट शक्ति केन्द्र के पास रहे।

  • सभी चुनाव क्षेत्रीय आधार पर हों।

  • सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व को समाप्त कर दिया जाए।

  • निर्वाचन व्यस्क मताधिकार के आधार पर हो।

नेहरू रिपोर्ट (विवरण) का जिन्ना एवं मुस्लिम लीग (संघ) के अन्य नेताओं ने विरोध किया। इसका मूल कारण यह था कि इसमें सांप्रदायिक आधार पर प्रतिनिधित्व का विरोध किया गया था। कांग्रेस का युवा नेतृत्व जिसका प्रतिनिधित्व जवाहर लाल नेहरू और सुभाष चन्द्र बोस कर रहे थे, डोमिनियन (अधिराज्य) स्टेट्‌स (राज्य) की बात से संतुष्ट नहीं थे। वे पूर्ण स्वराज की मांग को शामिल किए जाने पर बल दे रहे थे। पर गांधी के यह कहने पर कि एक वर्ष के भीतर डोमिनियन (अधिराज्य) स्टेट्‌स (राज्य) नहीं मिलने पर कांग्रेस पूर्ण स्वराज को अपना लक्ष्य बनाएगी, इन्होंने अपना विरोध वापस ले लिया। नेहरू रिपोर्ट सरकार के सामने प्रस्तुत की गई, पर सरकार ने इसे अस्वीकृत कर दिया। फलत: कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता के आंदोलन की घोषणा कर दी।