वामपंथ एंव ट्रेड (व्यापार) यूनियन (संघ) आंदोलन (Leftcreed and Trade Union Movement) Part 1

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वामपंथी आंदोलन

भारत में वामपंथी आंदोलन का उदय आधुनिक उद्योगों के विकास, दो विश्व युद्धों के मध्यकाल में भयंकर आर्थिक मंदी तथा रूस में बोल्शेविक क्रांति के परिणामस्वरूप हुआ था। भारत के भीतर तथा बाहर कार्यरत कुछ भारतीय बुद्धि जीवियों ने भारतीय साम्यवादी दल की स्थापना का निर्णय लिया। मानवेन्द्र नाथ राय ने रूस की यात्रा की तथा रूसी साम्यवादी दल से संपर्क स्थापित किया। उन्होंने जुलाई-अगस्त, 1920 में मास्को में आयोजित हुए दव्तीय साम्यवादी अंतरराष्ट्रीय में भी भाग लिया और उसके शीघ्र बाद ही उन्होंने अक्टूबर, 1920 में ताशकन्द में भारतीय साम्यवादी दल की स्थापना की। 1921 और 1925 के बीच में देश के अनेक भागों में विभिन्न औपचारिक साम्यवादी गुटों की स्थापना हुई तथा अंतत: दिसंबर, 1925 में सत्यभक्त ने कानपुर में अखिल भारतीय साम्यवादी सम्मेलन का आयोजन किया। इस सम्मेलन का आयोजन ही 1925 भारतीय कम्यूनिस्ट (साम्यवादी) साम्यवादी दल की औपचारिक स्थापना माना जाता है।

यद्यपि 1920 के दशक में भी कृषक कार्यकर्ताओं और अन्य वामपंथी संगठनों का विकास हुआ। लाला लाजपतराय की अध्यक्षता में अक्टूबर, 1920 में बंबई में अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस का भी पहला अधिवेशन हुआ। शीघ्र ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी वामपंथी प्रभाव महसूस किया गया। जवाहरलाल नेहरू तथा सुभाष चन्द्र बोस ने समाजवादी आदर्शों पर अधिक बल दिया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने बढ़ते हुए समाजवादी प्रभाव के कारण आगे चलकर कांग्रेस ’वामपंथी’ तथा ’दक्षिणपंथी’ खेमों में विभाजित हो गयी। 1930 के दशक के प्रारंभ में बिहार संयुक्त प्रांत बंबई और पंजाब जैसे प्रांतों में वामपंथी कांग्रेसियों दव्ारा समाजवादी समूह गठित किए गए। क्रांतिकारी आतंकवाद के दूसरे चरण, जिसका 1922 और 1932 के बीच विकास हुआ था, में भी समाजवादी प्रवृत्तियां अत्यधिक प्रबल रहीं।