वामपंथ एंव ट्रेड (व्यापार) यूनियन (संघ) आंदोलन (Leftcreed and Trade Union Movement) Part 5

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कांग्रेस में समाजवाद

दो विश्व युद्धों के बीच राष्ट्रीय आंदोलन में समाजवादी विचारधाराओं का विकास हुआ। यद्यपि राष्ट्रीय आंदोलन पर इस विचारधारा का कोई निर्णायक प्रभाव नहीं पड़ा परन्तु समाजवादी विचारधारा के उदय की अवहेलना नहीं की जा सकती थी। समाजवादी विचारधारा के विकास में 1987 की रूसी की क्रांति का महत्वूर्ण योगदान है। इस क्रांति के मजदूर, किसान और पूँजीवादी व्यवस्था दव्ारा शोषित सर्वहारा वर्ग इत्यादि के विचार फैले। इस प्रभाव से भारत भी अछूता नहीं रह सका और भारत में यह दो रूपों में प्रकट हुआ। एक समाजवादी विचारधारा और दूसरी साम्यवादी विचारधारा। परन्तु ये दोनों विचारधाराएँ राष्ट्रीय आंदोलन के अंतर्गत ही काम करती रही। यहाँ तक कि पृथक दल निर्माण के बाद भी इन दलों के सदस्य कांग्रेस के सदस्य भी रहे।

1926 तक कांग्रेस में समाजवादी विचारधारा के काफी सदस्य हो गए थे। वे कांग्रेस की नीतियों पर समाजवादी विचारधारा को स्थापित करना चाहते थे। इनकी मुख्य शिकायत देश की भूमि व्यवस्था से थी। समाजवादियों ने जमींदारी प्रथा के उन्मूलन की मांग रखी और कहा कि किसान और सरकार के बीच में किसी अन्य वर्ग की आवश्यकता नहीं है। 1926 में सुयंक्त प्रान्त की कांग्रेस ने अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के इस मूल सिद्धांत को स्वीकार करने के लिए आग्रह किया।

1930-31 तक वर्ग संघर्ष के विचार ने काफी जोर पकड़ लिया। कांग्रेस में ऐसे सदस्य थे जो गांधी जी दव्ारा निर्धारित रचनात्मक कार्यक्रम की बजाए साम्राज्यवाद की शोषण की नीति के खिलाफ मजदूरों और किसानों को जागृत करना चाहते थे। ऐसे सदस्यों ने कांग्रेस के अंदर ही 1931 में समाजवादी दल का संगठन किया जिसका अध्यक्ष बिहार के मजदूर अब्दुल बारी थे। इस दल के कार्यक्रम के चलते 1931 में कराची अधिवेशन में कांग्रेस ने पहली बार समाजवादी प्रस्ताव पारित किया। इस आंदोलन के क्रम में समाजवादी दल के अधिकतर नेता गिरफ्तार कर लिए गए।

परन्तु 1934 में सविनय अवज्ञा आंदोलन के स्थगन के बाद समाजवाद और साम्यवाद के विचार फिर से पनपने लगे। मई, 1934 में समाजवादी दल अखिल भारतीय दल के रूप में सामने आ गया। 17 मई, 1934 को इसका अखिल भारतीय अधिवेशन आचार्य नरेन्द्र देव की अध्यक्षता में पटना में हुआ। पटना की बैठक के बाद समाजवादी दल की शाखाएं विभिन्न प्रान्तों में स्थापित की गई।

समाजवादी दल के साथ कांग्रेस शब्द जुड़ा रहने के दो प्रमुख कारण थे। समाजवादी दल की तरह यह दल कांग्रेस विरोधी नहीं था और यह दल कांग्रेस के अंदर रह कर अपना कार्यक्रम पूरा करना चाहता था। इसके अतिरिक्त यह भी तय किया गया कि साम्यवादी दल का सदस्य किसी भी सांप्रदायिक संगठन का सदस्य नहीं होगा। इन्होंने समाजवादी कार्यक्रम को भी निर्धारित किया। इसमें किसान तथा मजदूरों की माँगों को प्राथमिकता दी गई। 21 तथा 22 अक्टूबर, 1934 ई. में बंबई में कांग्रेस समाजवादी दल का पहला खुला अधिवेशन हुआ। इसकी अध्यक्षता संपूर्णानंद ने की और इसके अन्य सदस्य थे नरेन्द्र देव, जय प्रकाश नारायण, कमला देवी चट्‌टोपाध्याय, राम मनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्द्धन, एम. आर. मसानी, अरूणा आसफ अली इत्यादि।

1934 का समाजवादी सम्मेलन राजनीतिक तथा आर्थिक दृष्टिकोण से एक क्रांतिकारी कदम था। खासकर युवा वर्ग ने इसमें जमकर भाग लिया। क्रांग्रेस के अनेक दक्षिणपंथी नेता इसके विरोधी बन गए। इस प्रकार समाजवादी दल के निर्माण के बाद राष्ट्रीय कांग्रेस फिर से वामपंथी और दक्षिणपंथी विचारों के संघर्ष में पड़ गई। परन्तु इसके बावजूद इस दल के निर्माण ने ही क्रांग्रेस के कार्यक्रम को समाजवादी ढाँचा प्रदान किया इसके परिणामरूवरूप 1937 के चुनाव में क्रांग्रेस को अभूतपूर्व सफलता मिली। बाद में समाजवादी विचारधारा का प्रभाव कांग्रेस के मंच पर दिखा।

कांग्रेस समाजवादीयों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता गांधीवादी पद्धति में उनकी आस्था थी। वे मार्क्सवादी को मार्क्स के अन्धानुयायी मानते थे। भारत के लिए नवीन प्रकार के समाजवाद के वे समर्थक थे। मार्क्सवादियों के विपरीत उन्होंने 1942 की क्रांति में भाग लिया एवं उसे नेतृत्व प्रदान किया। जय प्रकाश नारायण, अरूणा आसफ अली, राम मनोहर लोहिया एवं अच्युत पटवर्द्धन आदि का इसमें योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण था।