Important of Modern Indian History (Adunik Bharat) for Hindi Notes Exam

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CHAPTER: Fractures and Swadeshi Movement

भंग-भंग और स्वदेशी आंदोलन

  • हिन्दुस्तान में 20वीं सदी का उदय स्वदेशी आंदोलन के उदय से जुड़ा है।
  • आंदोलन की विशेषता यह थी कि इसका दायरा महज राजनीतिक तक सीमित नहीं था, समाज का हर तबका आंदोलन से किसी न किसी रूप से जुड़ा था।
  • बंगाल की आबादी 7 करोड़ 85 लाख (गुलाम भारत की आबादी का 1/4) थी, उड़ीसा और बिहार भी इसका हिस्सा थे।
  • असम 1874 में अलग हो चुका था।
  • बंगाल के बँटवारे का फैसला राजनीतिक कारणों से लिया गया, क्योंकि बंगाल राष्ट्रीय चेतना का केन्द्र था।
  • वाइसराय लॉर्ड कर्ज़न- “अंग्रेजी हुकूमत का यह प्रयास कलकता को सिंहासनच्युत करना था, बंगाली आबादी का बँटवारा करना था, एक ऐसे केन्द्र को समाप्त करना था, जहाँ से बंगाल व पूरे देश में कांग्रेस पार्टी का संचालन होता था, साज़िशें रची जाती थीं।”
  • राइसले (गृहसचिव) - “अविभाजित बंगाल एक बड़ी ताकत है। विभाजित होने से यह कमजोर हो जाएगी, कांग्रेसी नेताओं की यह आशंका सही है और इनकी यह आशंका हमारी योजना की सबसे बड़ी महत्वपूर्ण चीज है। हमारा मुख्य उद्देश्य बंगाल का बँटवारा करना है, जिससे हमारे दुश्मन बँट जाएँ, कमजोर पर जाएँ।”
  • मूल मकसद बंगाल (मूल) में बंगालियों की आबादी कम (1 करोड़ 70 लाख, 3 करोड़ 70 लाख उड़िया व हिन्दी भाषा रखने की योजना) कर अल्पसंख्यक बनाना विभाजन में धार्मिक विभाजन अंतर्निहित था।
  • ढाका विभाजन के पक्ष में मुस्लिम को रिझाने के लिए-कर्जन- बंगाल-विभाजन से ढाका, बहुसंख्यक मुस्लिम आबादी वाले नए प्रांत की राजधानी बन जाएगा। इससे पूर्वी बंगाल में मुसलमानों में एकता स्थापित होगी। मुसलमानों को बेहतर सुविधाएँ मिल सकेंगी और पूर्वी जिले कलकता की राजशााही से मुक्त भी हो जाएँगे।

(1 करोड़ 80 लाख मुसलमान एवं 1 करोड़ 20 लाख हिन्दू)

  • कर्जन के उत्तराधिकारी मिंटो शुरू में विभाजन के विरोधी थे, बाद में विभाजन को राजनीतिक दृष्टिकोण से जरूरी बताया।
  • भारतीय राष्ट्रवादियों ने विभाजन का विरोध किया व स्वदेशी आंदोलन शुरू हुआ।
  • दिसंबर 1903 में बंगाल-विभाजन का प्रस्ताव आया, जानकारी मिलने पर जबरदस्त विरोध हुआ।
  • सुरेन्द्रनाथ बनर्जी, कृष्णकुमार मित्र, पृथ्वीचंद्र राय अन्य ने विभाजन प्रस्ताव के खिलाफ ‘बंगाली 34’ , ‘हितवादी’ , ‘संजीवनी’ जैसे अखबारों व पत्रिकाओं के माध्यम से आंदोलन छेड़ा।
  • विभाजन के खिलाफ सबसे ज्यादा बैठकें ढाका, मेमन सिंह और चदघोष में हुई।
  • गृहसचिव के नाम विरोध याचिकाएँ भेजी गई।
  • पहले अंग्रेज के समर्थक दो जमींदार भी अंग्रेज के साथ हो गए।
  • मुख्य उद्देश्य या विभाजन प्रस्ताव के खिलाफ भारत व ब्रिटेन में जनमत तैयार करना।
  • 19 जुलाई 1905 को बंगाल-विभाजन के निर्णय की घोषणा के बाद विरोध सभाएँ (दिनाजपुर, पावना, फरीदपुर, जैसीर, ढाका वीरभूमि, वारीसाल, टंगाइल आदि) हुई और विदेशी माल के बहिष्कार की प्रतिज्ञा की गई।
  • 7 अगस्त 1905 कलकता के टाउन हाल में स्वदेशी आंदोलन की घोषणा हुई। ‘बहिष्कार प्रस्ताव’ पारित हुआ।
  • सुरेन्द्रनाथ बनर्जी (नरमपंथी) आदि ने मैनचेस्टर के पकड़े व लिवरपुल के नमक के बहिष्कार की अपील कीं।
  • 1 सितंबर 1905 को सरकार ने घोषणा की कि विभाजन 16 अक्टूबर 1905 से प्रभावी होगा।
  • 16 अक्टूबर 1905 पूरे बंगाल में ‘शोक दिवस’ के रूप में मनाया गया।
  • सड़कों पर वंदे मातरम गाते हुए प्रदर्शन किए गए।
  • आनंद मोहन बोस व सुरेंद्रनाथ बनर्जी नेदो विशाल (पहली बार-50 हजार व 75 हजार लोग) जनसभाओं को संबोधित किया।
  • 50 हजार रू. कुछ घंटो में इकट्‌ठे हुए।
  • वारीसाल सम्मेलन के अध्यक्ष-एस. अब्दुल रसूल (1906) - “पिछले 50 से 100 सालों के दौरान हम जो हासिल नहीं कर सके, वह हमने 8 महीनों में हासिल कर लिया है और हमें यहाँ तक पहुँचाया है बंगाल-विभाजन ने। विभाजन जैसी शर्मनाक घटना ने महान राष्ट्रीय आंदोलन, स्वदेशी आंदोलन को जन्म दिया है।”
  • स्वदेशी आंदोलन का नेतृत्व किया।
  • तिलक-बंबई, पुणे
  • अजीत सिंह और लाला लाजपत राय-पंजाब व उत्तर प्रदेश
  • सैयद हैदर रज़ा-दिल्ली
  • चिदंबरम पिल्लै-मद्रास प्रेसीडेंसी (बिपिनचंद्र पाल ने भाषणों से मजबूत बनाया)
  • गोखले की अध्यक्षता-बनारस अधिवेशन (1905) में स्वदेशी आंदोलन का और बहिष्कार आंदोलन का समर्थन किया गया।
  • तिलक, बिपिनचंद्र पाल, लाला लाजपतराय और अरविंद घोष आदि (गरम दल नेता) इसे राजनीतिक जनसंघर्ष का रूप देना चाहते थे।
  • नरमदल नेता तैयार नहीं थे वे ब्रिटेन या उसके उपनिवेशों की तरह भारत में सरकार का गठन चाहते थें-1906 कलकता अधिवेशन अध्यक्ष-दादाभाई नौरोजी
  • नरमदल व गरमदल में मतभेद होने लगे और 1907 में सूरत अधिवेशन (अध्यक्ष-रास बिहारी बोस) में स्वदेशी आंदोलन को लेकर पार्टी विभाजित हो गई।
  • 1905 के बाद बंगाल में स्वदेशी आंदोलन पर उग्रवादियों की पकड़ मजबूत हुई।
  • उद्देश्य था जनांदोलन के जरिए राजनीतिक स्वाधीनता हासिल करना।
  • कुछ आंदोलनकारी शांतिपूर्ण असहयोग आंदोलन के पक्ष में थे लेकिन अरविंद घोष (गरमपंथी) हिंसक प्रतिरोध को जायज मानते थे यदि दमन किया जाए तो।
  • जितने भी संघर्ष हुए उनमें बहिष्कार आंदोलन को सबसे अधिक सफलता मिली।
  • जनसभाएँ व प्रदर्शन जनमत तैयार करने का सशक्त तरीका सिद्ध हुआ।
  • आंदोलन में स्वयंसेवी संगठनों ने भी मदद की।
  • ‘स्वदेश बांधव समिति’ वारीसाल के अध्यापक अश्विनी कुमार के नेतृत्व में गठित स्वयंसेवी संगठन में मुसलमानों की आबादी अधिक थी व 159 शाखाएँ पूरे जिले में थी। जनता में राजनीतिक चेतना पैदा की इस समिति ने-भाषण, स्वदेशी गीतों दव्ारा
  • लोक नाट्‌य परंपराओं दव्ारा स्वदेशी आंदोलन देश में फैला।
  • इस आंदोलन ने ′ आत्मनिर्भरता ′ आत्मशक्ति ′ का नारा दिया-विशेषता
  • आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी अथवा राष्ट्रीय शिक्षा की जरूरत महसूस हुई।
  • टैगोर के शांतिनिकेतन की तर्ज पर बंगाल नेशनल कॉलेज (प्राचार्य बने अरविंद) की स्थापना की गई।
  • 1906 में राष्ट्रीय शिक्षा परिषद (उद्देश्य था राष्ट्रीय नियंत्रण के तहत जनता को शिक्षित कर राष्ट्रीय जीवनधारा से जोड़ना) का गठन हुआ-सारे जाने माने लोग शामिल थे।
  • आत्मनिर्भरता के लिए स्वदेशी उद्योगों की जरूरत थी।
  • लगभग देश के सारे स्वदेशी कल-कारखाने इसी समय स्थापित किए गए।
  • यह बंगला साहित्य विशेषकर काव्य का स्वर्णकाल था।
  • रवींद्रनाथ टैगोर, रजनीकांत सेन, द्धिजेंद्रलाल राय, मुकुंद दास, सैयद अबू मुहम्मद इत्यादि दव्ारा लिखे गीत सबके लिए प्रेरणा स्त्रोत बने।
  • टैगोर दव्ारा लिखा गीत ‘आमार सोनार बांगला’ 1971 में बांगलादेश का राष्ट्रगान बना।
  • दक्षिणारंजन मित्र मजुमदार ने ‘ठाकुरमार झुली’ लिखी-बंगला
  • अवनींद्रनाथ टैगोर ने भारतीय कला पर पाश्चात्य आधिपत्य को खत्म कर पारंपरिक कलाओ व अजंता की चित्रकला से प्रेरणा ली।
  • 1906 में स्थापित ‘इंडियन सोसाइटी ऑफ ओरिएंटल आट्‌र्स’ की पहली छात्रवृत्ति नंदलाल बोस को मिली।
  • विज्ञान के क्षेत्र में जगदीशचंद्र बोस, प्रफुल्लचंद्र राय इत्यादि की सफलताएँ, आविष्कार स्वदेशी आंदोलन को मजबूत बनाने लगे।
  • जनता का बहुत बड़ा हिस्सा पहली बार सक्रिय राष्ट्रवादी राजनीति में भागीदार बना पर यह किसान तबके को पूरी तरह प्रभावित नहीं कर सके।
  • स्वदेशी आंदोलन भारत में आधुनिक राजनीति की शुरूआत थी।
  • अंग्रेजों के मुसलमानों में सांप्रदायिकता भड़काने के कारण मुसलमानों ने साथ नहीं दिया।
  • अंग्रेजों के इशारे पर ‘इंडियन मुसलिम लीग’ की स्थापना हुई।
  • ढाका के नवाब सलीमुल्लाह का इस्तेमाल स्वदेशी आंदोलन के विरोधी के रूप में किया गया।
  • ब्गाांल में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे।
  • सांप्रदायिकता ने स्वदेशी को नुकसान पहुँचाया इसके लिए आंदोलन के कुछ तरीके भी जिम्मेदार थे।
  • ऐसे पारंपरिक रीति-रिवाजों, त्यौहारों और संस्थाओं का सहारा लिया गया, जिनका चरित्र बहुत हद तक धार्मिक था।
  • 1907 में बंगाल में हिन्दू-मुसलिम दंगे हुए।
  • 1908 के मध्य तक स्वदेशी आंदोलन की उर्जा खत्म हो गई।

कारण-

  • सरकार ने दमन चक्र शुरू किया।
  • कांग्रेस पार्टी में आपसी मतभेद और 1907 में विभाजन।
  • प्रभावी संगठन का अभाव।
  • 1907 - 1908 के बीच बंगाल के 9 बड़े नेता (अश्विनी कुमार दत्त व कृष्णकुमार मिश्र सहित) निर्वासित किए गए।
  • तिलक को 6 वर्ष की कैद हुई।
  • प्जाांब के अजीत सिंह व लाला लाजपत राय को निर्वासित कर दिया गया।
  • मद्रास के चिदंबरम पिल्लै एवं आंध्र के हरिसर्वोत्तम राव को गिरफ्तार किया गया।
  • बिपिनचंद्र पाल और अरविंद घोष ने सक्रिय राजनीति से सन्यास ले लिया।

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