Important of Modern Indian History (Adunik Bharat) for Hindi Notes Exam

Get top class preparation for competitive exams right from your home: Get detailed illustrated notes covering entire syllabus: point-by-point for high retention.

CHAPTER: Indian Council Act and More

औपनिवेशिक विधायिका का राष्ट्रीय इस्तेमाल

  • 1861 के इंडियन काउंसिल ऐक्ट-
    • गवर्नर जनरल की कार्यपालिका परिषद् का दायरा बड़ा कर दिया गया।
    • परिषद् में 6 से 12 सदस्य बढ़ा सकते हो (गवर्नर जनरल दव्ारा)
    • कम-से-कम आधे गैर-सरकारी व्यक्ति, भारतीय या ब्रिटिश होने थें।
    • औपनिवेशिक विधान परिषद् कहा जाने लगा।
    • पूर्णत शक्तिहीन। (सरकार की पूर्व अनुमति के बिना कुछ नहीं कर सकती ना ही सवाल पूछ सकती थी)
  • परिषद् की बैठक साल में 25 दिन होती।
  • इंडयन काउंसिल विधेयक पेश करते -चार्ल्स वुड (राज्य सचिव) - “समस्त अनुभव बतलाता है कि जब एक शक्तिशाली जाति दूसरी जाति पर शासन करती है, तो शासन का मुलायम से मुलायम रूप निरंकुश सत्तावाढ़ ही होता है।”
  • वाइसराय एल्गिन को लिखा-चार्ल्स वुड (1882) -भारत में जो स्थितियाँ मौजूद है, उनमें एकमात्र उपयुक्त सरकार गृह देश से नियंत्रित निरंकुश सत्ता की सरकार ही हो सकती है।
  • भारतीयों को सदस्यता उनके दृष्टिकोण को जानने के लिए दी गईं।
  • 1862 - 1892 (30 वर्षो) में केवल 45 भारतीयों (रजवाड़ो के शासक, जम़ीदार, बड़े व्यापारी, अवकाश प्राप्त उच्च अधिकारी) को नामांकित किया गया।
  • कुछ राजनीतिक व बुद्धजीवियों को नामांकित किया गया, जैसे-सैय्यद अहमद खान (1878 - 82) , कृष्टोदास पाल (1883) , वी. एन. मीडलिक (1884 - 87) , के. एल. नुलकर (1890 - 91) और रासबिहारी घोष (1892)
  • बलरामपुर के राजा दिग्विजय सिंह को दो बार परिषद् की सदस्यता दी गई, जिन्हें अंग्रेजी का एक शब्द नहीं आता था।
  • देसी प्रेस विधेयक विचारार्थ आया तब सिर्फ एक भारतीय नेता (महाराजा जोतेन्द्रमोहन टैगोर, ब्रिटिश इंडियन एसोसिएशन के नेता) थे और उन्होंने उसके पक्ष में मतदान दिया।
  • 1882-जोतेन्द्रमोहन टैगोर और दुर्गाचरण लाहा (कलकता के व्यापारियों के प्रतिनिधि) ने नमक कर में कमी का विरोध किया और व्यापारियों एवं पेशेवरों के लाइसेंस कर में कमी की सिफारिश कीं
  • 1888-पिथरीमोहन मुखर्जी (जम़ीदारों के प्रतिनिधि) और दिनशा पेटिट (बड़े व्यापारियों के प्रवक्ता) ने नमक कर बढ़ाने का समर्थन किया।
  • अखबारों और कांग्रेस के मंच से मुखर्जी व पेटिट को ‘बगुला भगत’ व ‘भव्य लेकिन महत्वहीन’ की संज्ञा दी गई।
  • 1892 के इंडियन काउंसिल ऐक्ट के जरिए कानून निर्माण की प्रक्रिया
    • औपनिवेशिक तथा प्रांतीय विधान परिषदों में अतिरिक्त सदस्य फिर 10 से 16 किए गए।
    • सरकारी बहुमत बरकरार रहा।
    • वार्षिक बजट पर बहस करने का अधिकार दिया गया।
    • बजट पर मतदान, संशोधन दाखिल करने का अधिकार नहीं था।
    • सवाल का अधिकार परन्तु पूरक सवाल का अधिकार नहींं।
    • परिषद की बैठक साल में औसतन 13 दिन होती।
    • गैर-सरकारी भारतीय सदस्यों की संख्या 24 में सिर्फ 5
  • राष्ट्रवादी 1892 के अधिनियम से असंतुष्ट थे।
  • राष्ट्रवादियों की मांग-
    • गैर-सरकारी निर्वाचित सदस्यों का बजट पर मतदान
    • नारा- ′ प्रतिनिधित्व के बिना कर नहीं ″
    • मद्रास से-पी. आनंद चार्लू. सी. शंकरन नाथर और विजयराघव चेरियर
    • युक्तप्रीत से- मदनमोहन मालवीय, अयोध्यानाथ विशंभरनाथ
    • बंबई स्े-तिलक, फीरोजशाह मेहता, आर. एम. सयानी, चिमनलाल सीतलवाड़, एन. जी. चंद्रवरकर, गोपालकृष्ण गोखले।
    • केन्द्रीय प्रांत से-जी. एम. चितनवीस।
  • विधान परिषद् का नया इस्तेमाल करने में सबसे अधिक भूमिका रही-फीरोजशाह मेहता और गोपालकृष्ण गोखले की।

फीरोजशाह मेहता-

  • जन्म 1845 में बंबई में हुआ।
  • 1860 के दशक में लंदन में वकालत के दौरान दादाभाई नौरोजी के प्रभाव में आए।
  • बांबे प्रेसीडेंसी एसोसिएशन व भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापक सदस्य।
  • औपनिवेशक विधान परिषद् में पहला शक्तिशाली हस्तक्षेप 1895 में किया।
  • उस समय 1860 के पुलिस अधिनियम संशोधन विधेयक का विरोध किया।
  • मेहता- यह कानून और व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर अदालत में मुकदमा चलाए बिना लोगो को अपराधी मानने और सजा देने का कानून है।
  • आरोप लगाया गया मेहता ने औपनिवेशक विधायिका की भूमिका और चरित्र बदल दिया।
  • मेहता का भारत के राजनीतिक नेताओं विरोधियों (तिलक) समेत ने समर्थन किया।
  • वेस्टलैंड- विधान परिषदों में एक “एक नई प्रवृत्ति” का उदय हुआ है।
  • लाहौर से प्रकाशित-ट्रिब्यून-वह आवाज, जो इतने दिन तक परिषद् के कक्ष के बाहर गूँजती थी यानी जनता की आवाज, निर्वाचन के खुले दरवाजे से अंदर प्रवेश पा चुकी है … श्री मेहता जनता के प्रतिनिधि के रूप में बोलते है … सर जेम्स वेस्टलैंड का विरोध उस नौकरशाही की चीख पुकार है, जिसे अपने अखाड़े में ही चित्त कर दिया गया है।
  • उच्च शिक्षा से प्राथमिक शिक्षा के कोष का स्थानांतरण-मेहता- “प्रजा को शासकों के धरातल तक ले जाने की बात तो मनोहर लगती है, लेकिन प्रजा आपकी एड़ी पर जोर देती है, तो आखिर मानव स्वभाव कमजोर होता ही है और व्यक्तिगत अनुभव इतना ज्यादा असुविधापूर्ण है कि पलट कर चोट करने का लालच रोक पाना कठिन हो जाता है।”
  • 1901 में बंबई विधान परिषद में विधेयक पेश किया गया, जिसका उद्देश्य किसानों का भूमि- स्वामित्व छीन लेना, ताकि वे फ़िजुलखर्ची (शादी ब्याह व त्यौहारों पर खर्च) के कारण अपनी जमीन बेच न सके।
  • मेहता ने इसका खंडन कर किसानों के अधिकार (खुशी मनाने का) की वकालत की।
  • जब सरकार इस विधेयक को पारित कराने पर अड़ी तो वे गोखले, जी. के. पारेख, बालचंद्र कृष्ण और डी. ए. खरे के साथ परिषद् से बहिर्गमन कर गए।
  • 1901 में मेहता औपनिवेशिक परिषद से रिटायर हुए।

गोखले-

  • मेहता ने अपनी जगह गोखले (35 वर्ष) को निर्वाचित कराया।
  • ‘पूना सार्वजनिक सभा’ के सचिव और ‘सुधारक’ के संपादक थे।
  • गोखले असाधारण बुद्धिजीवी थे व न्यायमूर्ति रानाडे और जी. वी. जोशी ने उन्हें भारत का आर्थिक स्थितियों का अच्छा अध्ययन कराया था।
  • गोखले कुशल वक्ता नहीं थे, उनका ज्ञान काफी विस्तृत था और वे तथ्यों के सर्तक, शांत और तार्किक प्रस्तुतीकरण तथा विश्लेषण पर ज्यादा निर्भर करते थे।
  • गोखले की विशेष प्रसिद्धि उनके बजट भाषणों से हुई।
  • 26 मार्च 1902 को उन्होंने अपना पहला बजट भाषण दिया और सबसे बड़े संसदीय व्यक्तित्व बन गए।
  • उन्होंने भारतीय वित्त व्यवस्था की दुर्बल स्थिति और लोगों की गरीबी का संबंध भारतीय अर्थव्यवस्था और राजतंत्र की औपनिवेशिक हैसियत से जोड़ा।
  • गोखले के जीवनीकार-बी. आर. मंदा- “वायरन की तरह वे भी कह सकते थे कि एक सुहानी सुबह वे सोकर उठे और पाया कि प्रसिद्ध हो चुके है।”
  • अगले दस वर्षों तक गोखले ने साहस, दृढ़ता और योग्यता का परिचय वार्षिक बजट और विधेयको के सिलसिले में दिया।
  • उनकी संसदीय उपलब्धियों पर उन्हें ‘विपक्ष के नेता’ की सम्मानीय उपाधि दी गई।
  • राजनीतिक विरोधी-तिलक (गोखले की अंत्येष्टि पर) - भारत का यह हीरा, महाराष्ट्र का यह रत्न, कार्यकर्ताओ का यह राजकुमार चितास्थल पर शाश्वत निद्रा में निमग्न है। इस पर निगाह डालिए और इसका अनुकरण करने की कोशिश कीजिए।
  • गाँधी जी ने गोखले को अपना राजनीतिक गुरू माना।

Developed by: