किसानों के आंदोलन एवं विद्रोह (Movement and uprising of farmers) Part 1

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भूमिका

ब्रिटिश सरकार की औपनिवेशक नीतियों के फलस्वरूप भारतीय अर्थव्यवस्था, प्रशासन एवं भूराजस्व प्रणाली में तेजी से परिवर्तन हुए और इन परिवर्तनों का सर्वाधिक असर कृषकों पर ही पड़ा। इन परिवर्तनों के फलस्वरूप भारतीय किसानों की हैसियत काश्तकार, बंटाईदार या खेतीहर मजदूर की हो गई। उनकी कृषकीय प्रवृत्ति और स्वभाव निरन्तर कृषि से विमुख होता गया और भूमि छोटे-छोटे अलाभकारी जोतों में विभक्त हो गई। दस्तकारी उद्योगों के तबाह हो जाने से उद्योगों में लगे लोग भी कृषि करने को लाचार हुए और कृषि योग्य जमीन पर दबाव बढ़ा। उच्च भूराजस्व की अदायगी के कारण कृषक महाजनाेें के चुंगल में फसते जा रहे थे और उनके जमीन का स्थानान्तरण साहूकारों एवं सरकार की ओर हो रहा था। लगातार पड़ने वाले अकालों ने स्थिति को और भी विस्फोटक बना दिया। स्पष्टत: अनुपस्थित भूस्वामित्व, परजीवी बिचौलिए, लोभी, साहूकार-इन सबने मिलकर कृषकों को अधिकाधिक निर्धन बना दिया। इन कारणों ने अन्य सामाजिक कुरीतियों के साथ मिलकर भारतीय कृषकों में व्यापक रूप से अस्थिरता, अशांति एवं विक्षुब्धता उत्पन्न की और इस बहुआयामी शोषण से मुक्ति पाने के लिए किसानों ने भारी लगान वसूलने वाले जमींदारों, निर्दयी साहूकारों और जुल्म का पक्ष लेने वाले सरकारी अधिकारियों के विरुद्ध अपना आक्रोश व्यक्त किया। कई बार उन्होंने स्थानीय स्तर पर सामूहिक संघर्ष किए, तो कई बार छोटे-छोटे विद्रोह किए। एक अनुमान के अनुसार समस्त ब्रिटिश शासन की अवधि में 77 कृषक विद्रोह हुए।

औपनिवेशिक शासन के पूर्व भी भारत में कृषक विद्रोह हुए थे। 17वीं और 18वीं शताब्दी के दौरान शासक वर्ग के खिलाफ अनेक किसान विद्रोह हुए। राज्य दव्ारा अधिक भूराजस्व का निर्धारण, राजस्व वसूल करने वाले अधिकारियों का भ्रष्ट आचरण और कड़ा व्यवहार शासकों की धार्मिक नीति आदि कुछ कारणों का कृषकों पर ऐसा विनाशकारी असर नहीं पड़ा था। जबकि भारत में औपनिवेशिक शासन कायम होने के बाद जो शोषणकारी नीतियाँ अपनाई गई उनका भारतीय किसान एवं आदिवासियों पर काफी विनाशकारी प्रभाव पड़ा। इस काल में भारतीय अर्थव्यवस्था में निम्नलिखित परिवर्तन हुए-

  • अंग्रेजी भूराजस्व बंदोबस्त, नए करों का बढ़ता बोझ, किसानों को उनकी जमीन से बेदखल किया जाना, आदिवासी भूमि पर कब्जा।

  • राजस्व वसूलने वाले बिचौलिए, बिचौलिए काश्तकार और महाजनों के उदय से ग्रामीण समाज का शोषण तेजी से बढ़ना और मजबूत होना।

  • भारतीय बाजारों में ब्रिटेन के बने माल के आ जाने से भारतीय हथकरघा और हस्तशिल्प उद्योग का विनाश और फलस्वरूप कृषि पर बढ़ता हुआ दबाव।

  • भारत से इंग्लैंड की ओर धन की निकासी।

स्पष्टत: इन प्रशासनिक और आर्थिक परिवर्तनों व औपनिवेशिक शासन के शोषण से तंग आकर अपनी रक्षा हेतु किसानों ने विद्रोह का सहारा लिया।

एक बात ध्यान देने योग्य है कि औपनिवेशिक शासन के अंतर्गत जो कृषक विद्रोह हुए, उनकी प्रकृति भिन्न-भिन्न थी। ब्रिटिश शासन काल में कृषकों के विद्रोहों को तीन वर्गो में विभाजित किया जा सकता है-

  • असैनिक अथवा पुनर्स्थापन विद्रोह के रूप में।

  • धार्मिक विद्रोह के रूप में।

  • विशुद्ध रूप से कृषक आंदोलन के रूप में।

पुनर्स्थापन स्वरूप के कृषक विद्रोहों का मूल उद्देश्य अंग्रेजों का निष्कासन तथा पुरानी सरकार और कृषक संबंधों को पुन:स्थापित करना होता था। ये विद्रोह अधिक भूराजस्व आरोपण के विरुद्ध अथवा प्रतिशोधात्मक प्रयास के रूप में अंग्रेजों को निष्कासित करने के उद्देश्य से हुए थे ताकि पुरानी व्यवस्था स्थापित की जा सके। सन्‌ 1765 से सन्‌ 1857 की अवधि के मध्य इन विद्रोहों का नेतृत्व हिन्दू, मुसलमान, छोटे शासकों, राजाओं, नवाबों अथवा आदिवासी सरदारों ने किया था, जिनका कृषक समुदाय और कुछ स्थानों पर सैनिकों ने पूर्ण समर्थन किया था। सबसे महत्वपूर्ण पुनर्स्थापन विद्रोह सन्‌ 1857 का विद्रोह था जिनमें कृषकों व स्थानीय सैनिकों ने जमींदारों व स्थानीय शासकों को पूर्ण समर्थन दिया था।

बहावी आंदोल, बंगाल का फराजी आंदोलन और पंजाब के आंदोलन आदि धार्मिक स्वरूप के कृषक विद्रोह की कोटि में परिगणित किए जा सकते हैं। इन आंदोलनों का स्वरूप प्राय: धार्मिक मसीही होता था। इनका आरंभ धार्मिक और सामाजिक सुधार आंदोलनों के रूप में होता था जो शीघ्र ही बिना किसी धार्मिक भेदभाव के नये जमींदारों, भूस्वामियों, महाजनों पर आक्रमण करके, कृषक असंतोष को अभिव्यक्त कर देते थे। इनका सामूहिक स्वरूप होता था और वे कृषक वर्ग के पूर्ण रूपान्तर के आकांक्षी थे। उन्हें विश्वास था कि यह आकांक्षा अलौकिक अथवा दैविक साधनों से ही संभव होगी। सन्‌ 1850 के उपरान्त होने वाले कृषक विद्रोह यथार्थ में विशुद्ध रूप से कृषक आंदोलन थे। इन विद्रोहों में कृषकों का बाहुल्य रहता था और कृषकों ने ही इनका नेतृत्व प्रदान किया। इन विद्रोहों का आरंभ शांतिपूर्ण सामूहिक बहिष्कार अथवा मूल आधार की मांग से होता था किन्तु इन मांगो की उपेक्षा होते देख अंत में यह प्रतिहिंसा और प्रतिशोध की कार्यवाही में बदलकर उग्ररूप धारण कर लेता था। संथाल आदिवासियों के सन्‌ 1855 और सन्‌ 1870 के विद्रोह, सन्‌ 1860 का बंगाल में नील कृषकों का विद्रोह, सन्‌-1875 का दक्षिण भारत के कृषकों का विद्रोह और सन्‌ 1921 का मोपला विद्रोह प्रमुख सामूहिक विद्रोह हैं। इन विद्रोहों के माध्यम से कृषकों ने अपनी न्यायोचित मांगों के समर्थन में स्थानीय जमींदारों और महाजनों, विदेशी बागान मालिकों एवं भारत स्थित ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध सशस्त्र संघर्ष किया। इन सामूहिक विद्रोहों की उल्लेखनीय उपलब्धियाँ भी रहीं।

20वीं शताब्दी के कृषक विद्रोह पिछली शताब्दी के विद्रोह से अधिक व्यापक, प्रभावी, संगठित व सफल थे। इस परिवर्तन के सूत्र कृषक आंदोलन एवं भारतीय राष्ट्रीय स्वाधीनता संघर्ष के अन्योन्याश्रय संबंधों में थे। राष्ट्रीय आंदोलन ने अपना संघर्ष तीव्र करने के लिये सामाजिक सुधार बढ़ाने की कोशिश के क्रम में किसानों से नजदीकियां स्थापित कीं और दूसरी ओर किसानों ने राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़ने के लाभों को देखकर तन-मन-धन से उसे समर्थन देना प्रारंभ किया।