किसानों के आंदोलन एवं विद्रोह (Movement and uprising of farmers) Part 2 for Competitive Exams

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किसान सभा का गठन

1857 के विद्रोह के पश्चातवित रुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्र्‌ुरुक्ष्म्ग्।डऋछ।डम्दव्रुरू अवध के तालुकेदारों को उनकी भूमि लौटा दी गयी। इससे प्रांतों में कृषि व्यवस्था पर तालुकेदारों या बड़े जमींदारों का नियंत्रण और बढ़ गया। कृषकों का एक बड़ा वर्ग इन तालुकेदारों के अत्याचारों से पीड़ित था, जिनमें-लगान की ऊंची दरें, भूमि से बेदखली, अवैध कर तथा नजराना इत्यादि सम्मिलित थे। प्रथम विश्व युद्ध के उपरांत अनाज तथा अन्य आवश्यक चीजों के दाम अत्यधिक बढ़ गए। इससे उत्तर प्रदेश के किसानों की दशा अत्यंत दयनीय हो गयी।

मुख्यतया होमरूल लीग की गतिविधियों के कारण उत्तर प्रदेश में किसान सभाओं का गठन किया गया। फरवरी, 1918 में गौरीशंकर मिश्र तथा इंद्रनारायण दव्वेदी ने उत्तर प्रदेश किसान सभा का गठन किया। इस कार्य में मदन मोहन मालवीय ने योगदान दिया। 1919 के मध्य तक इसकी लगभग 500 शाखाएं गठित की जा चुकी थीं। किसान सभाओं के गठन से संबंद्ध प्रमुख नेताओं में झिंगुरी सिंह, दुर्गापाल सिंह एवं बाबा रामचन्द्र का नाम भी सम्मिलित है। जून, 1920 में बाबा रामचन्द्र ने जवाहर लाल नेहरू से इन गाँवों का दौरा करने का आग्रह किया। तत्पश्चात नेहरू ने इस आग्रह को स्वीकार करते हुए इन गाँवो का दौरा किया तथा गाँववासियों से गहन संपर्क स्थापित किया।

राष्ट्रवादी नेताओं में मतभेद के कारण अक्टूबर, 1920 में ’अवध किसान सभा’ का गठन किया। अवध किसान सभा ने किसानों से बेदखल जमीन न जोतने और बेगार न करने की अपील की। सभा ने इन नियमों का पालन न करने वाले किसानों का सामाजिक बहिष्कार करने तथा अपने विवादों को पंचायत के माध्यम से हल करने का आग्रह किसानों से किया।

जनवरी, 1921 में कुछ क्षेत्रों में स्थानीय नेताओं की गलतफहमी एवं आक्रोश के कारण किसान आंदोलन ने हिसंक रूप अख्तियार कर लिया। इस दौरान किसानों ने बाजारों, घरों एवं अनाज की दुकानों पर धावा बोलकर उन्हें लूटा तथा पुलिस के साथ उनकी हिंसक झड़पें हुयीं। रायबरेली, फैजाबाद एवं सुल्तानपुर इन गतिविधियों के प्रमुख केन्द्र थे।

धीरे-धीरे सरकारी दमन के कारण आंदोलन कमजोर पड़ने लगा। इसी बीच सरकार ने ’अवध मालगुजारी रेंट (किराया) संशोधन अधिनियम’ पारित कर दिया। इसने भी आंदोलन को कमजोर किया। मार्च, 1921 तक आंदोलन समाप्त हो गया।

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