किसानों के आंदोलन एवं विद्रोह (Movement and Uprising of Farmers) Part 5

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पबना आंदोलन

19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बंगाल के पबना नामक स्थान पर भी किसानों ने जमींदारी शोषण के विरुद्ध विद्रोह किया। यह विद्रोह जितना अधिक जमींदारों के विरुद्ध था उतना सूदखारों और महाजनों के विरुद्ध नहीं। 1870-80 के दशक में पूर्वी बंगाल (आधुनिक बांग्ला देश) के किसानों ने जमींदारों दव्ारा बढ़ाए गए मनमाने करों के विरुद्ध अपना विद्रोह प्रकट किया। पबना आर्थिक दृष्टि से समृद्ध इलाका था। 1859 में अनेक किसानों की जमीन पर कुछ स्वामित्व दिए गए थे। उन्हें जमीन से बेदखल नहीं किया जा सकता था। लगान वृद्धि पर भी अंकुश लगाया गया था। इसके बावजूद जमींदार मनमाने ढंग से लगान बढ़ा देते थे। किसानों को अन्य तरीकों से भी शोषण किया जाता था। 1873 में पबना कि किसानों ने अपना एक संघ कायम किया। इस संघ ने जमींदारों के शोषण के विरुद्ध किसानों को संगठित किया। किसानों की सभाएँ गाँव-गाँव में हुई। जमींदारों से मुकदमें लड़ने के लिए धन राशि एकत्रित की गई। किसानों ने लगान देना कुछ समय के लिए बंद कर दिया। धीरे-धीरे पबना के किसानों की प्रेरणा से ढाका, मैमनसिंह, त्रिपुरा, फरीदपुर, राजशाही इलाकों में भी किसानों ने सामंतों का विरोध किया। बंगाल के जमींदारों ने किसानों का विरोध किया लेकिन शांति भंग नहीं हुई। किसान शांतिपूर्ण तरीके से अपने हितों की सुरक्षा की माँग कर रहे थे। उनका आंदोलन सरकार विरोधी भी नहीं था।

पबना आंदोलन की अप्रत्यक्ष रूप से सरकार का समर्थन प्राप्त हुआ क्योंकि यह सरकार विरोधी नहीं था। 1873 में बंगाल के लेफ्टिनेंट गर्वनर (राज्यपाल) कैंपवेल ने किसान संगठनों को जायज ठहराया। बंगाल के जमींदारों ने इस आंदोलन को साप्रदायिक रंग देना चाहा। जमींदारों के समाचार-पत्र हिन्दू पेट्रियाट ने इसके हिन्दू जमींदारों के विरुद्ध मुसलमान किसानों का आंदोलन माना लेकिन वस्तुस्थिति ऐसी नहीं थी। इस आंदोलन में हिन्दू-मुसलमान समान रूप से सम्मिलित थे। आंदोलन के नेता भी दोनों वर्गों मेंं आते थे, जैसे ईशान चन्द्र राय, शम्भु पाल एवं खुदी मल्लाह। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप 1885 का बंगाल काश्तकरी कानून (बंगाल टिनेंनसी एक्ट) (अधिनियम) पारित हुआ जिसमें किसानों को कुछ राहत पहुँचाने की व्यवस्था की गई।