रजवाड़ों की जनता के आंदोलन (People's Agitation in Princely States) Part 3

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1935 के एक्ट (अधिनियम) का प्रभाव

1935 के एक्ट का रियासतों की जनता पर काफी गहरा प्रभाव पड़ा। इस एक्ट के अनुसार एक अखिल भारतीय संघ की स्थापना की व्यवस्था की गई, जिसमें रजवाड़ों को 38 प्रतिशत तक सीट (स्थान) आवंटित किया गया। इसका प्रभाव यह पड़ा कि पहले तो रजवाड़ों की जनता को लगा कि वे भारत के अंग हैं, एवं दूसरा यह कि कांग्रेस एवं शासन दोनों अंग्रेजों की इस चाल को भाप गए कि वे राष्ट्रीय ताकतों को तोड़ना चाहते हैं।

1937 के चुनाव का प्रभाव

1937 के चुनावों के पश्चात्‌ कांग्रेस कई प्रांतों में सत्तासीन हुई, अब वह महज एक पार्टी (दल) नहीं थी, अपितु शासक वर्ग भी थी, जो अपने शासित प्रांतों के पड़ोसी रियासतों पर प्रभाव डाल सकती थी। इसके शासन में आने का प्रभाव भी पड़ा। रियासतें नवीन सुधारों से अनुप्राणित हो, संघर्ष के लिये कसमकस हो उठी। अनेक रियासतों में जहाँ कोई संगठन नहीं था, वहाँ बड़ी संख्या में प्रजामंडलों का गठन हुआ। हैदराबाद, मैसूर, ट्रावणकोर, जयपुर, कश्मीर आदि रियासतों में जन संघर्ष बृहत पैमाने पर प्रारंभ हुआ। इन संघर्षों में नेतृत्व देने वाले कतिपय नाम थे-शेख अब्दुल्ला, यू.एन. ढेबर, जमनालाल बजाज आदि।

अब इन नये घटनाक्रमों से प्रभावित होकर कांग्रेस ने भी अपना रूख बदला। 1938 के हरिपुरा अधिवेशन में यह मानने वाली कांग्रेस कि रियासतों में किसी भी प्रकार का राजनीतिक आंदोलन कांग्रेस के नाम पर न हो, 1939 के त्रिपुरी अधिवेशन में इस बात को स्वीकार कर लिया कि अब कांग्रेस के नाम पर भी रियासतों में आंदोलन हो सकते हैं। इस नीति में परिवर्तन के मुख्य कारण निम्न थे:

  • अब रियासत की जनता संघर्ष पर उतारू थी।

  • वह राजनतिक रूप से जागरूक हो चुकी थी।

  • सोशलिस्टों (समाजवादी) एवं वामपंथियों का भी दबाव था।

  • अब रियासतों एवं ब्रिटिश भारत के मध्य के सारे अवरोध टूट चुके थे। गांधी जी के अनुसार अब कांग्रेस भी काफी सशक्त हो चुकी थी। ब्रिटिश शासन से अब डरने की बात नहीं थी।

1939 में ही लुधियाना के ऑल (पूरे) इंडिया (भारत) पीपुल्स (लोग) कांग्रेस में जवाहर लाल को अध्यक्ष चुना गया एवं ब्रिटिश भारत देसी रियासतों में छिड़े आंदोलन अब खुले रूप में एक दूसरे से जुड़ गए।

1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का प्रभाव

सन्‌ 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन का प्रभाव देशव्यापी था। गांधी जी ने कहा था कि यह आंदोलन सिर्फ ब्रिटिश भारत का नहीं, बल्कि संपूर्ण भारत का आंदोलन है एवं सारे भारतीवासी इसमें शरीक होंगे। फलत: रियासतों ने भी इस आंदोलन में अपना तीव्र तेवर दिखाया।

जब दव्तीय विश्व युद्ध एवं भारत छोड़ो आंदोलन के पश्चात्‌ सत्ता हस्तांतरण की बात होने लगी तो विभिन्न रियासतों के भारत में विलय पर जोरदार संघर्ष प्रारंभ हुआ। भारत में विलय हेतु देशी रियासतों में जो अंांदोलन चलाया गया उसे ’ज्वाइन (संयोग) इंडिया (भारत) आंदोलन’ कहा गया। इधर अंग्रेजों ने अपना पेंच लगा दिया एवं रियासतों को स्वाधीन रहने का अधिकार दे दिया गया। फलत: समस्या विकट हो गई।

स्वतंत्रता के पश्चात्‌ कई रियासतों के राजाओं ने अपनी तथा जनता की इच्छा के अनुसार भारत में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर कर दिये, परन्तु कुछ रियासतों ने स्वाधीन रहने की इच्छा प्रकट की, जैसे-हैदराबाद, ट्रावणकोर, जूनागढ़, कश्मीर आदि। धीरे-धीरे सभी रियासतें भारत में मिल गई। केवल हैदराबाद ने मिलने की इच्छा प्रकट नहीं की। 13 सितंबर, 1948 ई. को भारतीय सेना वहाँ प्रवेश कर गई और उसे भारतीय संघ में शामिल कर लिया गया। भारतीय सेना का हैदराबाद रियासत की जनता ने जबरदस्त स्वागत किया।