व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 11

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रवीन्द्र नाथ टैगोर

टैगोर युग-द्रष्टा एवं युग-पुरुष थे। वे भारत के ही नहीं, प्रत्युत विश्व के प्रतिभाशाली व्यक्ति थे। रवीन्द्र नाथ टैगोर ने विश्व में भारत के मस्तक को ऊँचा स्थान दिलाया। उनका व्यक्तित्व विराट था-वे एक साथ ही कवि, नाटककार, कथाकार, उपन्यासकार, दार्शनिक, शिक्षाविद और महान मानवतावादी थे।

महात्मा गांधी ने रवीन्द्र नाथ टैगोर को ’महान संस्कृति रक्षक’ कहा था। टैगोर सार्वभौमिक, विचारशील तथा पूर्ण व्यक्ति थे। उनकी विचारधारा ने विश्व को अनुप्राणित किया और अंतरराष्ट्रीय जगत में उनका योगदान अविस्मरणीय है। आदर के साथ उन्हें ’गुरुदेव’ के नाम से पुकारा जाता था। वे जन्मना और कमणा महान विभूति थे। स्वस्थ-निर्मल काया, उच्च ललाट, ऋषियों की भाँति अविरल और सुदीर्घ दाढ़ियाँ उनके व्यक्तित्व में निखार लाती थीं। वे आध्यात्मिक अनुभव के गहरे ज्ञान से मंडित थे और उनके व्यक्तित्व निर्माण पर वंशानुगत एवं तत्कालीन दशाओं के प्रभाव पड़े थे। टैगोर उच्च एवं कुलीन पारिवारिक परिवेश में पले-बढ़े थे। उनके पिता श्री देवेन्द्र नाथ अपनी धर्मनिष्ठा एवं विदव्ता के लिये महर्षि रूप में प्रसिद्ध थे। रवीन्द्र नाथ के बौद्धिक चिंतन पर उनका गहरा प्रभाव पड़ा। इसके अतिरिक्त प्राचीन पूर्वजों के गौरव एवं कलात्मककता, साथ ही आर्थिक सुरक्षा भी उन्हें प्राप्त थी।

प्राचीन व्यवस्था के उत्तरायण एवं नवीन व्यवस्था के आगमन की संध्या बेला में इस महापुरुष का अवतार हुआ था। उस समय बंगाल में नयी चेतना परिवर्तन के हिलोरे ले रही थी। राजाराम मोहन राय का धार्मिक सुधार आंदोलन जनसामान्य को प्रोत्साहित कर रहा था। इस धार्मिक पुनर्जागरण का प्रभाव रवीन्द्र नाथ टैगोर पर पड़े बिना नहीं रहा। उधर बंकिम चन्द्र चटर्जी के नेतृत्व में साहित्यिक आंदोलन चल रहा था और सुरेन्द्र नाथ बनर्जी भारतीय राजनीति में योगदान दे रहे थे। फलत: रवीन्द्र नाथ टैगोर धार्मिक, राजनीतिक एवं साहित्यिक गतिविधियों से एक साथ प्रभावित हुए।

रवीन्द्र नाथ टैगोर ने उपनिषदों का विशद अध्ययन किया। बुद्ध के शांति, दया, सत्य सिद्धांतों का भी उन्होंने मनन किया। वैष्णव दर्शन का भी टैगोर पर प्रभाव पड़ा। तात्पर्य यह है कि वे पूर्वजों की विचारधारा से पर्याप्त प्रभावित हुए।

7 मई, 1861 को कलकता में पवित्र गंगा तट पर बसे उनके पैतृक घर जोरास्की में, रवीन्द्र नाथ टैगोर का जन्म हुआ था। उनके पूर्वज 17वीं शताब्दी के अंत में खुलना (बंगलादेश) से आकर यहाँ बस गए थे। यहाँ के निवासियों ने इस ब्राह्यण परिवार को ठाकुर कहना शुरू कर दिया और टैगोर नाम यूरापियनों दव्ारा ”ठाकुर” का अपभ्रंश करके दिया गया। इनके दादा दव्ारिका नाथ एक बड़े व्यापारी थे। 8 वर्ष की अवस्था में ही उन्होंने कविता लिखना प्रारंभ कर दिया। 11 वर्ष की अवस्था में वे पिता देवेन्द्रनाथ के साथ हिमालय की यात्रा पर गए। रास्ते में शांति निकेतन में उनका पड़ाव पड़ा। इस स्थान की प्राकृतिक सुषमा ने उन्हें बहुत प्रभावित किया। पिता ने उन्हें संस्कृत, खगोलशास्त्र एवं अंग्रेजी तथा उपनिषदों एवं रामायण की शिक्षा दी।

रवीन्द्र नाथ टैगोर की प्रारंभिक शिक्षा घर पर हुई किन्तु विद्यालयीय शिक्षा में उनका मन न लगा। घर पर ही संस्कृत, व्याकरण, बांग्ला, अंग्रेजी, गणित, इतिहास, भूगोल, शरीर विज्ञान एवं संगीत की शिक्षा उन्हें सुयोग्य शिक्षकों दव्ारा दी गयी।

अपने बड़े भाई सत्येन्द्र नाथ ठाकुर, जो कि भारतीय सिविल (नागरिक) सेवा के प्रथम भारतीय सदस्य थे, के साथ वे 20 सितंबर, 1878 को इंग्लैंड गए। इसके पूर्व उनका काव्य संग्रह ’कवि कोहिनी’ प्रकाशित हो चुका था। इंग्लैंड में भी उनका मन न लगा और 1880 में वे भारत लौट आये। दिसंबर, 1883 में उनका पाणिग्रहण संस्कार भवतारिणी देवी से हुआ और इसके बाद बड़ी कुशलता से वे जमींदारी के प्रबंध में लग गए।

टैगोर ने 1859 में बंगाल प्रादेशिक सम्मेलन के अधिवेशन में उपस्थित होकर बंगाल को राजनीतिक एवं सांस्कृतिक दृष्टि से विभक्त करने की साम्राज्यवादी कुटिल नीति की तीव्र भर्त्सना की। 1905 में बंगभंग के अनन्तर रवीन्द्र नाथ टैगोर राष्ट्रीय आंदोलन में काफी सक्रिय हुए और आंदोलन में हिंसा के प्रवेश से निराश होकर वे शांति निकेतन चले गए और सक्रिय राजनीति से संन्यास ले लिया।

शांति निकेतन के सुशांत परिवेश में रवीन्द्र नाथ टैगोर ने प्राचीन शिक्षा प्रणाली की शुरूआत की। वास्तव में वे अपनी संतानों (टैगोर की पांच संतान थीं) को विद्यालय शिक्षा नहीं देना चाहते थे, अत: उपनिषदों एवं वेदों में वर्णित शिक्षा प्रणाली के आधार पर 22 दिसंबर, 1901 को शांति निकेतन में एक आश्रम की व्यवस्था की। शिष्यों के रूप में उनकी संताने इसमें भरती हुई। आश्रम की शिक्षा का मुख्य उद्देश्य था-संपूर्ण विश्व को एकता के सूत्र में बांधने की विचारधारा का विकास।

मई, 1912 में टैगोर यूरोप गए। इसी समय गीताजंलि का अंग्रेजी संस्करण प्रकाशित हुआ, जिसकी साहित्यिक समाज में धूम मच गयी। यह काव्य संग्रह टैगोर के बौद्धिक विकास एवं आध्यात्मिकता का मानदंड था। मुलत: यह बंगाली में लिखा गया था। डब्ल्यू.बी. कीट्‌स ने इस रचना को सर्वोच्च सांस्कृतिक कार्य माना था। 1913 में गीतांजलि के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला।

जून, 1915 में टैगोर को ब्रिटिश सरकार ने ’सर’ की उपाधि दी और कई विश्वविद्यालयों ने ’डी. लिट. की उपाधि से उन्हें सम्मानित किया। 1918 में रौलट एक्ट के विरुद्ध सरकार ने दमनात्मक रवैया अपनाया था इसे निंदनीय बताते हुए उन्होंने अपनी ’सर’ की उपाधि का परित्याग कर दिया और लिखा कि सरकार ने जो पाशविक दमन चक्र चलाया है उसका उदाहरण सभ्य शासन के इतिहास में कहीं नहीं मिलता।

22 दिसंबर, सन्‌ 1918 को रवीन्द्र नाथ टैगोर ने ’विश्व भारती’ की स्थापना की जिसमें जुलाई 1919 से शिक्षण कार्य प्रारंभ हो गया। यह सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाने का केन्द्र है।

1920 में टैगोर पुन: विदेश गए। उन्होंने यूरोपीय महादव्ीप के अनेक देशों में यात्रांए करके अपने विचारों पर प्रकाश डाला। उनका मानना था कि यूरोपीय जहांँ उसका झुकाव समस्त मानवता की ओर है अपने परिवेश में सर्वश्रेष्ठ है, परन्तु जहाँ झुकाव अपनी संकीर्ण प्रवृत्ति के कारण अपने हितों की ओर हो जाता है, तथा वह अपनी शक्ति का प्रयोग मानवता विरोधी लक्ष्यों के लिये करने लगता है, वहाँं यूरोप एक सबसे बड़ी बुराई है।

टैगोर का मंतव्य था कि पूर्व की चेतना अभी जीवन्त है, पश्चिम के लोगों को उससे सीखना चाहिए। उनका यह भी कहना था कि पश्चिम के अनुभवों से पूर्व को लाभान्वित होना चाहिए। इस प्रकार सार्वभौमवाद एवं मानवतावाद की धारणा के वे प्रचारक थे।

विश्व युद्ध से वे काफी क्षुब्ध हुए थे। अस्सी वर्ष की आयु में 7 अगस्त, 1947 को महायोगी, भारत का महान सपूत जो अर्द्धशताब्दी से भी अधिक समय तक संपूर्ण विश्व को अपने विचार-आलोक से आलोकित करता रहा, इस नश्वर संसार को अलविदा कह गया।