व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 18

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स्वामी विवेकानंद

स्वामी विवेकानंद भारत के आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के प्रखर चिंतक थे। सुभाष चन्द्र बोस ने उन्हें भारतीय राष्ट्रवाद के आध्यात्मिक पिता की संज्ञा दी है।

उनके बचपन का नाम नरेंद्र नाथ था। वे रामकृष्ण परमहंस के शिष्य थे एवं उनके विचारों से गहरे रूप में प्रभावित थे। विवेकानंद ने अपनी समस्त विचार शक्ति को अपने गुरु की विचारधारा से उत्पन्न माना।

नव वेदांतवाद के प्रवर्तक

स्वामी विवेकानंद नव वेदांतवाद के प्रणेता थे। भारत में उपनिषदों की दार्शनिक परंपरा को शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य आदि ने और भी आगे बढ़ाया। पर 14वीं 15वीं शताब्दी के बाद भारत में दार्शनिक चिंतन एवं विकास की परंपरा रुक सी गई। विवेकानंद ने शंकर एवं रामानुज के दार्शनिक विचार पद्धति का पुनरावलोकन किया एवं नव वेदांतवाद का प्रतिपादन किया। उन्होंने उपनिषद् के धार्मिक संदेशों एवं तात्विक विश्लेषणों को समकालीन भारतीय समाज की आवश्यकताओं के अनुसार जोड़ने का प्रयास किया।

स्वामी विवेकानंद सगुण भक्ति में विश्वास रखते थे। वे काली के उपासक थे और अक्सर अपने गुरु के साथ कलकत्ता के दक्षिणेश्वर मंदिर में जाया करते थे। सज योग नामक ग्रंथ में उन्होंने यौगिक क्रियाओं दव्ारा ईश्वर की प्राप्ति का उल्लेख किया है। प्रेम योग में उन्होंने प्रेम को व्यापक मानवीय गुण के रूप में स्वीकार किया एवं इसे भी ईश्वर प्राप्ति का एक मार्ग बताया। ज्ञान योग में उन्होंने निर्गुण, निराकार ब्रह्य के प्रति भक्ति का प्रतिपादन किया। इस प्रकार स्वामी विवेकानंद ने अलग-अलग भक्ति पद्धति को स्वीकार कर उनके बीच समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। विवेकानंद की यह कोशिश धार्मिक क्षेत्र में उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि है।

शिकागो धर्म सम्मेलन

विवेकानंद ने शिकागो विश्वधर्म सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इस सम्मेलन में उन्होंने वैदिक धर्म की महत्ता पर प्रकाश डाला। इससे भारतीय धर्म का गौरव बढ़ा। साथ ही भारत का आध्यात्मिक दर्शन पश्चिम के उपभोक्तावादी दर्शन के संपर्क में आया। अनेक पाश्चात्य विदव्ानों की रुचि भारतीय दर्शन में बढ़ी एवं उनके दव्ारा भारतीय दर्शन पर विविध संधान कार्य किए गए। इस प्रकार उन्होंने भारतीय एवं पाश्चात्य दर्शन के बीच सेतु संबंधी का कार्य किया।

सामाजिक चिंतन

पर उनका सबसे अधिक जोर सामजिक क्रिया पर था। उन्होंने कहा कि वास्तविक दुनिया में ज्ञान यदि कर्म से हीन है तो वह व्यर्थ है। अपने गुरु की तरह उन्होंने भी सभी धर्मों की बुनियादी एकता की घोषणा की तथा धार्मिक बातों में संकुचित दृष्टिकोण की निंदा की। 1898 में उन्होंने लिखा कि हमारी अपनी मातृभूमि के लिए दो महान धर्मों-हिन्दुत्व तथा इस्लाम का संयोग ही एकमात्र आशा है।

उन्हाेेंने भारतीयों की आलोचना की कि बाकी दुनिया से कटकर वे जड़ और मृतप्राय हो गए हैं। उनका मानना था कि दुनिया के अन्य राष्ट्रों से हमारा अलगाव ही हमारे पतन का कारण है और शेष दुनिया की धारा में समा जाना ही इसका एकमात्र समाधान है, गति जीवन का चिह्‌न है।

विवेकानंद ने जातिप्रथा को तथा कर्मकांड पूजा पाठ और अंधविश्वास पर जोर देने की निंदा की तथा जनता से स्वाधीनता, समानता एवं स्वतंत्र चिंतन की भावना अपनाने का आग्रह किया। विचारों की स्वतंत्रता के बारे में कहा-विचार और कर्म की स्वतंत्रता जीवन, विकास तथा कल्याण की अकेली शर्त है। जहांँ यह न हो वहाँं मनुष्य, जाति तथा राष्ट्र सभी पतन के शिकार होते हैं।

वे एक महान मानवतावादी थे। देश की साधारण जनता की गरीबी, बदहाली और पीड़ा से उन्हें काफी तकलीफ हुई थी। उन्होंने कहा-मैं एक ही ईश्वर को मानता हूँ जो सभी आत्माओं की एक आत्मा है और सबसे ऊपर है। मेरा ईश्वर दुखी मानव है, मेरा ईश्वर पीड़ित मानव है। मेरा ईश्वर हर जाति का निर्धन मुनष्य है।

विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की। इसने दो महत्वपूर्ण कार्य किए- आध्यात्मिक संवेदना का विकास एवं राष्ट्रवादी शिक्षा। मिशन ने देशभर में अनेक विद्यालय-महाविद्यालय, चिकित्सालय, दवाखाने, अनाथालय, पुस्तकालय आदि खोलकर सामाजिक सेवा के कार्य किए।