व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 19

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भीमराव अंबेडकर

भीमराव अंबेडकर मनुष्य को मनुष्य की तरह जीने का हक देने के पक्षधर थे। छुआछुत जैसी घिनौनी एवं निकृष्टतम सामाजिक व्यवस्था को वे पशुता की संज्ञा देते थे ऋग्वेद की उन्होंने कठोर शब्दों में आलोचना की। वे असवर्णो को सवर्णों से पृथक मानते थे। असवर्णों को हिन्दू मानने में भी वे जीवन के अंतिम दिनों में संकोच करने लगे। इसका अर्थ यह कत्तई नहीं माना जाना चाहिए कि अंबेडकर किसी जातीय सीमा में बंधे थे। संविधान शिल्पी भीमराव अंबेडकर ने जिस संविधान की संरचना की थी, उसमें सबके लिये समान अधिकार की बात है। अत: असमानता का बीज बोने के लिये अंबेडकर को उत्तरदायी मानना एक प्रकार की बौद्धिक बेइमानी होगी। सच्चाई तो यह है कि वे समाज के प्रत्येक व्यक्ति की आजादी के प्रवक्ता थे, सांप्रदायिक ताकतों के कटु आलोचक भी। 5 फरवरी, 1950 को सदन में अपने विचार व्यक्त करते हुए अंबेडकर ने कहा, ” भारत शताब्दियों के पश्चात्‌ आजाद हुआ है, स्वराज्य की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। भारत में किसी भी प्रकार की फूट हमारा स्वराज्य हमसे छीन लेगी।”

भीमराव अंबेडकर तमाम विसंगतियों में जीने के बाद भी राष्ट्र को प्रमुख मानते थे, वे प्रत्येक व्यक्ति की आजादी चाहते थे, उन्हें पूर्णतया राष्ट्रवादी माना जा सकता है। अपनी पुस्तक थॉट्‌स (विचार) ऑन (पर) पाकिस्तान में उन्होंने लिखा है कि मुसलमानों के लिये उनका मजहब सर्वोपरि होने के कारण उन्हें जनतंत्र की कल्पना समझ में नहीं आ सकती। उनकी राजनीतिक मजहब प्रधान है। अपने प्रतिगामी विचारों के साथ ही वे सारे विश्व में पहचाने जाते है। उनका बंधुत्व केवल मुसलमानों तक ही सीमित होता है। हम पहले भारतीय है और बाद में हिन्दू अथवा मुसलमान।

अंबेडकर ने असवर्णों के लिये पृथक मतदान की व्यवस्था पर जोर दिया था, हालाँकि गाँधी जी ऐसा नहीं चाहते थे, किन्तु अंबेडकर के पास जातिवाद के कटु अनुभव थे और उन्हें ऐसा लगता था दलितों के उद्धार के लिये संघर्ष ही विकल्प है, हाँ यह बात अवश्य हुई कि दलितों के आर्थिक उद्धार के लिये कोई ठोस कार्यक्रम वे नहीं दे पाये। संभवत: यही वजह है कि संविधान में दलितों को आरक्षण दिलवाकर उन्होंने एक क्रांतिकारी कार्य तो किया किन्तु उनका कल्याण नहीं हुआ। नि:संदेह यह समाज की मानसिकता का परिणाम हो सकता है, किन्तु इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आर्थिक समृद्धि के लिये कार्यक्रम का अभाव ही दलितों को उद्धार न करा सका।

प्राय: यह आक्षेप लगाया जाता है कि अंबेडकर ने संस्कृत ग्रंथों की आलोचना पूर्वाग्रह ग्रस्त होकर की है। यह आरोप दुराग्रहपूर्ण है क्योंकि संस्कृत ग्रंथो से बहुत से तर्क उन्होंने ढूँढे, तब ऋग्वेद, मनुस्मृति आलोचना के विषय बने; किन्तु इसमें वेदों का महत्व घटाने की उनकी मंशा नहीं थी। ’लाइट (रोशनी) ऑफ (के) एशिया’ और ’ज्ञान का भंडार’ होते हुए भी इनमें कुछ ऐसी आपत्तिजनक बातें अवश्य हैं, जिनका विरोध तर्कसंगत है।

26 जनवरी, 1950 को अंबेडकर ने भारतीय संविधान को आत्मर्पित करते हुए कहा था कि हम भारत के सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा एवं अवसर की समानता आदि के अधिकार देने की घोषणा करते हैं। आज से सभी नागरिकों को इन अधिकारों को समान रूप से पाने का अधिकार प्राप्त हो गया।

अंबेडकर ने सामाजिक व्यवस्था के विविध पक्षों को शास्त्रीय एवं व्यावहारिक दोनों दृष्टियों से देखा था और अपनी अद्भुत विश्लेषण क्षमता से उन्होंने परिस्थितियों की विषमता से संघर्ष करने का संकल्प लेने वालों को प्रेरणा दी। भारतीय समाज के विषमतामूलक तत्वों को जड़ से उखाड़ने के लिये उनके क्रांतिकारी विचार आज भी प्रासंगिक हैं। आज उनके यथार्थ मूल्यांकन की आवश्यकता है जिसने अपनी साधना से समाज को एक नव्य जीवन दृष्टि दी है।