व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 2

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महात्मा गांधी और धर्म

जब भी गांधी के विषय में कोई चर्चा होती हैं, मुख्य रूप से उनके दो विशिष्ट पहलू सामने आते हैं। ये दो पहलू हैं उनकी धार्मिक आस्था और उनकी राजनीतिक गतिविधियां। वे या तो एक धार्मिक संत के रूप में समझे जाते हैं या एक सक्रिय राजनीतिज्ञ के रूप में। इसमें संदेह नहीं कि उन्होंने दोनों ही भूमिकाएं सफलतापूर्वक निभायीं। उनकी कौन सी भूमिका अधिक महत्व रखती हैं? यह प्रश्न बड़ा जटिल है। वे लगभग 50 वर्षों तक राजनीतिक के क्षेत्र में डटे रहे और बहुत लंबे समय तक भारतीय राजनीति के केन्द्रबिन्दु बने रहे। उनके इसी पक्ष की चर्चा अधिक हुई है और इसी पक्ष के आधार पर प्राय: उनका मूल्यांकन भी हुआ है। बहुत बड़ी संख्या में लोग उनके समर्थक रहे हैं और उनका विरोध करने वालों की भी कमी नहीं रही है। यदि हम इस विषय पर गहराई से अध्ययन करें तो एक बात स्पष्ट हो जाती है: उनकी राजनीतिक अवधारणाओं का मूल्यांकन प्राय: गलत संदर्भ में हुआ है। राजनीति के कुछ परंपरागत सिद्धांत के आधार पर यह मान लिया गया है कि गांधीवादी राजनीति चाहे जितनी महान हो, अव्यावहारिक ही है। इसलिए उनके राजनीति विचारों का जीवन में कोई विशेष महत्व नहीं है। इसी तरह के विचार तब भी प्रकट किए जाते हैं जब उनकी धार्मिक आस्थाओं की बात आती है। प्राय: यह कहा जाता है कि वे महज एक परंपरावादी थे जिनके पास न तो शंकर अथवा कांट की दार्शनिक अंतदृष्टि थी न ही कोई मौलिक अवधारणा। यह भी कहा जाता है कि गांधी धर्म राजनीति को दो अलग-अलग पहलुओं के रूप में नहीं समझ सके और दोनों पहलुओं को एक ही नजर से देखने के फलस्वरूप वे न तो पूर्णरूप से धार्मिक संत ही रह पाये न पूर्णरूप से राजनीतिज्ञ। ऐसी धारणा वाले लोग अक्सर यह भूल जाते हैं कि गांधी मूलत: एक धार्मिक संत थे, किन्तु उनकी धार्मिकता जिस संदर्भ में प्रस्फूटित हुई थी उस संदर्भ की कल्पना राजनीतिक के बिना की ही नहीं जा सकती। उनकी मूलभूत आस्थाएं धार्मिक थीं किन्तु राजनीति में उनका प्रवेश एक अनिवार्य आवश्यकता थी। अगर वे केवल धार्मिक संत या केवल राजनीतिज्ञ हो जाते तो उनका दर्शन एकांगी होकर रह जाता। वे धर्म से बाहर राजनीति की बात नहीं कर सकते थे और राजनीति के बिना उनका धर्म केवल कपोल-कल्पना मात्र रह जाता। दोनों भूमिकाओं को समानान्तर रूप से निभाना उनके लिए आवश्यक था, यही उन्होंने किया था। जैसा कि स्पष्ट ही है, उनकी समस्त राजनीतिक विचारधारा का आधार ही उनकी धार्मिक आस्था है। ये कौन सी आस्थाएं थीं, इनका क्या स्त्रोत था, और कैसे इनका प्रस्फूटन हुआ-इन प्रश्नों के उत्तर खोजे जाएं, यह आवश्यक है।

इससे पहले कि ये आस्थाएं क्या थीं और इनका प्रस्फूटन कैसे हुआ, इन प्रश्नों के उत्तर खोजे गए, यह आवश्यक है कि इन आस्थाओं के मूल स्त्रोतों की चर्चा कर ली जाए। गांधी एक परंपरावादी वैष्णव परिवार में पैदा हुए थे और इस परंपरा का प्रभाव उनके ऊपर जीवनपर्यन्त रहा। उनके जीवन में कुछ ऐसी बातें भी देखने को मिलती हैं जिनका संभवत: कोई तार्किक आधार न हो, किन्तु उनके मूल धार्मिक सिद्धांत दार्शनिक भूमि पर अवस्थित हैं और उनका शुद्ध दार्शनिक आधार भी हैं। इन मौलिक आस्थाओं को जान लेना आवश्यक है। गांधी-दर्शन का मूल स्त्रोत वैदिक दर्शन है जिसके दो महान प्रणेता थे-शंकर और रामानुज। दोनों अदव्ैतवादी हैं किन्तु दोनों में पारस्परिक मतभेद है। जहां शंकर ब्रह्य-ज्ञान की अनुभूति को अनिर्वचनीय मानते हैं वहां रामानुज उसको सहज रूप से प्राप्य और ग्राह्य मानते हैं। गांधी जी में शंकर का प्रभाव यदा-कदा दृष्टिगोचर होता है किन्तु उनकी भावना रामानुज के अधिक निकट प्रतीत होती है। सृष्टिकर्ता अगम्य अवश्य है, किन्तु उसका आभास उसकी सृष्टि में मिल सकता है। वह केवल सृजनहार ही नहीं तारनहार भी हैं और हमारी प्रार्थना उसके कानों तक पहुंच सकती है। उसकी इच्छा के बिना एक पत्ता भी नहीं हिल सकता किन्तु पत्ते का हिलना उसी के अस्तित्व का प्रमाण है। ईश्वर है इसलिए हम हैं। वह सबका पिता है इसलिए उसके पुत्रों को उससे मांगने का अधिकार है। अगर हम सच्चे हृदय से मांगते हैं, तो वह अवश्य देगा। उसी की कृपा से हमारे जीवन के सारे कार्यकलाप संचालित होते हैं। ”ईशावास्यमिदं सर्व”-ईश्वर जब जगह है और सबमें विद्यमान है-यजुर्वेद का यह वाक्य गांधी के धार्मिक विचारों का मूल आधार है। इस सत्य की अनुभूति का स्त्रोत तर्क नहीं, आस्था है। यही सत्य अंतिम सत्य है, यही सत्य सार्वभौमिक है और इसके बाहर निकलकर हम यथार्थ की पहचान नहीं कर सकते। इसी मौलिक वैदिक भावना से गांधी के सत्य-संबंधी विचार प्रस्फुटित हुए हैं।

जब गांधी से पूछा गया कि आखिर ईश्वर है क्या, तो उन्होंने एक सहज तथा बोधग्म्य उत्तर दिया : ”सत्य ही ईश्वर है”। ईश्वर सत्य के अतिरिक्त और कुछ हो नहीं सकता क्योंकि जो ईश्वर है वही सर्वशक्तिमान तथा सर्वत्र विद्यमान है और जो शक्ति ऐसी होगी वह सत्य पर ही अवस्थित हो सकती है। सत्य ही एक ऐसा तत्व है जो बदलता नहीं, हमेशा एक ही रहता है, अपरिवर्तनशील है, यही गुण ईश्वर का भी है। इसलिए सत्य ही ईश्वर है, सत्य सर्वशक्तिमान है क्योंकि केवल सत्य ही ”विद्यामन” है। गांधी का यह सिद्धांत गीता के दव्तीय अध्याय के सोलहवें श्लोक- ”नासतोविद्यते भावो नाभाओ विद्यते सत:”- पर आधारित है। असत्य तो विद्यमान ही नहीं है। अविद्यमान की विद्यमान पर विजय कैसे हो सकती है? इसी बलवती भावना के प्रभाव में गांधी हमेशा निर्भीक और निडर बने रहे। इसी भावना से उनके ”सत्याग्रह” के सिद्धांत का जन्म हुआ है।

सत्याग्रह क्या हैं? अहिंसा के माध्यम से असत्य पर आधारित बुराई का विरोध करना ही सत्याग्रह है गांधी का मानना था कि हर व्यक्ति के अंदर सत्य का अंश विद्यमान है और उसको इस सत्य की अनुभूति करायी जा सकती है। जब भी कोई व्यक्ति (अथवा सरकार) बुरा कार्य करता है तो उसके पीछे उसका भ्रम होता है। अपने अंदर मौजूद सत्य के होते हुए भी वह असत्य के प्रभाव में आ जाता है और बुरा कार्य करने लगता है। अगर हम उसे इस तथ्य का अहसास करा सकें तो उसे सत्य की अनुभूति होने लगेगी और वह असत्य मार्ग से हट जाएगा, सत्य का आग्रह तभी किया जा सकता है जब उसके लिए संभावनायें विद्यमान हों। गांधी जी का अटल विश्वास था कि ये संभावनाये ंहमेशा विद्यमान रहती हैं क्योंकि हर व्यक्ति के अंदर आत्मा होती है जो एक ईश्वरीय अंश है। इसी अंश को उजागर करने की आवश्यकता है। असत्य को असत्य से, बुराई को बुराई से नहीं जीता जा सकता असत्य को सत्य से और बुराई को भलाई से हीं जीता जा सकता है। इस अवधारणा के पीछे गांधी पर बाइबिल का प्रभाव भी स्पष्ट दीख पड़ता है।

इसके अतिरिक्त रूसों और टॉल्सटॉय ने भी उनकी इस मान्यता को बल दिया। गांधी जी आजीवन इस सत्य को आजमाते रहे और स्वयं उन्होंने ही कहा है कि उनकी धारणा कभी भी गलत सिद्ध नहीं हुई, उनके ”सत्य के प्रयोग” ही उनकी आत्मकथा है।

असत्य के विरोध में सत्य का आग्रह कैसे संभव होगा? गांधी जी के अनुसार हृदय-परिवर्तन से ही ऐसा संभव हो सकता है। सत्याग्रही को चाहिए कि वह विरोधी का हृदय-परिवर्तन करे। अगर बुराई करने वाला व्यक्ति आपके डर या भय के कारण बुरा काम छोड़ दे तो इसे सफलता नहीं मानी जा सकती। सत्याग्रही को तो विरोधी को अंदर से यह महसूस करवाना है कि उसका मार्ग असत्य और बुराई का मार्ग है ज्योंहि उसे इस तथ्य का पता लगेगा वह स्वत: ही बुराई छोड़कर भलाई की ओर अग्रसर हो जाएगा। यह संभव है क्योंकि यह एक सहज मानवीय क्रिया है। हर व्यक्ति के अंदर सहानुभूति की संभावनायें विद्यमान रहती हैं इन्हीं को उजागर करना सत्याग्रही का कार्य है, बुराई और अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना ही सत्याग्रह है। इसके लिए सत्याग्रही के पास समुचित आत्म-बल होना चाहिए, आत्म बल के अतिरिक्त नि:स्वार्थ भावना का होना भी आवश्यक है। सत्याग्रही को स्वयं को कष्ट में डालकर, यातनाएं सहकर, तथा सुख का परित्याग करके बुराई का प्रतिरोध करना होगा तभी वह अपने विरोधी को यह महसूस करा सकेगा कि उसके अंदर विरोध करने की शक्ति मौजूद है और वह बुराई के आगे झुकने वाला नहीं है। अंग्रेजों के विरुद्ध गांधी जी ने इसी शक्ति के प्रयोग की बात कही थी और वे जीवनपर्यन्त इसी अस्त्र के सहारे ब्रिटिश-राज के खिलाफ जूझते रहे।

गांधीजी ने सत्याग्रह का मात्र सिद्धांत ही नहीं दिया, वरन्‌ उसकी सफलता के साधनों की भी चर्चा की। सत्याग्रही को अहिंसक बने रहना चाहिए। पूर्णतया निष्क्रिय विरोध से काम नहीं चल सकता। जो अहिंसक हैं केवल वही सही अर्थ में सत्याग्रही भी हो सकता है।

अहिंसा क्या है? किसी व्यक्ति या प्राणी की हत्या न करना मात्र ही अहिंसा नहीं है। अहिंसा तो एक व्यापक नैतिक दृष्टि है, एक ऐसा नजरिया जो प्राणी-मात्र के एकत्व को मानकर चलता है। अहिंसा आत्मा की आवाज है, मस्तिष्क से उत्पन्न होने वाला विचार नहीं। कई परिस्थितियां ऐसी हो सकती हैं, जिनमें मनुष्य व्यक्तिगत आत्म-रक्षा के लिए मरने-मारने पर उतारू हो जाए। ऐसा व्यवहार अहिंसक व्यवहार नहीं कहा जाएगा। लेकिन अगर दूसरे की रक्षा के लिए अपना बलिदान करना पड़े तो इसमें सच्चा सत्याग्रही चूकेगा नहीं। ऐसा वही व्यक्ति कर सकता हैं जिसमें नैतिक बल हो। यही नैतिक बल उसके अहिंसक होने का प्रमाण है।

गांधी की अहिंसा की यह व्याख्या भारतीय दर्शन के मूल सिद्धांतों पर आधारित है। हमारे उपनिषदों, पुराणों, योग-ग्रंथों में इसका वर्णन किया गया है। जैन और बौद्ध धर्म की तो बुनियाद ही अहिंसा के सिद्धांत पर टिकी है। गांधीजी ने इसी अवधारणा को अधिक व्यापक रूप दिया। ”हिंसा न करना” के सीमित दायरे से आगे बढ़ाकर, उन्होंने इस सिद्धांत को सामाजिक तथा राजनीतिक जीवन का आधार बनाया। टॉल्सटॉय, प्रिंस क्रोपाटकिन, रस्किन, रूसी आदि पाश्चात्य विचारकों के सिद्धांतों के संपर्क में आकर गांधी ने एक साधारण नैतिक सिद्धांत को एक महत्वपूर्ण दार्शनिक रूप प्रदान किया। सिद्धांत पुराना है, उसके व्यक्तिगत, राजनीतिक और सामाजिक पहलू गांधी दर्शन में एक नवीनता लिये हुए है। यह गांधी की महान उपलब्धि थी कि उन्होंने आधुनिक मौलिकतावादी युग में ऐसे सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत की स्थापना की।

अपने संपूर्ण साहित्य में गांधी जी ने इस व्यापक नैतिक सिद्धांत की विशाद व्याख्या की है। उनके अनुसार अहिंसा नकारात्मक भी हो सकती है और सकारात्मक भी। अगर हम विरोधी से भयभीत होकर अहिंसक बने रहें तो यह सिर्फ नकारात्मक अहिंसा है जिसको अहिंसा न कह कर, कायरता कहा जाना चाहिए। सकारात्मक अहिंसा का जन्म तो आत्मिक मन से होता है, भय से नहीं। हम तभी सच्चे अर्थ में अहिंसक हैं यदि हिंसा कर सकने की स्थिति में भी हम ऐसा न करें, क्योंकि हिंसा से जो कार्य हम करना चाहते हैं, वह नहीं कर पायेंगे। हमको पाप से लड़ना है, पापी से नहीं। पापी चाहे वह कितना ही बड़ा पापी क्यों न हो मनुष्य ही है। उसके अंदर भी ईश्वर का वह अंश मौजूद है जिसे हम सत्य कहते हैं। हमको तो पापी के अंदर विद्यमान इस तत्व को उजागर करना है, उसका हृदय-परिवर्तन करना है तभी हम सच्चे अर्थ में अहिंसक कहलाएंगे, यही कारण है कि गांधी के जीवन-काल में ही कई लोग उनसे सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि अंग्रेज हमारे दुश्मन हैं और हमें उनको बल प्रयोग से भारत से भगाना होगा। परन्तु गांधी इस विचार से सहमत नहीं थे। वे चाहते थे कि अंग्रेज स्वयं ही इस बात को महसूस करें कि वे भारत का शोषण करके एक कुत्सित कार्य कर रहे हैं। भारत की स्वतंत्रता, गांधी के अहिंसावाद का परिणाम था या उनसे असहमत होने वाले ”गरम-दल” वाले लोगों के प्रयत्न का परिणाम? यह प्रश्न हमेशा रहेगा और विभिन्न इतिहासकार इसका उत्तर विभिन्न रूप से देंगे। इतना अवश्य है कि अगर वे चाहते तो भारत की स्वतंत्रता की मांग को वर्षों तक टाल सकते थे। गांधी जी की नैतिक भूमिका के बगैर 1947 में स्वतंत्रता मिल पाना कदाचित संभव नहीं था।

गांधी के, अहिंसा के सिद्धांत के बारे में एक बहुत बड़ी गलतफहमी भी है। कुछ लोग सोचते हैं कि आज की दुनिया में, जहां अत्यंत भयानक हथियारों के सहारे युद्ध होते हैं तथा कूटनीति के बल पर राज्य बनते अथवा ध्वस्त होते हैं, गांधी के अहिंसा की सिद्धांत केवल एक किताबी विचार बनकर रह जाता है। ये लोग यह भूल जाते हैं कि युद्धों के मूल में हथियार नहीं, हथियार चलाने वाले मनुष्य की प्रवृत्तियां होती हैं, और कूटनीति (जिस अर्थ में इसका प्राय: प्रयोग होता है) बेईमानी का दूसरा नाम है। गांधी की लड़ाई मनुष्य की उन मूल प्रवृत्तियों के खिलाफ थी जो साधारण व्यक्तियों के ऊपर युद्ध थोपा करती हैं। वे लड़ते रहे उस राजनीतिक बेईमानी के खिलाफ, जिसे कुटनीति या ”डिप्लोमैसी” (कूटनीति) कहा जाता है। गांधी मनुष्य के नैतिक विकास के सिद्धांत पर विश्वास करते थे। वे जानते थे कि मानव जाति तभी जिन्दा रह सकती है जब वह निरंतर नैतिक विकास की ओर अग्रसर हो। ऐसा तभी हो सकता है जब सत्याग्रह जैसे अस्त्र से अहिंसा की ढाल के सहारे राजनीति चलायी जाए। इसलिए उन्होंने कहा था-”अहिंसा सामाजिक वस्तु है, केवल व्यक्तिगत वस्तु नहीं”। इस अस्त्र पर उनका इतना विश्वास था कि वे कहा करते थे- ”मैं अनेक बार कह चुका हूंँ कि एक भी सच्चा सत्याग्रही हो तो वह पर्याप्त है।”। आधुनिक युग में गांधी-दर्शन की प्रासंगिकता को इसी संदर्भ में समझना चाहिए।

अहिंसा का भाव प्राचीन भारतीय आदर्श- ”अहिंसा परमो धर्म:” पर आधारित है। इस अर्थ में इसे गांधी का मौलिक आविष्कार नहीं माना जा सकता। गांधी की मौलिकता तो इस बात में है कि उन्होंने इस सिद्धांत को व्यक्तिगत धरातल से उठाकर सामाजिक तथा राजनीतिक धरातल पर अवस्थित किया। अहिंसा व्यक्ति-मात्र का धर्म नहीं है, इसकी आवश्यकता तो समस्त मानव-जीवन के लिए है।

यह भी स्मरण रखना चाहिए कि गांधी के अहिंसा का सिद्धांत उनकी सत्य की आस्था पर टिका है। बिना सत्य की अनुभूति के अहिंसा का सिद्धांत व्यावहारिक नहीं हो सकता। इसी प्रकार बिना अहिंसा के मार्ग का अनुसरण किए सत्य की खोज संभव नहीं है, इसलिए गांधी ने अपने आश्रम में निवास करने वाले लोगों के लिए सत्य और अहिंसा का मार्ग अनिवार्य कर दिया था, जो व्यक्ति इस मार्ग से हट जाए, उसको आश्रम में रहने की आज्ञा नहीं थी।

गांधी ने अहिंसा को व्यक्ति के हृदय से जोड़कर देखा। किसी को आघात न पहुंचे यह तो आवश्यक है ही, साथ ही यह भी आवश्यक है कि इस सिद्धांत का परिपालन करने वाले की आत्मा पर भी कोई आघात न लगे। सच्ची अहिंसा-मनसा, वाचा, कर्मणा पालन पर आधारित है। हमको केवल कर्म से ही नहीं मन और वचन से भी अहिंसक होना चाहिए। तभी हम प्राणिमात्र में व्याप्त एकत्व के सिद्धांत को समझ सकते हैं। अगर हम किसी भी स्थिति में दूसरे के दु:ख का कारण बन जाते हैं तो हम अहिंसक नहीं है। आत्म-त्याग का यह भाव गांधी के अहिंसा के सिद्धांत का एक महत्वपूर्ण पहलू है। सच्चा अहिंसावादी वही है जो दूसरे के भले के लिए अपने स्वार्थों का बलिदान करने को सदा तत्पर रहे, जब तक व्यक्तिगत अहंकार पूर्ण रूप से समाप्त न हो जाए पूर्ण रूप से अहिंसा संभव नहीं। क्या मनुष्य के लिए इस आदर्श की संपूर्ण उपलब्धि संभव है? गांधी ने स्वयं कहा है कि मनुष्य की ऐसी नियति ही नहीं है कि वह इस आदर्श को पूर्ण रूप से प्राप्त कर सके। किसी हद तक जंगली जानवरों को मारकर अपनी रक्षा करना आवश्यक है उसी प्रकार यदि हमारे ऊपर युद्ध थोपा गया, तो हमें सक्रिय रूप से उसका सामना करना ही पड़ेगा। इस प्रकार अहिंसा के आदर्श का पूरी तरह पालन मानव-जीवन में संभव नहीं है। इतना अवश्य है कि हम जहां तक हो सके इसे अपने व्यक्तिगत जीवन में उतारें, और हम सब मिलकर इसको एक सामाजिक आवश्यकता समझकर ग्रहण करें। जीवन में थोड़ी बहुत हिंसा अपरिहार्य हो सकती है, किन्तु मानव स्वभावत: शांति-प्रेमी होता है और कलह के विरुद्ध शांति का चयन उसकी स्वाभाविक प्रवृत्ति है। गांधी मेकियावेली तथा हॉब्स जैसे विचारकों की इस धारणा से सहमत नहीं थे कि मनुष्य स्वभावत: स्वार्थी है। उनका बाइबिल की इस उक्ति पर कि मनुष्य की रचना ईश्वर ने अपने अनुरूप ही की है, अटल विश्वास था क्योंकि मनुष्य के अंदर एक ईश्वरीय तत्व-आत्मा-विद्यमान है। इसलिए मनुष्य स्वभावत: बुराई को त्यागकर, भलाई के मार्ग पर चलना चाहता है। जब वह ऐसा नहीं कर पाता इसके लिए उसका अज्ञान अथवा उसका सामाजिक वातावरण जिम्मेदार होता है। अगर उसकी आत्मा को आच्छादित करने वाले अज्ञारूपी अंधकार को हटा दिया जाए और उसकी विषम परिस्थितियों का निराकरण कर दिया जाए तो वह भलाई के मार्ग पर ही अग्रसर होगा। गांधीजी के दक्षिण अफ्रीका के अनुभव और बाद में भारत में अंग्रेजों के खिलाफ चलाये गए संघर्ष के अनुभव इस बात को पूर्णतय सिद्ध करते हैं कि अहिंसा का अमोघ अस्त्र, हिंसा पर सर्वदा विजय प्राप्त करता है। दक्षिणी अफ्रीका में जनरल जैसे लोग समझ ही न पाये कि गांधी जैसे सत्याग्रहीयों से कैसे निपटा जाए। क्योंकि वे ईंट का जवाब पत्थर से नहीं, प्रेम से देते थे। इसी प्रकार अंग्रेज भी यह नहीं समझ पाये कि गांधी के पास वह कौन सा जादू था जो हर दमनकारी प्रवृत्ति का इतनी सफलता से मुकाबला कर लेता था। गांधी का यह जादू अहिंसा का जादू था।