व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 21 for Competitive Exams

Get unlimited access to the best preparation resource for competitive exams : Get detailed illustrated notes covering entire syllabus: point-by-point for high retention.

अस्पृश्यता

वे मानते थे कि अस्पृश्यता का मूल मृत अतीत के गर्भ में है जिसे कोई नहीं जानता। अस्पृश्यता को अंबेडकर दास प्रथा से भी बुरा मानते थे। अस्पृश्यता और दास प्रथा में अंतर है, जिससे अस्पृश्यता एक परतंत्र सामाजिक व्यवस्था की सबसे खराब मिसाल बन जाता है है। दास प्रथा कभी बाध्यकारी नहीं थी, किन्तु अस्पृश्यता बाध्यकारी है। कोई व्यक्ति किसी अन्य व्यक्ति को अपने दास के रूप में रख सकता है। उस पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि वह नहीं चाहने पर भी रखे, किन्तु अछूत के पास कोई विकल्प नहीं है। एक अछूत के रूप में पैदा होने पर अछुत की सारी अयोग्यताएं उसे मिल जाती हैं। दास प्रथा का कानून छूटकारे की इजाजत देता है। एक बार का गुलाम, हमेशा गुलाम यह गुलाम की नियति नहीं थी। अस्पृश्यता में बच निकलने का कोई रास्ता नहीं। एक बार अछूत हमेंशा अछूत। ′ इस प्रकार अंबेडकर दास प्रथा को अस्पृश्यता से सौगुना बेहतर मानते हैं।

उनके अनुसार “अस्पृश्यता में स्वतंत्र सामाजिक व्यवस्था की सभी बुराइयां मिलती हैं। स्वतंत्र सामाजिक व्यवस्था में अस्तित्व का संघर्ष है। जीवित रहने का दायित्व व्यक्ति विशेष पर होता है। यह दायित्व स्वतंत्र सामाजिक व्यवस्था की सबसे बड़ी बुराई है।”

उनका मानना था कि अस्पृश्यता का समूल विनाश हुए बगैर दलित वर्ग के लोगों का उद्धार संभव नहीं है। जाति प्रथा को वे कुछ लोगों का षडयंत्र मानते थे, जो कि शोषण नहीं किया किन्तु शूद्रो के प्रति उनका व्यवहार घृणात्मक था, बेहद उपेक्षापूर्ण।

शूद्रो को घृणा की दृष्टि से देखा जाता था, इतिहास इस बात का साक्षी है। पवित्रता की अवधारणा अपरिहार्य रूप से वस्तुओं तक ही सीमित नहीं थी। कतिपय विशेष व्यक्तियों के ऐसे वर्ग भी थे जो पवित्र माने जाते थे। किसी व्यक्ति दव्ारा उनका स्पर्श किए जाने पर उनकी पवित्रता भंग हो जाती थी। आदिम अथवा प्राचीन लोगों में प्रदूषण की धारणा थी। ब्राह्मण अशुचिता से मुक्त थे ऐसी बात नहीं थी। जन्म एवं मृत्यु से होने वाली अशुचिता से वह भी प्रभावित थे और अशुचिता को दूर करने के लिये मनु ने प्रावधान भी बनाए थे।

Developed by: