व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 22

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स्वर्ण हिन्दू और अछूत

उनका मानना था कि हिन्दू समाज को नैतिक पुनरुद्धार की आवश्यकता है, जिसे विलम्बित करना खतरनाक होगा। प्रश्न यह है कि इस नैतिक पुनरुद्धार को कौन निर्धारित और नियंत्रित कर सकता है। स्पष्ट रूप से वे लोग जो अपना बौद्धिक पुनरुद्धार कर चुके हैंं और वे जो इतने ईमानदार हैं कि बौद्धिक पुनरुद्धार से पैदा हुए विश्वास को दिखाने का साहस जिनके पास है।

अछूतों के प्रति हिन्दुओं दव्ारा किया जाने वाला भेदभाव निरन्तर अंबेडकर को सालता रहा। सार्वजनिक सुविधाओं के उपयोग से अपवर्तन तो अत्यंत उग्र रहा। उनका विचार था कि अछूत चाहे कितना भी सुयोग्य क्यों न हो, उसे घटिया दर्जे के लोगों में सवर्णो ने गिना। जिसके पीछे शायद यह वजह रही कि हिन्दुओं का यह भय रहा है कि अछूत कहीं आगे न बढ़ जाएं और हिन्दुओं की उत्कृष्टता बनाये रखने में खतरा न सिद्ध हो जाए।

अंबेडकर ने अछुतों एवं हिन्दुओं को संबंध व्याख्यायित करते हुए कहा है कि हिन्दू समाज में अछूतों के समवोशन के विरुद्ध सुस्पष्ट निषेधाज्ञा है। अछुत हिन्दू समाज के अविभाज्य अंग नहीं हैं और यदि अंग है भी तो अंश मात्र हैं किन्तु पूर्ण नहीं। हिन्दुओं तथा अछूतों के बीच संबंध दर्शानेवाला विचार रूढ़िवादी हिन्दुओं के नेता आइना पूरे शास्त्री ने बंबई में आयोजित सम्मेलन में यथार्थ रूप से व्यक्त किया था। उन्होंने कहा था अछूत हिन्दुओं के पैर की जूती हैं। कोई व्यक्ति जूता पहनता हैं, उस अर्थ में वह व्यक्ति से जुड़ा है और व्यक्ति का अंश कहा जा सकता है। लेकिन वह दो बातों के कारण पूर्ण अंश नहीं है क्योंकि जो चीज जोड़ी और हटाई जा सकती है, उसे एक संपूर्ण इकाई का अंश नहीं कह सकते है। यह उपमा एकदम गलत नहीं है। अंबेडकर के उपरोक्त विचार इस तर्क के सशक्त समर्थ हैं अंबेडकर हिन्दुओं का विरोध आवश्यक मानते थे और जो तिरस्कार रूपी जहर उन्होंने पिया था उसी का उद्गार उपरोक्त पंक्तियाँ हैं, और यही कारण है कि वे औचित्य-अनौचित्य की परवाह किए बगैर कई अवसरों पर सवर्णों की ऐसी आलोचनाएं की जो विदव्ेष को जन्म देती है।

हिन्दू सामाजिक व्यवस्था के अन्याय के विरुद्ध लड़ाई अंबेडकर ने लड़ी। सीधी कार्यवाही, जैसे प्रयासों में 1924 में त्रावनकोर राज्य के अछूतों दव्ारा किया गया सत्याग्रह मुख्य था। जिसमें मंदिर का अहाता बढ़ा दिया गया था। 1927 में प्रसिद्ध महाड़ बावड़ी में अछूतों ने प्रवेश किया, इससे उच्च जाति के लोगों में आक्रोश उभरा। अंबेडकर ने संघर्ष का आह्‌वान किया और सत्याग्रह की बागडोर स्वयं संभाली।

अंबेडकर ने अछूतों को चेतावनी देते हुए कहा था कि अछूतों को दो बातें ध्यान में रखनी चाहिए। पहली तो यह कि हिन्दू धर्म से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह सामाजिक न्याय भावना जाग्रत करने की दिशा में कार्यशील होगा ऐसा कार्य इस्लाम, ईसाई अथवा बौद्ध धर्म दव्ारा किया जा सकता है। हिन्दू धर्म स्वयं ही अछूतों के प्रति असमानता और अन्याय का मूर्त रूप है। उसके लिये न्याय का उपदेश देना अपना ही विरोध करना है।

आगे उन्होंने कहा, अछूत के लिये यह नितांत आवश्यक है कि वह यथा संभव अधिक से अधिक राजनीतिक शक्ति अर्जित करे। सामाजिक तथा आर्थिक अर्थों में उसकी निरंतर घटती हुई शक्ति को देखते हुए अछूत कभी भी अत्यधिक राजनीतिक शक्ति अर्जित नहीं कर सकता। वह चाहे जितनी राजनीतिक शक्ति अर्जित कर ले, फिर भी हिन्दुओं की विशाल सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शक्ति को देखते हुए हमेशा कम ही रहेगी। 1930 में दलित जाति एसोसिएशन (समिति) बना, जिसमें अंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि वे केवल अपनी जाती का कल्याण चाहते हैं उन्होंने कभी नहीं कहा कि वे सारे समुदायों के उत्थान के इच्छुक हैं और इसीलिए उनको गांधी के ’हरिजन’ शब्द पर आपत्ति थी अंत तक वे दलितों-विशेषत: महार जाति की समस्याओं से जूझते रहे।

अंबेडकर ने अत्यंत साहस एवं ईमानदारी के साथ दलितों की लड़ाई लड़ी अकेले दम पर। उनकी कर्मठता को सभी ने स्वीकार किया। दलितोद्धार उनका संपूर्ण संघर्ष था, और जो लोग यह कहते हैं कि यह संकीर्ण दायरे में सीमित था, वे यह भूल जाते हैं कि जिस सामाजिक न्याय की लड़ाई वे लड़ रहे थे, उसके साथ कई समस्याएं जोड़ देने पर असफलता तो सुनिश्चित थी ही, वे कोई कार्यक्रम भी नहीं दे पाते। हाँ, मुख्य गड़बड़ी यह हुई कि अंबेडकर एक पूर्वाग्रह से ग्रसित थे कि दलितोद्धार की लड़ाई गैर दलित वर्गों के लोगों दव्ारा संचालित नहीं हो सकती है क्योंकि सभी सवर्ण दलितों के विरोधी हैं।

निश्चित रूप से अछूत समाज का सर्वाधिक तिरस्कृत वर्ग रहा है और अंबेडकर ने इस वर्ग के उद्धार का जो संकल्प लिया और उनकी लड़ाई लड़ी, इसी का परिणाम रहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात्‌ इस वर्ग को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त हुआ और इसी संवैधानिक संरक्षण के कारण आज समाज में इस उपेक्षित वर्ग की स्थिति थोड़ी बेहतर सिद्ध हुई। उनको अछूतोद्धार कार्यक्रम के प्रति सामाजिक एकता दिखाई पड़ी। उन्होंने महसूस किया कि बिना दलितों के उद्धार के भारतीय समाज में सामाजिक न्याय की बात करना पाखंड एवं प्रवंचना है।

अंबेडकर दूरद्रष्टा थे। यह नहीं कहा जा सकता है कि उनकी सोच एकांगी थी, और राष्ट्रीय संदर्भों की। उन्होंने सर्वथा उपेक्षा की। उनका तो मानना था कि मुझे यह अच्छा नहीं लगता कि जब कुछ लोग कहते हैं कि हम पहले भारतीय है और बाद में हिन्दू अथवा मुसलमान। मुझे यह स्वीकार नहीं है। धर्म, संस्कृति, भाषा तथा राज्य के प्रति निष्ठा से ऊपर है-भारतीय होने की निष्ठा। मैं चाहता हूँ कि लोग पहले भारतीय हों और अंत तक भारतीय बने रहें भारतीय के अलावा कुछ नहीं।

अंबेडकर ने असवर्णों के लिय पृथक मतदान की बात की। पृथक निवार्चन के सिद्धांत की आलोचना हुई और गांधी जी को तो इस सिद्धांत से इतना खतरा अनुभव हुआ कि उन्होंने कहा कि इससे जातिवादी मान्यताएं संप्रदायवाद का रूप धारण कर सकती है। गांधी जी की बात सच हो न हो, लेकिन यदि उच्च जाति के लोगों में इस बात का एहसास पैदा नहीं होता है कि वे नीच कहे जाने वाले अपने भाइयों को समाज का अभिन्न अंग स्वीकारें और तिरस्कृत, उपेक्षित, अशिक्षित एवं आर्थिक रूप से विभिन्न वर्ग को आर्थिक आधार पर समुन्नत करने का प्रयास हो अवांछित वर्ग संघर्ष अनिवार्य है।

असमानता एवं अन्याय पर आधारित परंपरागत समाज व्यवस्था के विरुद्ध एक सशक्त जन चेतना को अंबेडकर ने उभारा था। उनकी स्पष्ट मान्यता थी कि जब तक जाति एवं जाति को पोषित करने वाली परपंरागत हिन्दू विचारधारा का अंत नहीं होगा तब तक भारत में क्रांति संभव नहीं है उनके चिंतन का मूल विषय सामाजिक संरक्षण है। सत्योद्घाटन में वे कभी चूके नहीं, भले ही कटु आलोचना एवं विरोध का सामना उन्हें करना पड़े।

दलित वर्ग

जिन समुदायों के लिये गांधी जी ने ’हरिजन’ शब्द का प्रयोग किया था, वह अंबेडकर को पसंद नहीं था। उनका मानना था कि ’हरिजन’ नामकरण से दलित वर्ग कमजोर होगा। यही नहीं अंबेडकर को यह भी लगा कि दलितों को ’हरिजन’ नाम देना कांग्रेस की एक सुनियोजित चाल है। अंबेडकर ने गर्व से ईमानदारी से स्वीकार किया कि वे केवल दलितों का उद्धार चाहते हैं, पूरे समाज का उन्होंने ठेका नहीं लिया है।

अंबेडकर कालीन बहुत से अनुसूचित प्राय: अंबेडकर के परामर्श के विरुद्ध थे। परिणामत: अनुसूचित जातियों ने अंबेडकर दव्ारा गठित अथवा समर्थित पार्टी को समर्थन देने के बजाए कांग्रेस का समर्थन किया।

’दलित’ नामकरण अंबेडकर की ओर से आया जिसकी पृष्ठभूमि माओवादी और रेडिकल लेफ्टिस्ट लोगों ने तैयार की थी। अंबेडकर दलितों की समस्या को सर्वोपरि रखना चाहते थे। वे दलितों की समस्याओं का समाधान लोकशाही के दायरे में ’स्टेट’ (राज्य) के इस्तेमाल से करना चाहते थे। दलित समुदाय को दबी-कुचली जिन्दगी से उबारना चाहते थे, वे जाति प्रथा के खिलाफ समानता पर आधारित जनतांत्रिक व्यवस्था के पक्षधर थे।