व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 24

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धार्मिक विचार

धर्म के नाम पर पाखंडवाद के अंबेडकर विरोधी थे, किन्तु वे नास्तिक नहीं थे। धर्म को समाज के लिये आवश्यक मानते थे। मार्क्सवादी चिंतन धर्म को अफीम मानता है। ऐसी अफीम जो गरीब और अमीर की खाई को चौड़ा करती है और कमजोर को अभावग्रस्त जीवन जीने का अभ्यस्त बना देती है। किन्तु अंबेडकर की दृष्टि में धर्म मानवता के लिये आवश्यक है। धर्म के समाप्त होने में समाज के समाप्त होने का भय उन्हें था।

अंबेडकर आर्थिक व सामाजिक अधिकारों के लिये संर्घषरत गरीब, कमजोर लोगों को धार्मिक उपदेश देकर संघर्ष हटाना नहीं चाहते थे, लेकिन इतना अवश्य कहते थे कि दलितों के लिये केवल पेट भरना और जीवित रहना ही पर्याप्त नहीं है। धर्म व्यक्ति के लिये होता है न कि व्यक्ति धर्म के लिये। धर्म को व्यक्ति के अस्तित्व एवं महत्व को स्वीकार करना चाहिए तथा उसके आध्यात्मिक एवं बौद्धिक विकास के लिये अनुकूल वातावरण का सृजन करना चाहिए। धर्म वह है जो लोगों को एकता के सूत्र में बांधे। धर्म दैवीय नियमन की एक आदर्श प्रयोजना है जिसका लक्ष्य उस सामाजिक व्यवस्था जिसमें कि लोग रहते है; को एक नैतिक व्यवस्था बनाना है। धर्म का अस्तित्व मुख्यत: उसमें प्रतिपादित आदर्श प्रयोजना के रक्षार्थ एवं पोषणार्थ होता है। सामान्यतया यह माना जाता है कि धर्म ग्रंथो की रचना ईश्वर ने की है अत: उसमें जिन नियमों, आदर्शों की प्रस्थापनाएं है, वे ईश्वरीय हैं जैसे ईसाई धर्म में बाइबिल, हिन्दू धर्म में वेद, गीता एवं स्मृतियां तथा इस्लाम में कुरान एवं हदीस धार्मिक संहिताएं हैं जिनमें ईश्वरी नियमों का प्रतिपादन है और ये ही धर्मानलम्बियों के आचरण एवं जीवन को नियंत्रित करते हैं।

धर्म का आधार सामाजिकता है और बिना समानता के सामाजिक की बात करना निरर्थक है। अत: धर्म की अवधारणा समानता पर आधारित है। अंबेडकर का मानना था कि हिन्दू धर्म समानता के आधार पर नहीं टिका है। वह आदेशों और निषेधों अर्थात सांस्कारिक रीतियों, कर्मकांडो एवं नियमों तथा निषेधों का मात्र संग्रह है। इसमें कर्मकांड की प्रधानता है, और इसी के माध्यम से वर्ण व्यवस्था की उत्पत्ति हुई है। यह कानून अथवा कानून के रूप में वर्ग आचार हैं और यह अपेक्षित सामाजिकता की स्थापना नहीं कर सकता। असमानता हिन्दू धर्म का बुनियादी सिद्धांत है।

सामाजिक समानता सामाजिक न्याय के लिये आवश्यक है। आर्थिक सुरक्षा के अभाव में सामाजिक समानता संभव नहीं है। जो विधान इच्छानुसार व्यवसाय चुनने की आजादी से वंचित करता है, वह धार्मिक कैसे हो सकता है। मनु के धान शूद्रों के लिये संपत्ति संग्रह करना निषिद्ध है और उन्हें व्यवसाय चुनने की आजादी भी नहीं है। समाज में शिक्षा प्राप्त करने का सबको अधिकार है किन्तु मनु का ईश्वरी विधान इसके विपरीत है। केवल दव्जो को ही वेदाध्ययन का अधिकार था। स्त्रियों एवं शूद्रो के लिये यह वर्जित था। अत: अंबेडकर को कहना पड़ा, ’जहाँं समानता की मनाही है, वहांँ अन्य सभी वस्तुओं का अभाव है। असमानता हिन्दू धर्म का पवित्र और दैवी सिद्धांत है। यह हिन्दू धर्म की आत्मा है। परिणामस्वरूप हिन्दू धर्म में न्याय का पूर्णतया अभाव है।’

जति व्यवस्था श्रमिकों का विभाजन करती है। जाति का सिद्धांत किसी ब्राह्यण को ज्ञान प्राप्त करने की अनुमति तो देता है किन्तु शूद्र को बुद्धि का विकास करने की अनुमति नहीं देता है। चतुर्वर्ण व्यवस्था में दव्जो और शूद्रों के बीच मालिक और गुलाम का रिश्ता है। और ब्राह्यण, क्षत्रिय तथा वैश्य आपस में वैमनस्य रखते हुए भी शूद्रों को नीचा रखने के मामले में पारस्परिक सहमति रखते है। अंबेडकर के अनुसार हिन्दू धर्मदर्शन सामाजिक उपयोगिता के मानदंडो को पूरा नहीं करता।

अंबेडकर के अनुसार, मजहब वैयक्तिक होता है और धर्म सामाजिक होता है। ’सभी धर्म, धर्म नहीं हैं। केवल वही धर्म वास्तविक धर्म है जो तर्क एवं विवेकसंगत हो, सामाजिक नैतिकता पर आधारित हो, सार्वकालिक एवं सार्वभौमिक हो और जो सभी काल में सभी मानव जाति की सेवा कर सकता है।’

धर्म नैतिकता पर आधारित होना चाहिए। धर्म का स्वरूप समय के साथ बदलता रहता है। अंबेडकर के अनुसार वैदिक धर्म अनुमान व कल्पना प्रधान है।