व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 25

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राजनीतिक दृष्टिकोण

अंबेडकर की उच्च शिक्षा पाश्चात्य समाज में हुई थी, फलत: उनका राजनीतिक चिंतन उससे अप्रभावित नहीं रहा। वे कांगेस को सवर्णों की पार्टी मानते थे और उन्हें कांग्रेस के उद्देश्य और नीतियों पर विश्वास नहीं था। इसलिये उन्होंने कांग्रेस के साथ कभी भी स्वतंत्रता आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया। यहाँ तक की खादी का भी मजाक उन्होंने उड़ाया और हमेशा यही कोशिश की कि दलितों के लिये अंग्रेजी हुकुमत से कुछ हासिल किया जा सके।

उनका संघर्ष आत्म सम्मान का था। वे हरिजन नेता की भूमिका के रूप में बड़े कटु थे। उनकी राजनीति शुद्ध रूप से दलित राजनीति थी। उनके लिये दलित प्रश्न सर्वप्रमुख था किन्तु इसका आशय यह कतई नहीं है कि अंबेडकर दलित भारत की स्थापना करना चाहते थे। वह सिर्फ दलित मुक्ति चाहते थे। वे दलितों के लिये जिये और दलितों के लिये मरे। उनकी इस एकांगिता में उनकी गहरी प्रतिबद्धता दिखाई पड़ती है।

अंबेडकर लोकतंत्र में विश्वास रखते थे और उनका मानना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था से ही सामाजिक समानता आ सकती है। किन्तु हिन्दुस्तान में जहाँ एक बड़ी संख्या को अछूत समझा जाता है, लोकतांत्रिक मूल्य बेमानी हो जाते हैं। अत: उनकी सबसे बड़ी चिंता थी- अछूतों को अधिकार दिलाना। और यही वजह थी कि उन्होंने दलितों के लिये पृथक प्रतिनिधित्व की बात की। उनका विचार था कि दलित वर्ग के लिये जनसंख्या के आधार पर पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था होनी चाहिए। पं. मोती लाल नेहरू ने इसका बड़ा प्रतिरोध किया और इसे देश के लिये हानिप्रद कहा।

महात्मा गांधी भी अंबेडकर के इस विचार से सहमत नहीं थे कि पृथक निर्वाचन की बात की जाए। उनका मानना था कि इससे स्वतंत्रता-प्राप्ति में अनेक कठिनाई होगी। लेकिन अंबेडकर का मानना था कि कांग्रेस सत्ता के लिये जितनी चिंतित है उतनी अपने उद्देश्यों या सिद्धांत के लिये नहीं है।

अंबेडकर हरिजन नेता की भूमिका में कटु होते हुए भी पूर्णत: राष्ट्रवादी थे। किन्तु उनके दृष्टिकोण से भारतीय समाज की अमानवीयता और अन्याय विदेशी शासन के अपमान से भी बदतर था। वे भी भारत में ब्रिटिश शासन का अंत चाहते थे, किन्तु वे वायसराय की उस कार्यपालिका समिति के सदस्य भी थे जो ’भारत छोड़ो’ आंदोलन के दमनार्थ ब्रिटिश राज दव्ारा किए गए निर्णयों का समर्थन कर रही थी। चूँकि अंबेडकर कांग्रेस को हिन्दूवादी ताकत के रूप में देखने की गलती कर रहे थे, अत: उनकी धारणा बन चुकी थी कि ब्रिटिश राज्य की तत्काल समाप्ति से दलितों के हित भी खतरे में पड़ जाएंगे।

उन्होंने राज्य की परिकल्पना मनुष्यों के एक राजनीतिक संगठन के रूप में की है, जिसके पास अपनी विधांयिका, कार्यपालिका और अपना प्रशासन तत्व होता है। वे राज्य और व्यक्ति के बीच सामंजस्य के पक्षधर थे। वे राज्य को साध्य नहीं मानते थे। राज्य मानव लक्ष्यों की प्राप्ति और बेहतर समाज की स्थापना का एक साधन है। चूँकि व्यक्ति ने राज्य की रचना की है। अत: राज्य का यह कर्तव्य है कि वह व्यक्ति की स्वतंत्रता और नैसर्गिक अधिकारों की रक्षा करे तथा उसके सम्मान एवं गरिमा को बनाये रखे।

वे कल्याणकारी राज्य के पक्षधर थे और आनुवंशिक शासन परंपरा के विरुद्ध थे। उनकी दृष्टि में लोकतंत्र की सफलता के लिये आवश्यक है कि लोग सार्वजनिक महत्व के विषयों एवं निर्णयों पर तर्क से काम लें। शुरू-शुरू में अंबेडकर तानाशाही के पक्षधर थे उनका कहना था कि ’सामाजिक और धार्मिक विषयों में लोकतांत्रिक तरीके से परिवर्तन लाना कठिन है। अत: इसके लिये कमाल पाशा या मुसोलिनी जैसे तानाशाह की भारत को जरूरत होगी।’ बाद में उनके विचार बदल गए और उन्होंने लोकतंत्र का समर्थन किया और कहा कि प्रजातंत्र मुख्यत: श्रेयस्कर इसलिए है कि यह व्यक्ति को विकास का पूर्ण अवसर प्रदान करता है। उनके अनुसार विरोध के अभाव में कोई लोकतंत्र कार्य नहीं कर सकता। स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव जनतंत्र का प्रमुख आधार है।

लोकतंत्र में विधायिकता के महत्व को स्वीकार करते हुए अंबेडकर ने कहा है कि कानून का वास्तविक कार्य समाज की त्रुटियों को दूर करना है। ब्रिटिश संसदीय प्रणाली के अनुरूप उन्होंने भारत में कार्यकारिणी के गठन का प्रावधान किया। उनका मानना था कि न्यायपालिका ही व्यवस्थापालिका एवं कार्यपालिका पर नियंत्रण रखती है और उन्हें संविधान दव्ारा स्थापित सीमाओं के भीतर बाँधकर रखती है। वे स्वतंत्र न्यायपालिका की केवल स्थापना के पक्षधर नहीं थे वरन्‌ न्यायपालिका को व्यापक अधिकार दिये जाने के भी हिमायती थे।

उनका मानना था कि समाज में अधिक विषमता लोकतंत्र के लिये दुखद है। यदि समाज में कोई उत्पीड़क वर्ग है और कोई पीड़ित वर्ग तो ऐसी स्थिति में लोकतंत्र का प्रभावी होना कठिन है।

संसदीय लोकतंत्र में राजनैतिक दलों की अनिवार्यता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने लिखा है कि राजनीतिक दल जनता की अभिव्यक्ति एवं उसके क्रियान्वयन के अभिकरण हैं। उनका मानना था कि लोकतंत्र की सफलता के लिये कम-से-कम दो दलों का होना अनिवार्य है। विरोध का सशक्त होना भी आवश्यक है।

वे सत्ता के विकेन्द्रीकरण के खिलाफ थे। उनका मानना था कि एक विशाल एवं वैविध्य भरे देश में प्रभावकारी शासन की स्थापना के लिये राज्यों के पास राजनीतिक सत्ता का हस्तांतरण आवश्यक है परन्तु मजबूत एवं संगठित केन्द्र को अधिक अधिकार प्रदान किया जाना चाहिए।

उन्हें ग्राम पंचायत पर भरोसा नहीं था। यही कारण था कि उन्होंने ग्राम पंचायत को अन्य स्थानीय निकायों के साथ नौवीं अनुसूची में रखा। उनका मानना था कि ग्राम पंचायते दलितों एवं कमजोर पर अत्याचार करती हैं क्योंकि इसमें वर्चस्व सवर्ण जाति का होता है।

भाषा के सवाल पर अंबेडकर ने कहा कि एक भाषा लोगों को संयुक्त करती है, दो भाषाएं उन्हें बाँटती हैं। भारतीय, चूँकि परस्पर संयुक्त होना चाहते हैं और एक सामान्य संस्कृति विकसित करना चाहते हैं, इसलिए यह सभी भारतीयों का अनिवार्य कर्तव्य है कि वे हिन्दी को अपनी भाषा के रूप में स्वीकार करें। यदि कोई भारतीय एक भाषा के नियम को स्वीकार नहीं करता तो उसे अपने को भारतीय कहने का कोई अधिकार नहीं है।

उन्होंने भाषायी आधार पर राज्यों के गठन को अंगीकृत किया परन्तु किसी राज्य की भाषा को वहांँ की राजभाषा बनाये जाने का उन्होंने सशक्त विरोध किया। उनके अनुसार भाषायी राज्यों का गठन हो, किन्तु सभी राज्यों की राजभाषा अर्थात सरकारी काम-काज की भाषा हिन्दी हो।

इस प्रकार हम देखते हैं कि अंबेडकर का राजनीतिक चिंतन मानवीय मूल्यों की गरिमा एवं सम्मान की रक्षा का पोषक है। वे एक आधुनिक लोकतांत्रिक राज्य की अवधारणा रखते थे। वे नागरिक समानता पर आधारित जनतंत्र के पुरोधा थे और इस मामले में नेहरू के काफी नजदीक थे।