व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 26

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संवैधानिक विचार

राष्ट्रीय संविधान के निर्माण का गुरूतर दायित्व अंबेडकर को सौंपा गया। पं. नेहरू ने संविधान निर्माण के लिये आइवर जेनिंग्स का नाम सुझाया था किन्तु गांधी ने नेहरू के सुझाव को अनसुना करते हुए कहा कि मैं एक भारतीय संविधानविज्ञ भीमराव अंबेडकर का नाम सुझाता हूंँ। अपनी पुस्तक ’ह्‌वाट कांग्रेस एंड गांधी हैव इन टू द अनटचेवल्स’ में कहा कि, ’संविधान का उद्देश्य स्वतंत्रता, समानता एवं भ्रातृत्व के सिद्धांत पर आधारित एक नई सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था की स्थापना करना है जिसमें सत्ता पर किसी वर्ग विशेष का सदा आधिपत्य नहीं बना रहे। प्रत्यक्ष रूप में संविधान का उद्देश्य अपने सभी नागरिकों के लिये सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय, विचार अभिव्यक्ति, विश्वास धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समानता तथा व्यक्ति की गरिमा एवं राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाली बंधुता सुरक्षित करना है।

नेहरू की कार्य पद्धति से असंतुष्ट होकर अंबेडकर ने मंत्रिमंडल से त्याग पत्र दे दिया था। अंबेडकर ने ही हिन्दू कोड (गुप्त भाषा) बिल (विधेयक) का प्रारूप तैयार किया था जिसका उद्देश्य था हिन्दू स्त्रियों को कुछ विशेष अधिकार से मुहैया कराना। इस बिल का घोर विरोध हुआ। जिसमें प्रमुख थे सरदार पटेल। अंबेडकर का कहना था कि बिल का तात्पर्य है सारे हिन्दुओं के लिये एक ही कोड। किन्तु इस बिल ने संसद और ससंद के बाहर तीव्र प्रतिक्रियाएं उत्पन्न कीं। विरोध का परिणाम यह हुआ कि बिल की कई महत्वपूर्ण धाराएं निरस्त करनी पड़ी। इससे अंबेडकर को दु:ख एवं निराशा हुई। वे अपने को असफल देख, त्याग पत्र देना ही उचित समझे।

व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व पर प्रकाश डालते हुए अंबेडकर ने लिखा है कि संविधानिक उपचार के अधिकार को वे विशेष महत्व देते हैं, ’यदि कोई मुझसे यह पूछे कि संविधान का वह कौन सा अनुच्छेद है, जिसके बिना संविधान शून्य प्राय हो जाएगा, तो मैं इस अनुच्छेद को छोड़कर और किसी अनुच्छेद की ओर संकेत नहीं कर सकता। यह तो संविधान का हृदय और आत्मा है। मुझे इस बात की बहुत प्रसन्नता है कि सदन ने इसके महत्व को समझा है।

धर्म निरपेक्षता की व्याख्या करते हुए अंबेडकर ने कहा कि, धर्म निरपेक्ष राज्य का यह अर्थ नहीं है कि हम लोगों की धार्मिक भावनाओं की ओर ध्यान नहीं देंगे। इसका अर्थ केवल इतना है कि यह संसद, देश के लोगों पर कोई विशेष धर्म लादने का अधिकार नहीं रखती है। यही एक परिसीमा, संविधान स्वीकार करता है। उनका धर्म निरपेक्षता का सिद्धांत पाश्चात्य उदारवादी चिंतन से अनुप्राणित है। उनका स्पष्ट कहना था कि धर्म निरपेक्षता अधार्मिकता के सिद्धांत पर आधारित नहीं है, इसका तो एकमात्र अर्थ है सभी धर्मों का आदर करना। प्रत्येक व्यक्ति को आजादी है कि वह जिस धर्म को चाहे, उसे माने।

आरक्षण के प्रश्न पर भी संविधान सभा की प्रारूप समिति में पर्याप्त विवाद हुआ था। अंबेडकर ने भी स्वीकार किया कि आरक्षण गलत चीज है किन्तु भारत की परिस्थितियों में सामाजिक समानता एवं सामाजिक न्याय को प्राप्त करने के लिये यह आवश्यक भी है। उनका मानना था कि हिन्दुस्तान की गरीबी जातिगत है। अत: अनुसूचित जातियों एवं जनजातियों के लिये आरक्षण की सुविधा देना आवश्यक है। कुछ लोगों का विचार था कि आरक्षण से लोकतंत्र अमर्यादित होगा और समानता के सिद्धांत का माखौल उड़ेगा। अत: संविधान में विकल्प स्वरूप कुछ ऐसी व्यवस्था रहनी चाहिए कि कमजोर वर्ग के लोगों को प्रगति के लिये सुअवसर उपलब्ध हो सके।

मौलिक अधिकारों को उन्होंने शासन और विधान मंडल की स्वेच्छाचारिता पर अंकुश बताया। प्रत्येक मौलिक अधिकार के साथ यह अपवाद जोड़ा गया कि राज्य उस पर तार्किक प्रतिबंध लगा सके।

नीति निर्देशक सिद्धांतों के विषय में अंबेडकर का कहना था कि संविधान दव्ारा विधान मंडल एवं कार्यपालिका को दिए गए निर्देश हैं कि वे किस प्रकार संविधान विहित अपनी शक्तियों का प्रयोग करें।