व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 27

Download PDF of This Page (Size: 146K)

सरदार वल्लभभाई पटेल

सरदार पटेल का नाम भारत के ’लौह पुरुष’ (प्तपद डंद) के रूप में लिया जाता है। भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम का उन्होंने कुशल नेतृत्व किया। उनका जन्म 21 अक्टूबर, 1875 को गुजरात के करमरूद गांव में हुआ था। वे गुजरात के सफल बैरिस्टर (बड़ा वकील) थे। 1918 ई. में गांधी जी के महान व्यक्ति से प्रभावित होकर उन्होंने उस समय राजनीति में प्रवेश किया जब गुजराती किसानों की तरफ से कर मुक्ति आंदोलन चल रहा था। 1928 ई. में बारदोली में जब किसानों की ओर से सत्याग्रह आंदोलन चलाया गया तब उन्होंने उसका सफल नेतृत्व किया। 1930 ई. के सविनय अवज्ञा आंदोलन में सरकार ने सबसे पहले पटेल को ही कैद किया। गांधी-इरविन समझौते के बाद उन्हें छोड़ दिया गया। जब दव्तीय गोलमेज -सम्मेलन असफल हुआ तब अन्य नेताओं के साथ सरदार पटेल को पुन: कैद कर लिया गया। 1931 ई. में उन्हें कांग्रेस का प्रधान चुना गया। 1937 ई. में जब कांग्रेस ने चुनाव लड़ने का निश्चय किया तब सरदार पटेल को उसका अध्यक्ष नियुक्त किया गया। इस चुनाव में उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और समस्त देश का दौरा करके लोगों से आग्रह किया के वे कांग्रेस के कार्यक्रम का समर्थन करें। चुनाव मशीनरी (यंत्र) को उन्होंने संगठित किया। जब आठ प्रांतों में कांग्रेस के मंत्रिमंडल बन गए तब उनके ऊपर निगरानी करने के लिए एक ’पार्लियामेंटरी (संसद) बोर्ड’ (परिषद) बनाया गया- सरदार वल्लभभाई पटेल इसके अध्यक्ष थे। 1942 ई. में उन्होंने ’भारत छोड़ो’ आंदोलन में भाग लिया। उस समय उन्हें कैद कर लिया गया। 1945 ई. में जेल से छूटने के बाद वे शिमला सम्मेलन और अंतरिम सरकार में शामिल हुए। 1946 ई. में संगठित अंतरिम सरकार में वे उपप्रधानमंत्री नियुक्त किए गए। स्वतंत्रता के बाद उन्हें गृहमंत्री पद पर नियुक्त किया गया। उस समय देशी राज्यों के विलय की समस्या सबसे विकट थी। सरदार पटेल के प्रयासों से भारतीय संघ में देशी राज्यों को शामिल कर लिया गया। जब हैदराबाद के निजाम ने सरदार पटेल के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया तब उन्होंने पुलिस कार्यवाही दव्ारा निजाम को भारत संघ में सम्मिलित होने के लिए बाध्य कर दिया।

उपर्युक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि सरदार वल्लभभाई पटेल दृढ़संकल्प, निर्भीक, साहसी तथा धैर्यवान नेता थे। दल-संगठन की उनमें अपूर्व क्षमता थी। उन्होंने एक बार चर्चिल से कहा था, ’आप लोग यह सोचकर बोलना सीखें कि आप स्वतंत्र भारत से बातचीत कर रहे हैं।’ सरदार पटेल एक अनुशासनप्रिय व्यक्ति थे। वे अनुशासनहीनता सहन नहीं कर सकते थे। भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में सरदार पटेल का नाम इसलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने देश की एकता को सुरक्षित बनाए रखने का प्रयास किया और देश से सामंतवादी तथा निरंकुश शासन को खत्म करके लोकतंत्रीय व्यवस्था को कायम रखा। 15 दिसंबर, 1950 को उनका स्वर्गवास हो गया।