व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 29

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पटेल और भारतीय राज्यों के प्रति नीति

5 जुलाई, 1947 ई. को ’स्टेट (राज्य) विभाग’ की स्थापना सरदार पटेल के निर्देशन में की गई। उन्होंने राज्य नरेशों से अपील की कि भारत के सामूहिक हितों को ध्यान में रखते हुए वे देश की अखंडता को बनाए रखने में मदद करे। प्रतिरक्षा, विदेश संबंध और संचार व्यवस्था-इन तीन विषयों के संबंध में ही राज्यों को संघ में सम्मिलित होने के लिए कहा गया। उन्होंने नरेशों को विश्वास दिलाया कि कांग्रेस किसी प्रकार से राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने को तैयार नहीं थी। उन्होंने मैत्री और सद्भावना का हाथ बढ़ाया।

भारतीय राज्यों का भारतीय संघ में तीन विषयों के लिए भी सम्मिलित होना कितना कठिन था इसका अनुमान इस बात से हो सकता है कि 1937-39 ई. के मध्य ये राज्य इन तीन विषयों पर भी संघ में सम्मिलित नहीं हुए थे। इसके अतिरिक्त 1947 ई. में दो अन्य कठिनाइयां भी थीं-एक जिन्ना दव्ारा राज्यों को पथभ्रांत करना और दूसरा कुछ नरेशों का अपने आपको पूर्ण स्वतंत्रता घोषित करने तथा दोनों डोमिनियनों से कूटनीतिक संबंध स्थापित करने का प्रयत्न जैसे जोधपुर, भोपाल के शासकों ने किए। लार्ड माउंटबेटन ने राज्य नरेशों को भौगोलिक तथा ऐतिहासिक बंधनों का स्मरण दिलाया और राज्यों को दो दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने का परामर्श दिया।

  • इंस्टूमेंट (साधन) ऑफ (का) एक्सेशन (कार्य)

  • स्टेंडस्टिल एग्रीमेंट। (समझौता)

इंस्टूमेंट ऑफ एक्सेशन (प्रवेश पत्र) वह पत्र था जिस पर हस्ताक्षर करके कोई भी राजा भारतीय संघ में सम्मिलित हो सकता था और प्रतिरक्षा, विदेशी मामले तथा यातायात एवं संचार व्यवस्था का उत्तरदायित्व संघीय सरकार को सौंप देता था। स्टेंडस्टिल एग्रीमेंट (समझौता) के अनुसार उस व्यावहारिक स्थिति को स्वीकृति प्रदान करना होता था जो अंग्रेजी साम्राज्य में केन्द्रीय सरकार को उपलब्ध थी। सरदार पटेल ने 15 अगस्त, 1947 ई. के पूर्व जूनागढ़, हैदराबाद और कश्मीर को छोड़कर अन्य सब राज्यों को भारतीय संघ में सम्मिलित होने के लिए सहमत करा लिया। इस कार्य में सफलता का रहस्य यह था कि सरदार पटेल ने राजाओं को भौगोलिक, आर्थिक तथा जनता की इच्छाओं का ध्यान रखकर कार्य करने के लिए कहा। जूनागढ़ के शासक ने 15 अगस्त, 1947 ई. को पाकिस्तान में सम्मिलित होने की घोषणा की लेकिन जनता का असंतोष इतना अधिक बढ़ा कि उसे अपनी जान बचाने के लिए पाकिस्तान भाग जाना पड़ा और जूनागढ़ भारत में सम्मिलित हुआ। हैदराबाद का निजाम भी स्वयं को पूरी तरह स्वतंत्र समझता था। निजाम की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षा अधिक से अधिक सेना, जवाहरात एकत्र करने की थी। कहा जाता है कि उसकी व्यक्तिगत संपत्ति 300 करोड़ की थी। उसने राजसत्ता का अपने हाथों में केन्द्रीयकरण किया हुआ था। वह प्रजातंत्र को अत्यंत दूषित प्रणाली समझता था और राजा के अधिकारों को दैवीय मानता था। नवंबर, 1947 ई. में निजाम ने भारत के साथ स्टेंडस्टिल एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर किए। कश्मीर की समस्या अधिक जटिल रही। स्वतंत्रता प्राप्ति के शीघ्र बाद ही पाकिस्तान की ओर से कुछ कबाइलियों ने उस पर आक्रमण कर दिया। कश्मीर का शासक उसे रोक सकने में असमर्थ रहा। आक्रमणकारी तेजी से आगे बढ़ते चले गए। राज्य को सुरक्षित रखने के लिए वहांँ के महाराजा ने 26 अक्टूबर, 1947 ई. को भारतीय संघ में सम्मिलित होना स्वीकार किया। भारतीय सेनाओं ने कश्मीर की सुरक्षा की उचित व्यवस्था की और आक्रमणकारियों को हटाकर पीछे धकेल दिया। 31 दिसंबर, 1947 ई. को भारत ने संयुक्त राष्ट्र संघ से अनुरोध किया कि वह पाकिस्तान को उत्तर-पश्चिमी कबाइलों को भारत आक्रमण से सहायता देने से रोके। सुरक्षा परिषद् इस समस्या को सुलझाने में पूर्णतया असमर्थ रही। 1 जनवरी, 1949 ई. को भारत पाकिस्तान में युद्ध विराम पर हस्ताक्षर हुए। सुरक्षा परिषद् इस समस्या को सुलझाने में कोई प्रगति नहीं हुई।