व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 31

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नेताजी सुभाषचन्द्र बोस

भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन तथा स्वतंत्रता संग्राम में सुभाषचन्द्र बोस का नाम भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे स्वतंत्रता संग्राम के वीर सेनानी थे। उनके महान त्याग और बलिदान के कारण उनको ’नेताजी’ कहा जाता था। सुभाषचन्द्र का जन्म 23 जनवरी, 1897 को कटक में हुआ था। वे अत्यंत मेधावी छात्र थे। उन्होंने आई.सी.एस. की परीक्षा में सफलता प्राप्त की थी। लेकिन, देशसेवा की भावना ने उन्हें पदत्याग करने के लिए बाध्य कर दिया। वे महात्मा गांधी के कार्यक्रमों से प्रभावित नहीं थे। वे नेताजी देशबंधु चितरंजन दास से मिले। वे चितरंजन दास से काफी प्रभावित हुए। वे उनके शिरू तथा सहयोगी बन गए। 1921 ई में सुभाषचन्द्र बोस, देशबंधु चितरंजन दास दव्ारा स्थापित राष्ट्रीय महाविद्यालय के प्राचार्य नियुक्त हुए। बोस को महात्मा गांधी दव्ारा संचालित आंदोलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक दल का कमांडर (नेता) बनाया गया। प्रिंस ऑफ (के) वेल्स के बहिष्कार-संबंधी आंदोलन में नेताजी ने भाग लिया और गिरफ्तार कर लिए गए। जब स्वराज दल का गठन किया गया तब उसके प्रचार की जिम्मेवारी नेताजी ने अपने ऊपर ली। जब कलकता कॉरपोरेशन (निगम) में उनके दल की विजय हुई तब उन्हें मेयर बनाया गया। उन्होंने बड़ी तत्परता से अपने कार्यों का संपादन किया। 1925 ई. में बंगाल अराजक आदेश के अंतर्गत उन्हें जेल भेज दिया गया। जेल से छूटने पर उन्होंने अपना समय रचनात्मक कार्यो की ओर लगाया। उन्होंने गांधी-इरविन समझौते का घोर विरोध किया। उन्होंने एक अलग दल बनाया जिसका नाम उन्होंने ’इंडिपेडेंस (स्वतंत्रता लीग (संघ)’ रखा। साइमन कमीशन के बहिष्कार में उन्होंने महात्मा गांधी की नीतियों की तीव्र आलोचना की। जब गांधी जी गोलमेल सम्मेलन से खाली हाथ लौटे और पुन: उन्होंने सत्याग्रह आंदोलन चलाया तब नेताजी को कैद कर लिया गया। जब उनका स्वास्थ्य खराब हुआ तब इलाज के लिए वे यूरोप गए। वहांँ उन्होंने एक व्यक्तव्य दिया, ’राजनीतिक नेता के रूप में महात्मा गांधी असफल रहे हैं और कांग्रेस को नए सिरे से संगठित करना चाहिए। यदि ऐसा न किया गया तो एक नया दल स्थापित करना पड़ेगा।’ 1939 ई. में महात्मा गांधी से उनका मतभेद काफी बढ़ गया और गांधी जी के विरोध के बावजूद उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। उस अवसर पर गांधी जी ने कहा था, ’पट्‌टाभि की हार मेरी हार है।’ अंत में, सुभाषजी ने कांग्रेस से त्यागपत्र दे दिया। उन्होंने एक नए दल का गठन किया, जिसे फॉरवर्ड (आगे) ब्लॉक (खंड) कहते हैं। नेताजी को गांधी जी के असहयोग आंदोलन में विश्वास नहीं था। इसके बावजूद नेताजी ने गांधी जी को पूज्य तथा सर्वोत्तम महापुरुष कहा।

जब दव्तीय विश्वयुद्ध प्रारंभ हुआ तब नेताजी ने सक्रिय आंदोलन करने के लिए जनता का आह्‌वान किया। नेताजी को उनके मकान में नजरबंद कर दिया गया। 26 जनवरी, 1941 को वे अचानक अपने घर से गायब हो गए। यह कहा जाता है कि वे काबूल और जर्मनी होते हुए जापान पहुंचे। बाद में उन्होंने आजाद हिंद फौज का नेतृत्व संभाला। नेताजी के नेतृत्व में इस सेना ने अंग्रेजों से लोहा लिया और उन्हें हराते हुए वह इंफाल तक पहुंच गई। लेकिन, युद्ध में जापान की पराजय से आजाद हिन्द फौज के अफसरों को गिरफ्तार कर लिया गया। यह कहा जाता है कि उसी समय वायुयान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो गई।

उपर्युक्त तथ्यों से यह स्पष्ट होता है कि नेताजी एक वीर और साहसी पुरुष थे। आजाद हिन्द फौज की स्थापना कर उन्होंने अपार साहस और उत्साह का परिचय दिया। उनकी यह धारणा थी कि भारत की स्वतंत्रता बाह्‌य शक्तियों की सहायता और शस्त्र दव्ारा ही प्राप्त की जा सकती है। वे एक क्रांतिकारी पुरुष थे। उनके संबंध में पट्‌टाभि सीतारमैया ने कहा है, ”सुभाष बाबू का जीवन एक इतिहास है, वह अति आकर्षक है तथा गुत्थियां से उलझा हुआ है, बचपन से ही झंझावातों से परिपूर्ण है। वह रहस्यवाद और वास्तविकता तथा धार्मिक भावना और व्यावहारिकता का अनोखा सम्मिश्रण है।”