व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 4

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गांधी के आर्थिक विचार

गांधी वैज्ञानिक अर्थ में अर्थशास्त्री नहीं थे। उन्होंने समय-समय पर प्रतिपादित आर्थिक सिद्धांतों का विधिवत अध्ययन भी नहीं किया था। इसके बावजूद गांधी ने अर्थव्यवस्था के संबंध में जो विचार व्यक्त किए हैं, वे अत्यंत मूल्यवान हैं। उन्होंने अर्थशास्त्र पर कोई पुस्तक नहीं लिखी किन्तु यदि उनके इधर-उधर बिखरे आर्थिक विचारों का संकलन किया जाए तो एक ऐसी आर्थिक-व्यवस्था की संरचना होती है जो स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी वर्तमान में प्रासंगिक प्रतीत होती है। नेहरू आदि नेताओं के अथक प्रयत्न से इन वर्षों में भारत का जो आर्थिक मानचित्र उभर कर आया है वह कई दृष्टियों से संतोषजनक तो कहा जा सकता है, किन्तु साथ ही इस आर्थिक-व्यवस्था की कमियां और कमजोरियां भी उभर कर सामने आयी हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि इन कमियों तथा कमजोरियों का कारण गांधी के आर्थिक विचारों की उपेक्षा हो?

गांधी खोखले भौतिकवाद के विरोधी थे। उनके सामाजिक तथा राजनीतिक विचारों की तरह उनके आर्थिक विचार भी सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित थे। वे धन इकट्‌ठा करने के लिए धनोपार्जन करने के कट्‌टर विरोधी थे। मनुष्य, धन के लिए नहीं बल्कि धन, मनुष्य के लिए है। धन का उपयोग यदि कुछ व्यक्तियों तक ही सीमित हो जाए तो देश में नैतिकता असंभव हो जाएगी। इसलिए जो भी धन देश में उपलब्ध है उसका समान वितरण होना चाहिए। किन्तु वे यह भी मानते थे कि एक का धन जबरन छीन कर दूसरे को नहीं दिया जा सका। ऐसी व्यवस्था में तो जंगल राज्य स्थापित हो जाएगा। व्यक्तिगत रूप में धनी और निर्धन में कोई अंतर नहीं है। जिनके पास संपत्ति या धन है उनसे यह अपील की जा सकती है कि वे अपनी संपत्ति या धन को स्वेच्छा से उनको भी दें जिनके पास इसका अभाव है। क्या ऐसा करना आधुनिक युग में संभव हैं? कार्य कठिन अवश्य प्रतीत होता है, पर कुछ ही वर्ष पहले संत विनोबा भावे ने अकेले ही इस कार्य को करके दिखाया था। अगर उनको पूर्ण सफलता नहीं मिली तो उसके पीछे अन्य कारण हैं, ”भूमिदान” की सैद्धांतिक कमियां। अगर उनके कार्य में सरकार तथा अन्य संस्थाओं तथा व्यक्तियों ने सहयोग किया होता तो गांधी का एक स्वप्न अवश्य पूरा हो गया होता।

गांधी के आर्थिक विचारों का आधार विकेन्द्रीकरण का सिद्धांत है। जिस प्रकार राजनीतिक सत्ता तभी कारगर हो सकती है जब सत्ता सच्चे अर्थ में लोगों के हाथों में हो ( वोट देने का अधिकार मात्र नहीं)। उसी प्रकार आर्थिक समृद्धि के लिए भी यह आवश्यक है कि हम गांवों से उत्पादन प्रक्रिया शुरू करें, तभी गांव समृद्ध हो पाएगा।

देश में उपलब्ध तथा उपार्जित धन का समुचित बंटवारा किस तरह से हो? इस विषय में गांधी ने एक पुराने सिद्धांत का नवीन रूप से प्रतिपादित किया। इस सिद्धांत को संरक्षकता सिद्धांत या ”ट्रस्टीशिप (सरपरस्ती) डॉक्टरिन (चिकित्सक)” कहा जाता है। यह सिद्धांत पाश्चात्य अर्थशास्त्र में भी आया है, किन्तु इसकी व्याख्या गांधीजी ने उपनिषदों था भगवदगीता के आधार पर की है। इस सिद्धांत के अनुसार जो कुछ भी संसार में उपलब्ध है प्रकृति प्रदत्त अथवा मानव प्रयत्न से प्राप्त-वह किसी व्यक्ति अथवा कुछ व्यक्तियों की निजी संपत्ति नहीं है। उन्होंने माना कि ”सबै भूमि गोपाल की” और ”गोपाल” की उन्होंने अपनी व्याख्या भी की। आधुनिक ”गोपाल” का अर्थ है जनता-जनार्दन। उपलब्ध संपत्ति में सबका अधिकार है। अगर किसी के पास कुछ है जिसे वह अपना माने तो वह सरासर झूठ है। वह तो उसके संपत्ति का केवल संरक्षक या ”ट्रस्टी” मात्र है, स्वामी नहीं। इस सिद्धांत के अनुसार ”लॉ (कानून) आफ (का) इनहेरिटिनस (विरासत)” बेईमानी है। बाप की संपत्ति बेटे की नहीं, सारे देश की है।

गांधी का ट्रस्टीशिप का यह सिद्धांत मार्क्सवाद के निकट प्रतीत होता है। किन्तु गांधी और मार्क्स से दो मुख्य भिन्नतायें हैं- एक तो यह कि मार्क्स ”वर्ग-संघर्ष” के हामी थे, गांधी वर्ग-संघर्ष की इजाजत नहीं देते। संघर्ष के स्थान पर वे प्रेम के सिद्धांत का समर्थन करते हैं। ट्रस्टी को स्वयं ही मानकर चलना होगा कि अपनी संपत्ति का वह स्वामी नहीं, संरक्षक-मात्र है और जब आवश्यकता हो इसका वितरण वह समाज के हित के लिए स्वेच्छा से कर दे। मार्क्स और गांधी में दूसरा अंतर यह है कि मार्क्स व्यक्तिगत संपत्ति के अधिकार को पूर्णतया नकार देता है और ”लाभ” के सिद्धांत को असमानता का मूल कारण मानता है। गांधी व्यक्तिगत संपत्ति के खिलाफ नहीं हैं- वे तो सिर्फ यह मानते हैं कि व्यक्तिगत संपत्ति का अर्थ शोषण करने वाला स्वामित्व नहीं है। जब गांधी नेहरू के विचारों के संपर्क में आये, तब उन्होंने पाश्चात्य समाजवाद की आलोचना की और इसके स्थान पर नैतिकता के नियमों पर आधारित ट्रस्टीशिप सिद्धांत की स्थापना की। कहने की आवश्यकता नहीं कि गांधी का यह ट्रस्टीशिप सिद्धांत उनके व्यापक दर्शन का एक हिस्सा मात्र है।

गांधीजी ने अपनी आर्थिक -व्यवस्था के संचालन के लिए कुछ साधनों की सिफारिशें की। ये मुख्य साधन हैं-चरखा, स्वदेशी तथा खादी। गीता के वचन ”स्वधर्मे निधनं श्रेय: पर धर्मो भयावह:” को गांधीजी ने एक व्यापक अर्थ में समझा। हम तभी आगे बढ़ सकते हैं जब हम अपनी सांस्कृतिक आस्थाओं के अनुरूप कार्य करें। हमारी मौलिक संस्कृति ग्रामीण-संस्कृति है। इसलिए हमारे लिए चरखे का जो महत्व है वह बड़ी मशीनों (यंत्रों) का नहीं हो सकता। अगर भारत का हर व्यक्ति कुछ समय निकाल कर सूत कातने का काम करे तो गांवों की कई समस्याएं अपने आप हल हो जाएंगी। चरखा गीता के कर्मयोग का प्रतीक है। दूसरी ओर गांधी जानते थे कि भारत में बहुत लोग हैं जो नंगे-भूखे रहते हैं, उनके पास अपना तन ढंकने को साधारण वस्त्र भी नहीं है इसलिए उन्होंने खादी की महत्ता को स्वीकार किया। अपने ही देश में निर्मित खादी लोगों को कपड़ा देगी और विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करने से देश की संपत्ति देश के अंदर ही रहेगी इसी तर्क के आधार पर गांधी ने चरखा, खादी और स्वदेशी की भावना को इतना महत्व दिया। यूरोप की औद्योगिक क्रांति के हामी लोग प्राय: यह भूल जाते हैं कि गांधी का संदेश भारत के आर्थिक व सामाजिक संदर्भों में समझा जाना चाहिए, अर्थशास्त्रों दव्ारा की गयी औद्योगीकरण की वकालत के संदर्भ में नहीं।

यह बात प्राय: बार-बार दुहराई जाती है कि गांधी अपने आर्थिक विचारों में कट्‌टर प्रतिक्रियावादी थे और मशीन के उपयोग तथा औद्योगीकरण के विरोधी थे। यह बात सही नहीं है। गांधी को सही संदर्भ में समझने की आवश्यकता है। गांधी ने इस विषय पर जो कुछ भी कहा वह यह मान कर कहा कि भारत की 80 प्रतिशत जनता गांवों में रहती है और कोई भी सरकारी कार्यक्रम तब तक सफल नहीं हो सकता जब तक गांवों की गरीबी का उन्मूलन न किया जाए। उन्होंने कुटीर उद्योग की बात इसी संदर्भ में कही थी। उनकी यह बात भारत में आज भी उतनी ही प्रासंगिक है। इसको जरा गहराई से समझने की आवश्यकता है। अगर भारत के 80 प्रतिशत लोगों (जो गांवों रहते हैं) में से प्रत्येक के पास दो वक्त की रोटी उपलब्ध हो, सिर ढंकने के लिए मकान हो और तन ढंकने के लिए साधारण खादी वस्त्र हो तो क्या ऐसा भारत वही होगा जिसे हम आज देख रहे हैंं? कदाचित नहीं। क्या कारण है कि इतने बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण के बावजूद गांवों की स्थिति लगभग वही है जो स्वतंत्रता प्राप्ति के समय थी? बड़े-बड़े शहरों की स्थिति तो अवश्य बदली है, वे दुनिया के बड़े-बड़े शहरों का मुकाबला कर रहे हैं, लेकिन गांव में परिवर्तन धीमा है। इसका सीधा कारण यह है कि बड़े-बड़े उद्योग-धंधे बड़े-बड़े शहरों में ही स्थित हैं। वे गांवों में हो भी नहीं सकते। ऐसी स्थिति में समाजवाद के ढकोसले के बावजूद पूंजीवाद का जन्म और वृद्धि अवश्यभावी है। शहरों में वे समस्याएं पनप चुकी हैं जिनको सब लोग जानते हैं। इन्हीं समस्याओं की वजह से देश अनैतिकता के गर्त में गिरता चला जा रहा है, दूसरी ओर गांव वीरान होते जा रहे हें। उनके पास जीविकोपार्जन का कोई साधन नहीं है, वहांँ के लोग इतने गरीब हैं कि वे कोई भी धंधा शुरू करने की स्थिति में नहीं हैं। जो धन बड़े-बड़े शहरों में खर्च किया जा रहा है उसको अगर गांवों में कुटीर -उद्योग धंधों की स्थापना के लिए खर्च किया जाए तो भारत से दरिद्रता का निवारण इतना कठिन कार्य नहीं है जितना कि समझा जाता है। गांधी ने यही बात बार-बार कही थी। वे अगर बड़े-बड़े उद्योग धंधों के विरुद्ध थे तो इसलिए कि वे कुटीर उद्योगों के माध्यम से भारत की 80 प्रतिशत जनता का हित चाहते थे। वे शहरों की उन्नति के खिलाफ नहीं थे, औद्योगीकरण के भी खिलाफ नहीं थे, न ही वे वैज्ञानिक तकनीकों की या बड़ी मशीनों की निन्दा करते थे, वे तो सिर्फ वस्तु-स्थिति को ध्यान में रखकर भारत के आर्थिक-विकास की बात करते थे।

इस विषय में लोगों में एक और भ्रांति है। कुछ लोग समझते हैं कि इस विषय में नेहरू गांधी जी के कट्‌टर विरोधी थे। नेहरू बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण के हामी थे जबकि गांधी जी केवल कुटीर उद्योगों के ही हिमायती थे। यह बात किसी सीमा तक सच है लेकिन इसको प्राय: गलत ढंग से समझा जाता है। गांधी और नेहरू दोनों की चिंता एक ही थी। वे देश में आर्थिक संपन्नता चाहते थे। जहां नेहरू का दृष्टिकोण विदेशी उदाहरणों से प्रभावित था, गांधी की विचारधारा भारत में मौजूदा यथार्थ पर आधारित थी। नेहरू चाहते थे कि बड़े-बड़े उद्योगों से जो लाभ होगा वह भारत के गरीबों तक भी पहुंच सकेगा इसलिए वे बार-बार समाजवाद की बात करते थे। किन्तु गांधी का विचार था कि उत्पादन निम्न स्तर से ऊपर की ओर अग्रसर होना चाहिए। उत्पादन बढ़ाने मात्र से ही समस्या हल नहीं होगी जब तक गांवों की गरीब जनता अपने पैरों पर खड़ी नहीं होगी तब तक वह उद्योगपतियों के शोषण का शिकार बनती रहेगी। यही गांधी के औद्योगिक विकेन्द्रीकरण का तथ्य है। एक पत्र में नेहरू ने गांधी जी को लिखा था : ”आपने औद्योगीकरण की कड़ी आलोचना की है इससे जो लाभ हो सकते हैं उनकी बात आपने नहीं की हैं।” इसके उत्तर में गांधी ने कहा था : ”मैंने औद्योगीकरण की आलोचना भारत के संदर्भ में की है, इसको अपने आप में बुरी चीज नहीं कहा है।” गांधी जी की समस्त अवधारणाएं, चाहे वे राजनीतिक हों, सामाजिक हों या आर्थिक, भारत की वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप थी। वे अर्थशास्त्रियों के किताबी ज्ञान को भारत पर थोपना नहीं चाहते थे। अर्थशास्त्र एक तकनीकी विषय है। गांधी अपनी सीधी बात को सरल भाषा मेें व्यक्त कर देते थे। इसलिए वे कभी-कभी अर्थशास्त्रियों के उपहास का पात्र भी बन जाते हैं।