व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 5

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गांधी के सामाजिक विचार

भारत का शायद ही कोई अन्य विचार हो, जिसने गांधी की तरह भारत के यथार्थ को आत्मसात्‌ करके अपने दर्शन की सृष्टि की हो। वे शंकर, कांट या बर्ग सॉ की तरह तर्क करने वाले व्यक्ति नहीं थे, न ही वे साधारण राजनीतिक से प्रेरित समाज सुधारकों की तरह लोगों को बहकाने में विश्वास रखते थे। वे एक ऐसे संत थे जिनकी सतत चिंता का विषय भारत था। वे भारत को यूरोप बनाने का सपना नहीं देखते थे, वे भारत को अपनी अस्मिता का ज्ञान करवाना चाहते थे। उनकी समस्त चिंताएं सामाजिक चिंताए थीं और उनकी सारी आस्थाएं नैतिकता के आधार पर अवस्थित थीं। वे राजनीति में न जाते तो भी संत होते किन्तु उन्होंने महसूस किया कि राजनीतिक क्षेत्र में प्रभावी हुए बिना वे अपना दायित्व अच्छी तरह नहीं निभा सकेंगे। जब भी हम उनके विचारों का मूल्यांकन करें हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वे जो कुछ भी कहते थे वह सब कुछ भारतीय शाश्वत मूल्यों के आधार पर कहते थे। वे शंकर या रामानमुज नहीं थे, किन्तु उनकी समस्त विचारधारा वेदांत-सम्मत थी। वे अदव्ैतवादी या दव्ैतवादी नहीं थे-ये नाम उनके साथ जोड़े अवश्य जाते हैं, लेकिन इन नामों की गांधी-दर्शन को समझने में कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। वे भारत को महान देश मानते थे, किन्तु वे इस देश की कमियों और कमजोरियों को नजरअंदाज नहीं करते थे। वे जानते थे कि इन कमजोरियों और कमियों को दूर किए बिना भारत अपनी वास्तविक अस्मिता प्राप्त नहीं कर सकता।

उनके सामाजिक-दर्शन का प्रारंभ उनकी धार्मिक-भावना से होता है। वे कहते थे कि ईश्वर ही एक ऐसी सत्ता है जिसके बिना एक पत्ता भी नहीं खिसकता । लेकिन यह सत्ता निष्प्राण नहीं है, इससे सान्निध्य स्थापित किया जा सकता है। इसलिए प्रार्थना का अत्यंत महत्व है। समाज सुधार संबंधी जो भी बातें गांधी जी ने कही हैं उनका आधार यही आस्था है। उन्होंने एक बार कहा था: ”मुझे कोई भी ऐसा अवसर याद नहीं है जब मुसीबत के समय प्रार्थना के जरिए मैं उस मुसीबत से उबर न गया हूंँ।” ऐसा लग सकता है कि ऐसी प्रगाढ़ आस्था वाला व्यक्ति समाज सुधारक कैसे हो सकता है, किन्तु हमें याद रखना चाहिए कि कबीर, नानक, विवेकानंद जैसे मनीषियों की सामाजिक अवधारणाएं भी धर्म के ही आधार पर प्रस्फूटित हुई थीं। गांधी भी कदाचित इसी श्रेणी में आते हैं। अंतर सिर्फ यह है कि गांधी का यथार्थवादी दृष्टिकोण कई मायने में औरों से भिन्न था।

उनके समस्त सामाजिक विचारों का आधार है समानता। रूसों ने भी कहा था कि सब व्यक्ति समान हैं क्योंकि वे समान ही पैदा हुए हैं। गांधी की समानता की अवधारणा कुछ भिन्न थी। वे कहते थे कि सब व्यक्ति समान हैं क्योंकि सभी ईश्वर की संतान हैं। जैसे एक बाप के लिए अपने बच्चों में अंतर करना संभव नहीं है उसी प्रकार ईश्वर ने भी सबको समानता का दर्जा देकर भेजा है। जहाँ कहीं भी असमानता है वह मनुष्य की बनायी हुई है। एक व्यक्ति अगर दूसरे की जाति, धर्म, रंग, व्यवसाय, क्षेत्र आदि के आधार पर नीचा समझता है तो वह ईश्वर दव्ारा निर्मित नियम का उल्लंघन करता है। ऐसा अमीर भी कर सकता है, बलशाली भी कर सकता है, पूंजीपति भी कर सकती है और इन सबसे अधिक शक्तिशाली राज्य भी कर सकता है। आदर्श समाज की स्थापना तभी हो सकती है जब ऊच-नीच का अप्राकृतिक भाव समाप्त कर दिया जाए। किन्तु यह भाव तभी समाप्त होगा जब समाज की संरचना धर्म दव्ारा अनुमोदित नैतिकता के दव्ारा की जाएगी। कानून बना देने मात्र से असमानता का भाव समाप्त नहीं हो सकता। जो राजनीति नैतिकता से निरपेक्ष होगी तथा जिसकी नींव शक्ति-संगठन पर ही होगी वह समानता का भाव पैदा नहीं कर सकती। धर्म और राजनीति दो अलग-अलग वस्तुएं नहीं हैं, धर्म के बिना राजनीति बेईमानी हैं और धर्म को प्रचलित पंथों में बांधकर देखना अधर्म है क्योंकि सबका ईश्वर एक है, सब का धर्म भी एक ही होना चाहिए, जब इस भावना का उदय होता है तभी समानता आ सकती है।

सच्चे अर्थ में सब धर्म एक हैं-”सर्व धर्म समभाव”- इस विचार के आधार पर गांधी ने सांप्रदायिकता पर पूरी शक्ति से प्रहार किया। वर्षों पूर्व कबीर भी यही काम कर चुके थे लेकिन कबीर ने अपने व्यंग्यात्मक प्रहार पर ज्यादा जोर दिया। समस्या का समाधान कबीर ने भी दिया किन्तु इसका संपूर्ण समाधान कबीर के रहस्यवाद में खोजना पड़ता है। गांधी की विचारधारा रहस्यवादी न होकर यथार्थवादी है। वे धर्म के शाश्वत मूल्यों के आधार पर एकता की बात करते हैं। 1947 में जब भारत का बंटवारा हुआ था गांधी ही सबसे दुखी व्यक्ति थे। शायद पहली बार उनको ऐसा लगा कि उनका एक सत्य का प्रयोग असफल हो गया। वे हिन्दू-मुस्लिम एकता चाहते थे-इसलिए नहीं कि उनको मुसलमानों अथवा हिन्दुओं के वोटों (मतदानों) की आवश्कयता थी। वे हिन्दु-मुस्लिम एकता चाहते थे, एक शाश्वत सत्य की स्थापना के लिए। वह शाश्वत सत्य यह था कि मनुष्य तो मनुष्य है, उसे चाहे मुसलमान कहो या हिन्दू। वे कदाचित यह नहीं समझ पाये होंगे कि एक दिन वह भी आयेगा जब हिन्दू मंदिर बनाने के लिए और मुसलमान मस्जिद बनाने के लिए आपस में खून की होली खेलेंगे। सांप्रदायिक एकता का गीत ही उनके आश्रम की प्रार्थना थी। इसी आदर्श की रक्षा के लिए उन्होंने अपने प्राणों की आहूति दे दी।

असमानता का एक दूसरा पक्ष भी था जिसे गांधीजी ने हिन्दू-समाज का कोढ़ कहा था-अस्पृश्ता। जब एक ही धर्म के लोग आपस में ऊंच-नीच का भाव रखते हों तो सामाजिक एकता का प्रश्न ही कहा उठता है। गांधीजी जीवनपर्यन्त अस्पृश्यता के खिलाफ लड़ते रहे, इस लड़ाई के पीछे गांधी जी की वह तर्कसंगत भावना थी जो इतिहास के सही अध्ययन से उत्पन्न होती है। इस बात को सही संदर्भ से समझने की आवश्यकता है। गांधी जी भारत के वर्णाश्रम धर्म के हिमायती थे, किन्तु अस्पृश्यता के कट्‌टर विरोधी। साधारणतया इसमें लोगों को विरोधाभास दीख पड़ता है किन्तु वास्तविकता ऐसी नहीं है। गांधीजी जानते थे कि वर्ण-व्यवस्था का मूल कारण काम के बंटवारे के लिए था, किसी काम को छोटा या किसी काम को बड़ा समझने के लिए नहीं। वर्ण-व्यवस्था इसलिए तर्कसंगत है क्योंकि इसके अनुसार मनुष्य को अपनी अभिरुचि और योग्यता के अनुसार काम मिलता है। अगर जुलाहे का बेटा जुलाहे का ही काम करे तो वह अपने बाप दव्ारा उपलब्ध योग्यता को आगे बढ़ा सकता है और इससे कपड़ा उद्योग उन्नति करता चला जाएगा। किन्तु अगर जुलाहे के बेटे में चिकित्सक या अभियन्ता बनने की अभिरुचि है तो उसको समाज नहीं रोक सकता। इस बात की उसको पूरी आजादी है। अभिरुचि तथा योग्यता के अनुसार कार्य का बंटवारा-गांधी का यही सिद्धांत था। इसी भावना से वर्ण व्यवस्था कायम की गयी थी। कालांन्तर में कुछ पेशे निम्न श्रेणी के और कुछ पेशे उच्च श्रेणी के समझे जाने लगे। यहीं से वर्ण व्यवस्था में विकृति आना प्रारंभ हो गया। ज्योंहि इस व्यवस्था में विकृति आयी अस्पृश्यता की भयानक बीमारी भी भारतीय समाज में घर कर गयी तथा कुछ लोगों को इतना नीच समझा जाने लगा कि उनको छूना तक वर्जित कर दिया गया।

गांधी का विचार था कि जब तक अस्पृश्यता को आमूल नष्ट नहीं कर दिया जाएगा हिन्दु-समाज उन्नति नहीं कर सकेगा। गांधी को महात्मा फूले जैसे लोगों से भी इस विषय में प्रेरणा मिली। अछुतोद्धार के लिए गांधी ने कई क्रांतिकारी कदम उठाये। वे जो कुछ भी कहते थे उसको खुद करके दिखाते थे। इसलिए अपने आश्रम में उन्होंने अछूतोद्धार का काम सबसे पहले किया। सदियों से चली आयी परंपरा के अनुसार मैला उठाना भारत में सबसे निकृष्ट कार्य समझा जाता रहा है। गांधी जी ने हरिजन बस्तियों में जाकर स्वयं यह कार्य किया और अपने आश्रमवासियों को भी यही हिदायत दी कि वे भी ऐसा ही कार्य करें ताकि निम्न वर्ग के लोगों के अंदर निहित छोटेपन की भावना का हृास हो और वे भी अपने को उच्च वर्ग के लोगों में शामिल कर सकने में समर्थ हों। सवर्णों को उन्होंने बार-बार याद दिलाया कि जो अपने ही जैसे मनुष्यों में किसी को छोटा समझें वह जघन्य अपराध तथा पाप का भागी है। एक मेहतर की भी वही अहमियत है जो एक चिकित्सक या अभियन्ता की।

गांधी ने अछूतोद्धार के लिए सरकार से कानून बनाने की प्रार्थना की। इस कार्य में अंबेडकर जैसे लोगों का भी उनको सहयोग मिला। उन्हीं के प्रयत्न से हरिजनों के मंदिर प्रवेश पर लगायी रोक धीरे-धीरे हटायी गयी। कुछ स्वार्थी तत्वों ने पाखंड-वश इसका विरोध भी किया। वर्तमान स्थिति में भी यह संघर्ष बराबर चालू है, किन्तुु गांधी के सतत प्रयास से इस आंदोलन को शक्ति मिली। उन्होंने कहा कि अछूत सबसे कमजोर हैं, इसलिए परम पिता परमात्मा की दृष्टि में वह सबसे अधिक प्रिय है इसलिए उन्होंने अछूतों को ”हरिजन” की संज्ञा दे दी, गांधी का यह कितना महत्वपूर्ण कार्य था उसको आज भी भलीभांति समझा जा सकता है। उनकी रामराज्य की कल्पना तथा सर्वोदय का आदर्श ”सर्व धर्म सम भाव” और ”सर्वजन हिताय” पर ही आधारित है। इन सिद्धांतों की प्रासंगिकता पर किसी को भी संदेह नहीं होना चाहिए।

गांधी के समानता के सिद्धांत का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पहलू स्त्री तथा पुरुष की पारस्परिक समानता भी है। वे एक ऐसे सामाजिक वातावरण में पले थे जहां नारी को पुरुष से नीचे का स्थान दिया जाता है। वे भली-भांति जानते थे कि इस भेदभाव का कोई भी प्रमाण भारतीय धार्मिक अथवा दार्शनिक ग्रंथों में नहीं मिलता। पर्दा-प्रथा जैसी कुरीतियां तथा सती-प्रथा जैसे जघन्य कार्य मध्ययुग की देन है और इन कुरीतियों से भारतीय समाज अवनति के गर्त में धंसता चला जा रहा है। अगर किसी देश की आधी जनता को निष्क्रिय और निष्प्राण कर दिया जाए तो देश का कितना नुकसान हो सकता है, यह बात गांधी भली-भांति जानते थे। उनके पहले कई अन्य सुधारक इस दिशा में कार्य कर चुके थे। गांधीजी ने इन लोगों को समर्थन किया और अपने आश्रम में पुरुषों तथा स्त्रियों को बराबर का स्थान दिया। यह काम उन्होंने अपनी धर्मपत्नी कस्तूरबा को सौंप दिया था।

गांधी प्राय: कहा करते थे कि पुरुषों को भली-भांति जान लेना चाहिए कि स्त्रियां वही काम कर सकती हैं जो वे कर सकते हैं। वे तो यहांँ तक कहते थे कि स्त्री मातृ-स्वरूपा होने की वजह से मानव मूल्यों को अधिक अच्छी तरह से संजोकर रख सकती है। वह प्रेम और स्नेह की प्रतिमूर्ति और इस क्षमता के आधार पर वह नैतिकता की संदेश-वाहिनी है। इसलिए स्त्री को पुरुषों से नीचे समझना अन्याय ही नहीं प्रकृति के नियमों का उल्लंघन है और ईश्वर की दृष्टि में पाप हैं।

गांधी विवाह को एक पवित्र-बंधन मानते थे, काम पिपासा शांत करने का साधन नहीं। वे विधवा-विवाह के भी पक्षपाती थे। उन्होंने कहा है कि अपनी इच्छा से विधवा बना रहना गलत नहीं है किन्तु किसी स्त्री को विधवा बने रहने के लिए बाध्य करना महान पाप है। वे बाल-विवाह को भी अनुचित मानते थे।

गांधी जी के अनुसार स्त्री के सारे अधिकार वही होने चाहिए जो पुरुषों को मिले हैं। जिस प्रकार वे सामाजिक समानता की अधिकारिणी है उसी प्रकार वे राजनीतिक समानता की भी अधिकारिणी हैं। उनकों राजनीति में आने का पूरा अधिकार है, किन्तु यह भी उनका कर्तव्य है कि वे अपने घर की समुचित देखभाल करें। उनके मातृ-पक्ष के वे बहुत बड़े हामी थे। उनका मानना था कि बिना उनकी सक्रिय भूमिका के भारतीय परिवारों में सुख शांति नहीं आ सकती।

गांधी के समानता के जिन आदर्शों का हमने वर्णन किया है वे एक आदर्श समाज में ही संभव हैं। अगर किसी देश की सामाजिक-परिस्थितियां अनुकूल न हो तो न तो सांप्रदायिक समानता संभव है, न ही अछूतोद्धार अथवा स्त्री-पुरुष समानता ही संभव है। वे सब बातें तभी संभव हैं जब स्वतंत्रता का वातावरण हो। बिना स्वतंत्रता के समानता का कोई अर्थ ही नहीं है, इसलिए वे कहते थे कि स्वतंत्रता सबका अधिकार है। गांधी का यह संघर्ष दक्षिण अफ्रीका में निवास के दिन से प्रारंभ हुआ और 1947 तक लगातार जारी रहा। उन्होंने कब क्या और कैसे किया, यह तो इतिहास का एक अत्यंत सबल तथा महत्वपूर्ण पक्ष है, किन्तु इस संघर्ष के पीछे किन विचारों की प्रेरणा थी यह जान लेना आवश्यक है।

क्या स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छन्दता है? गांधी का सीधा उत्तर था ”नहीं”- स्वतंत्रता तो मानव का प्रकृति-दत्त अधिकार है जो नैतिकता के सिद्धांतों पर आधारित है। प्रथम आवश्यकता कर्तव्यों का निर्वाह है और कर्तव्यों का निर्वाह तभी हो सकता है जब मनुष्य को अपने दैवी अथवा आत्मिक शक्तियों की अभिव्यक्ति और अवसर मिले। स्वतंत्रता का हनन तब होता है जब मनुष्य पर बनावटी बंधन थोप दिये जाते हैं। इस दिशा में गांधी की मूल चिंता आध्यात्मिक थी और रूसों की संभवत: राजनैतिक।

यद्यपि गांधी आध्यात्मिक स्वतंत्रता के हिमायती थे किन्तु वे यह भी जानते थे कि बिना राजनीतिक स्वतंत्रता के आध्यात्मिक स्वतंत्रता संभव नहीं है। इसी कारण बुनियादी तौर पर एक संत होते हुए भी वे भारत के राजनीतिक आंदोलन में प्रत्यक्ष रूप से कूद पड़े और जीवनपर्यन्त संघर्षरत रहे।

रानाडे का विचार था कि राजनीतिक स्वतंत्रता के बिना सामाजिक सुधान न तो संभव है न वाच्छनीय। तिलक का मत था कि अगर देश के पास स्वशासन की व्यवस्था नहीं है तो सामाजिक एकता की बात करना व्यर्थ है, गांधी का विचार दोनों से ही कुछ भिन्न था। वे मानते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता और सामाजिक समानता दोनों एक ही भावना के दो पक्ष हैं। दोनों बातें एक दूसरे से भिन्न हो सकती हैं किन्तु वे एक दूसरे की पूरक हैं। दोनों को एक साथ चलना चाहिए। हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख और ईसाई सभी धर्मावलंबी अपने को एक मानकर चलें और राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए अहिंसक आंदोलन करें किन्तु राजनीतिक स्वतंत्रता मात्र ही हमारा लक्ष्य नहीं होना चाहिए। हमें एक राष्ट्र बनना है और इसकी प्रक्रिया स्वतंत्रता के बाद नहीं, पहले से प्रारंभ हो जानी चाहिए। इसीलिए गांधी जब अंग्रेजों के खिलाफ सत्याग्रह करते थे तो उसी दौरान समाज सुधार के कार्यों में भी जुटे रहते थे। वे मानव-जीवन को समग्रता की भावना से देखते थे, अलग-अलग हिस्सों (टुकड़ों) में नहीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी पं. नेहरू बार-बार कहते थे कि राजनीतिक स्वतंत्रता तो मिल गयी है किन्तु वह काफी नहीं है, हमें अपने देश को एक महान देश बनाना होगा, यह भावना नेहरू को गांधी से विरासत में मिली थी और वे इस बात को स्वीकार भी करते थे।