व्यक्तित्व एवं विचार (Personality and Thought) Part 8

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नेहरू और लोकतंत्र

नेहरू के अनुसार, लोकतंत्र अनुशासन, सहिष्णुता और एक-दूसरे की इज्जत की भावना पर आधारित है। आजादी दूसरों की आजादी की ओर सम्मान की दृष्टि से देखती है। उनका मत था कि लोकतंत्र पूर्णरूपेण राजनीतिक मामला नहीं है। लोकतंत्र का अर्थ है सहिष्णुता न केवल अपने मत वाले लोगों के बारे में सहिष्णुता बल्कि अपने विरोधियों के प्रति सहिष्णुता। इस प्रकार नेहरू की लोकतंत्र की अवधारणा, लोकतंत्र की पश्चिमी अवधारणा से पूर्णत: भिन्न है। उनका विचार था कि वर्तमान में उपनिवेशवाद अथवा साम्राज्यवाद संपूर्णत: अनुचित, अपमानजनक तथा लज्जास्पद पंथ हैं।

उनका मानना था कि लोकतांत्रिक शासन प्रणाली केवल चुनाव की बात नहीं है। लोकतंत्र का सही अर्थ होना चाहिए सामाजिक-आर्थिक विषमता का उन्मूलन -जहां अनुशासनबद्धता स्वयं प्रेरित होती हो। क्योंकि बिना अनुशासन के लोकतंत्र निष्प्राण है। वे लोकतांत्रिक शासन उनके विचार से संसदीय लोकतंत्र में अनेक गुण अपेक्षित हैं। अर्थात्‌ उसे सबसे पहले सक्षम होना चाहिए, कार्य के प्रति निश्चित रूप से श्रदव्ा होनी चाहिए, आस्था होनी चाहिए कि सम्मान के साथ हार-जीत कैसे अपनाते हैं।

नेहरू और धर्मनिरपेक्षता

नेहरू धर्म में व्याप्त पुरानी रूढ़ियों, भ्रामक कल्पनाओं तथा अंध विश्वासों से दुखित थे। उनके लिए मुख्य समस्याएं थी व्यक्ति और सामाजिक जीवन की समस्याएं। ये समस्याएं हैं- संतुलित शांत जीवन, व्यक्ति के अन्तर्वाह्‌य जीवन में एक उचित संतुलन, समूह और व्यक्ति के संबंधों में सामंजस्य और कुछ अधिक अच्छे तथा उच्च बनने की इच्छा। इसी परिप्रेक्ष्य में नेहरू की धर्मनिरपेक्षता निहित है जो व्यक्ति और समूह का एक मानवीय दृष्टिकोण प्रसतुत करती है। संविधान में भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य के रूप में प्रस्तुत करने में नेहरू का महत्वपूर्ण योगदान है। नेहरू का मत है कि धर्मनिरपेक्ष होने का मतलब यह नहीं कि वह अधार्मिक अथवा नास्तिक है। धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र का अर्थ सभी धर्मों को समान रूप से सम्मानित किया जाना तथा प्रत्येक मनुष्य को चाहे वह किसी भी धर्म का अनुसरण करता हो-समान अवसर देना है। नेहरू धार्मिक मामलों में राज्य की तटस्थता के पक्षधर थे। उन्होंने लिखा है, ’मुझे विश्वास है कि भावी भारत की सरकारें इस अर्थ में धर्मनिरपेक्ष होंगे कि वे अपने को किसी विशेष धार्मिक विश्वास के साथ नहीं जोड़ेंगी।’ नेहरू एक समान नागरिक संहिता के हिमायती थे। उनका मानना था कि धर्मनिरपेक्षता के आदर्श में विभिन्न समुदायों के लिए विभिन्न कानून का होना एक अभिशाप है। संभवत: नेहरू इस धर्मनिरपेक्षता के माध्यम से देश में एक सुदृढ़ परिवर्तन की कल्पना कर रहे थे।

नेहरू और मिश्रित अर्थव्यवस्था

नेहरू की संकल्पना में राष्ट्र की अर्थव्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र एक-दूसरे के साथ मिलकर राष्ट्र के चहुंगुखी विकास में सहायक सिद्ध हों। अर्थशास्त्रियों ने इसी अर्थव्यवस्था को मिश्रित अर्थव्यवस्था कहा है। नेहरू का विचार था कि जिन राष्ट्रों के पास वित्तीय एवं तकनीक साधन अत्यधिक सीमित हैं, उनके लिए अर्थव्यवस्था का पूर्णत: राष्ट्रीयकरण किया जाना उपयोगी नहीं हो सकता और खासकर भारत जैसे विकासशील देश के लिए।

नेहरू आधारभूत एवं भारी उद्योगों तथा प्रतिरक्षा पर राज्य के पूर्ण नियंत्रण के पक्षधर थे और शेष उद्योगों जिनके कारखाने व्यक्तिगत स्वामित्व में हैं, उसी भांति रहने देने के पक्ष में थे। परन्तु उन्होंने नवीन कारखानों की स्थापना का अधिकार राज्य के पास सुरक्षित रखने को कहा। इस प्रकार उन्होंने भारत की तत्कालीन परिस्थितियों में उत्पादन के साधनों को व्यक्तिगत स्वामित्व में छोड़ना उचित समझा और राष्ट्रीय साधनों को नवीन योजनाओं में लगाना श्रेयस्कर माना। उनके विचार से निजी क्षेत्र को सार्वजनिक क्षेत्र के सहयोग से कार्य करना चाहिए तथा सरकारी नियंत्रण में रहना चाहिए। इस प्रकार नेहरू का समाजवाद अर्थव्यवस्था पर राज्य के पूर्ण नियंत्रण की वकालत नहीं करता है। वह सार्वजनिक क्षेत्र का क्रमश: विस्तार किए जाने के पक्षधर थे जिसमें उनका उद्देश्य जनमानस का कल्याण एवं एक समतावादी समाज की स्थापना करना था।

नेहरू और राष्ट्रवाद एवं अंतरराष्ट्रीयतावाद

यद्यपि नेहरू ने राष्ट्रवाद का कोई सिद्धांत प्रतिपादित नहीं किया फिर भी वे एक सच्चे राष्ट्रवादी थे। उनकी राष्ट्रीयता, जाति, धर्म, वर्ग, भाषा, संकीर्णता तथा सांप्रदायिकता से परे है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के साथ सामंजस्य बैठाने के सभी आदर्श विद्यमान हैं।

वे एक राष्ट्रवादी दृष्टिकोण के साथ प्राचीन धर्मों का सम्मान करते थे। परन्तु उन्होंने, अपने ही दायरे में रहने वाले कूपमंडूक वृत्ति के राष्ट्रवाद को अपनाने से इंकार कर दिया। उनका विचार था कि हमें कुछ अंशों में एक प्रकार का सहिष्णु, क्रियात्मक, राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, जिसका अपने आप पर तथा अपने लोगों की अलौकिक बुद्धिमत्ता पर पूरा-पूरा भरोसा हो और जो एक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की स्थापना में अपना पूरा-पूरा सहयोग दे रहा हो।

नेहरू की राष्ट्रीय भावना संवदेना उन सभी मानव जातियों के लिए समर्पित थी जो पीड़ित तथा शोषित थे। नेहरू राष्ट्रवाद के भावनात्मक पहलुओं को स्वयं स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि, ”पुरातन उपलब्धियों एवं परंपराओं का स्मर्णात्मक समूह राष्ट्रवाद है। प्रत्येक समय की अपेक्षा राष्ट्रवाद वर्तमान में अधिक शक्तिशाली है। जब कभी भी कोई संघर्ष उत्पन्न होता है, राष्ट्रवाद की स्वाभाविक उत्पत्ति होती है।

नेहरू इस तथ्य से पूर्णत: सहमत थे कि अंतरराष्ट्रीयतावाद एक भावना है जिसके अनुसार व्यक्ति केवल अपने राज्य का ही सदस्य नहीं वरन्‌ समस्त विश्व का नागरिक है। नेहरू का राष्ट्रवादी विचार पूर्णत: अंतरराष्ट्रीयवाद के वृत्त में था। वे अन्य राष्ट्रों को नीचा दिखाने में विश्वास नहीं रखते थे बल्कि उनका विश्वास सभी के साथ शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व और पारस्परिक सहयोग रखने में था।

नेहरू का विश्वास था कि भारत का स्वाधीनता संग्राम विश्व के अन्य भागों के स्वतंत्रता संघर्ष पर अपना प्रभाव छोड़ेगा। उन्होंने विश्व के किसी भी कोने में उठने वाले शोषित और दलित जनमानस के संघर्ष को अपना समर्थन दिया। इसका ज्वलंत उदाहरण उनके दव्ारा इण्डोनेशिया के स्वतंत्रता संग्राम को दिया गया समर्थन है।

नेहरू का मानना था कि हमें अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों का विस्तार करना चाहिए तथा नये-नये मित्र बनाने चाहिए। साथ ही यह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि हम अपने पुराने मित्रों को न भूलें। नेहरू विश्व के प्रत्येक राष्ट्र के विश्व घटनाक्रम में सक्रिय भागीदारी के पक्षधर थे और अलगाववाद के कट्‌टर विरोधी।

भारत के वर्तमान विश्व संबंधों की रूपरेखा वास्तव में नेहरू दव्ारा ही बनायी गयी है। एशिया तथा अफ्रीका भारत मैत्री संबंध, संयुक्त राष्ट्र संघ एवं राष्ट्रकुल में भारत की सदस्यता, ये सभी नेहरू के अंतरराष्ट्रीयतावाद के ही परिणाम हैं। उनकी अंतरराष्ट्रीय नीति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण योगदान है गुटनिरपेक्षता।