1857 का विद्रोह (Revolt of 1857) for Competitive Exams Part 3

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सामाजिक कारण

सामाजिक क्षेत्र में भी भारतीय जनता ब्रिटिश शासन से क्षुब्ध थी। एक सौ वर्ष के शासनकाल में कंपनी (संघ) सरकार ने समाज सुधार संबंधी अनेक कार्य आरंभ किए। ये कार्य भारतीय सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप करके ही किए जा सकते थे। समाज सुधार का कार्य लॉर्ड विलियम बेंटिक के शासनकाल से ही प्रारंभ किया गया था। सतीप्रथा, बाल-हत्या, नरबलि आदि को बंद करने का प्रयास किया गया। डलहौजी ने विधवा विवाह को कानूनी मान्यता दे दी। अंग्रेज भारतीय रीति-रिवाजों की अवहेलना करते थे। उन्होंने अपनी संस्कृति भारतीयों पर लादने का प्रयास किया। अंग्रेज उन्हें ईसाई बनाना चाहते थे। 1856 ई. ने एक विधेक पारित किया जिसके अनुसार ईसाई धर्म में दीक्षित होने वाले भारतीय अपनी चल या अचल संपित्त से वंचित नहीं किए जा सकते थे।

धार्मिक कारण

ब्रिटिश सरकार भारत में आए ईसाई धर्म प्रचारकों को प्रोत्साहन देती थी तथा राजकीय सहायता भी प्रदान करती थी। वे हिन्दू तथा इस्लाम धर्म की आलोचना करते थे। कट्‌टर हिन्दुओं के हृदय में यह धारणा घर कर गई कि अंग्रेज उनके विवाह आदि पंरपरागत सामाजिक व्यवस्थाओं, रीति-रिवाजों तथा धर्म को नष्ट कर समूचे देश को ईसाई बनाना चाहते हैं। बहावी संप्रदाय दव्ारा संगठित आंदोलनों ने मुसलमानों के हृदय में अंग्रेजों के विरुद्ध प्रचंड आग भड़का दी। चिकित्सालय, जेल आदि में भी ईसाई धर्म की शिक्षा दी जाती थी। डलहौजी ने गोद लेने की प्रथा समाप्त कर दी। मंदिरों, मस्जिद एवं अन्य धार्मिक संगठनों की जमीन पर लगान लगाने से भी भारतीयों की धार्मिक भावनाओं को ठोस पहुँची। फलत: लोगों का असंतोष एवं आक्रोश बढ़ता गया, जिसने अंत में विद्रोह का रूप ले लिया।

आर्थिक कारण

अंग्रेजी सत्ता के प्रसार के फलस्वरूप भारत विश्व के निर्धन देशों में अग्रणी बन गया था। ईस्ट (पूर्वी) इंडिया (भारत) कंपनी एक व्यापारिक संस्था थी और भारत की व्यापारिक लूट ही उसके मालिकों का उद्देश्य था। भारतीय व्यापार पर अंग्रेजों ने एकाधिकार स्थापित कर लिया था और यहाँ के घरेलू उद्योग-धंधों को नष्ट कर डाला था। फलत: लोगों की आर्थिक स्थिति शोचनीय हो गई थी और बेकारों की संख्या बढ़ने लगी थी। लॉर्ड विलियम बेंटिक ने भूमि सुधार के नाम पर कर-विमुक्त तथा इनाम की भूमि छीन ली थी। लॉर्ड डलहौजी ने इनाम-कमीशन (आयोग) दव्ारा बीस हजार जागीरदारों का अंत कर दिया था। अंग्रेज अवकाश प्राप्त कर अपने देश लौट जाते थे और साथ ही अपने जीवन भर की आय भी ले जाते थे। इस तरह भारत का धन बहुत बड़ी मात्रा में विदेश चला जाता था।