1857 का विद्रोह (Revolt of 1857) for Competitive Exams Part 4

Download PDF of This Page (Size: 172K)

सैनिक कारण

प्रत्येक राष्ट्र की सुरक्षा की रीढ़ वहाँ की सेना होती है। यदि वह कमजोर हो जाए तो उस राष्ट्र की स्थिति संकटपूर्ण हो सकती है। कंपनी के सैनिकों में भारतीय सैनिक की संख्या दो लाख तैंतीस हजार थी जबकि अंग्रेजी सैनिक केवल पैंतालीस हजार थे। परन्तु उनके वेतन-भत्ते आदि अंग्रेज सैनिकों से बहुत ही कम होते थे। सेना के सभी उच्च पदों पर अंग्रेजों की नियुक्तियाँ होती थीं। अंग्रेज अफसर भारतीय सैनिकों के साथ बहुत बुरा व्यवहार भी करते थे।

यूरोपीय युद्धों में उलझने के कारण इंगलैंड के शासन को धक्का लगा था तथा अंग्रेज सैनिकों की योग्यता में हृास आ गया था। 1856 ई. में लॉर्ड कैनिंग के नियमानुसार भारतीय सैनिकों को देश से बाहर समुद्र के पार युद्ध करने के लिए जाना अनिवार्य कर दिया गया। भारतीय सैनिक समुद्र-पार जना धर्म के विरुद्ध समझते थे। हिन्दुओं में तिलक लगाना, टोपी पहनना, चोटी रखना आदि कर्त्तव्य धार्मिक समझे जाते थे। इसी तरह सिक्खों एवं मुसलमानों में दाढ़ी-मूँछ रखने का रिवाज था। भारतीयों के इन सभी रिवाजों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। इससे भी भारतीय सैनिकों में बड़ा रोष उत्पन्न हुआ। उनके नि:शुल्क पत्र भेजने की सुविधा भी छीन ली गई। इससे वे और भी क्रुद्ध हुए।

तात्कालिक कारण

सरकार ने ’इनफील्ड रायफल’ नामक नई बंदूक सेना के व्यवहार के लिए चालू की। इसके कारतूस को बंदूक में भरने के पहले दाँत से काटना पड़ता था। सैनिकों में यह खबर फैल गई कि कारतूस की खोल में गाय और सूअर की चर्बी हैं, जो हिन्दू तथा मुसलमान दोनों के लिए घृणा की वस्तु थी। इससे दोनों की धार्मिक भावनाओं को भारी चोट पहुँची। चर्बी वाली बात ने भारतीय सैनिकों को विद्रोह के कगार पर लाकर खड़ा कर दिया। धर्म की रक्षा के नाम पर हिन्दू और मुसलमान दोनों जीवन का मोह त्यागकर विद्रोह के लिए तत्पर हो गए। किसी ने ठीक ही कहा है, ”कारतूस की कहानी ने विद्रोहग्नि में वही काम दिया जो काम जलती हुई आग में सूखी लकड़ी करती है।” इस प्रकार ज्वालामुखी के मुँह पर बैठे समस्त देश में एक विस्फोट हुआ, जिसकी प्रचंड लपटें सतलज से नर्मदा तक के भू-भाग पर देखते-देखते फैल गई।