1857 का विद्रोह (Revolt of 1857) for Competitive Exams Part 6

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1857 के विद्रोह का स्वरूप

  • 1857 के विद्रोह का स्वरूप के संबंध में इतिहास में बड़ा मतभेद है। अंग्रेज इतिहासकारों ने इसे केवल सिपाही विद्रोह बतलाया है जिसका तात्कालिक कारण कारतूसवाली घटना थी। कुछ विदव्ानों की धारणा है कि असंतुष्ट देशी नरेश जिनके राज्य अथवा पेंशनों को डलहौजी ने छीन ली थी, इस विद्रोह के प्रमुख कारण थे, जिनका उद्देश्य अपने राज्य, पदों तथा पेंशनों को पुन: प्राप्त करना था। इसलिए इसका स्वरूप सामंतवादी था। सिपाही विद्रोह के साथ सहयोग करके इन लोगों ने इसे राजनीतिक रूप देने का यत्न किया। कुछ अन्य लेखकों के विचारनुसार यह अंग्रेजों के विरुद्ध मुसलमानों का षड्‌यंत्र था और इसका प्रधान उद्देश्य था बहादुरशाह की छत्रछाया में सारे भारत में मुसलमानी सत्ता को पुन: स्थापित करना। कुछ अन्य लोग इसे ईसाइयों के विरुद्ध धर्म युद्ध अथवा काली और गोरी जातियों के बीच सत्ता का संघर्ष या पश्चिमी और पूर्वी सभ्यता का संघर्ष मानते हैं। लेकिन अधिकांश भारतीय इतिहासकारों ने इसे राष्ट्रीय आंदोलन कहा और इसे भारत का प्रथम स्वतंत्रता-संग्राम बतलाया है। इस प्रकार इस विद्रोह के संबंध में कई तरह के मत व्यक्त किए गए हैं।

  • विद्रोह के स्वरूप के अध्ययन के बाद स्पष्ट हो गया है कि इसके संबंध में विभिन्न मत है जो परस्पर विरोधी हैं। इस विद्रोह को न तो केवल सिपाही विद्रोह न केवल मुसलमानों का षड्‌यंत्र और न संयोजित राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम कहा जा सकता है।

  • इस विद्रोह को सैनिकों ने प्रारंभ किया था, लेकिन इसमें भाग लेने वाले केवल सैनिक ही नहीं थे। इसमेें जनता ने भी सहयोग किया था और कई स्थानों पर तो जनता के भड़कने पर सैनिकों ने विद्रोह किया। इसलिए इसे केवल सैनिक विद्रोह कहना अनुचित होगा।

  • विद्रोह को मुसलमानों का षड्‌यंत्र भी नहीं माना जा सकता। इस विद्रोह के अनेक नेता हिन्दू थे। यह सांप्रदायिकता से एकदम दूर था तथा हिन्दू मुसलमान दोनों ने मिलकर इसका नेतृत्व किया था।

  • विद्रोह को स्वतंत्रता संग्राम अथवा राष्ट्रीय आंदोलन कहने में भी अनेक कठिनाइयां है। एक तो विद्रोह का क्षेत्र सीमित था, दूसरे उस समय भारत में उस राष्ट्रीय भावना का विकास नहीं हुआ था जिसमें आधुनिक राष्ट्रीयता के सभी गुण होते हैं। जनता का भी पूरा समर्थन इसको नहीं मिला था। विद्रोह के प्रमुख नेता असंतुष्ट सामन्त थे जो अंग्रेजी सरकार से नाराज हुए थे। अतएव इसको राष्ट्रीय आंदोलन भी नहीं कहा जा सकता।

  • 1857 के विद्रोह के संबंध में कहा जा सकता है कि इसको सैनिकों ने शुरू किया और इसमें प्रमुख भूमिका उन्हीं की रही, इसलिए यह सिपाही विद्रोह था। सामंतों ने सहयोग देकर इसको सामंतवादी आंदोलन का रूप दे दिया और जनता के आंशिक सहयोग, सांप्रदायिकता का अभाव, विद्रोहियों का संगठन और उसके उद्देश्य ने इसे लोकप्रिय स्वरूप प्रदान किया।

  • विद्रोह शुरूआती चरण में एक सिपाही विद्रोह था परन्तु यह विद्रोह सिपाही विद्रोह तक ही सीमित नहीं था। विद्रोह का स्वरूप लोकप्रिय था। इस लोकप्रिय स्वरूप को भारत के कई क्षेत्रों में देखा जा सकता है। भारत के कई क्षेत्र में आम लोगों की सहभागिता ने इस विद्रोह को लोकप्रिय स्वरूप प्रदान किया।

  • विद्रोह का स्वरूप पश्चगामी था। विद्रोह पश्च दृष्टि रखता था, इस विद्रोह में मध्यकालीन व्यवस्था को स्थापित करने का दृष्टिकोण था। बहादुर शाह जफर का भारत के बादशाह के रूप में स्वीकार किया जाना एवं सामंतों, प्रमुखों, राजाओं की व्यवस्था को स्वीकार किया जाना इस दृष्टिकोण को दर्शाता है।

  • विद्रोह का स्वरूप प्रगतिशील नहीं था। प्रगतिशीलता के तत्व अनुपस्थित थे। विद्रोह में विस्तृत दृष्टि का अभाव था, भविष्य के लिए कोई सुनिश्चित योजना नहीं थी।