1857 का विद्रोह (Revolt of 1857) for Competitive Exams Part 9

Download PDF of This Page (Size: 177K)

विद्रोह के पश्चात्‌ सैनिक और प्रशासनिक नीति

सैन्य नीति

  • सामान्य तौर पर सैन्य व्यवस्था में यूरोपीय प्रभुत्व को स्थापित करने का प्रयास।

  • भारतीयों के ऊपर निर्भरता को कम करने का प्रयास।

  • भारतीयों को विभाजित करने का प्रयास।

  • अधिक महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विशेष तौर पर जिनका सामरिक महत्व अधिक था यूरोप के लोगों के नियंत्रण में लाया गया। महत्वपूर्ण पदों पर यूरोपियों की नियुक्ति की गई। सैन्य व्यवस्था के महत्वपूर्ण शाखाओं जैसे-तोपखाना, टैंक (टंकी) इत्यादि यूरोपियों के नियंत्रण में रखा गया।

  • भारतीयों को अधिकारी वर्ग से बाहर रखने का प्रयास किया गया। 1914 तक कोई भी भारतीय सूबेदार पद से ऊपर नियुक्त नहीं हुआ।

  • भारतीय सैनिकों को लड़ाकू और गैर लड़ाकू वर्गो में विभाजित किया गया। सिक्ख, गोरखा, पठान को लड़ाकू वर्ग तथा अवध, बिहार एवं मध्य भारत के उच्च जाति के लोगों को गैर लड़ाकू वर्ग में रखा गया।

  • सैन्य व्यवस्था के भारतीय अंग को संतुलन और प्रति संतुलन के आधार पर व्यवस्थित किया गया। इसके अंतर्गत भारतीयों का एक वर्ग दूसरे वर्ग को संतुलित करता था। यह भारतीयों के बीच विभाजन का प्रयास था।

  • भारतीय सैन्य व्यवस्था को क्षेत्र, धर्म, जाति आदि के आधार पर व्यवस्थित किया गया और सैन्य व्यवस्था में कबीलाई एवं जातिगत सिद्धांतों को अपनाया गया।

  • कई रेजीमेंट (सेना) में कंपनियों (संघों) को जाति और समुदाय के आधार पर स्थापित किया गया।

  • भारतीय सेना के मिश्रित स्वरूप को स्थापित करने का प्रयास किया गया ताकि साम्राज्य विरोधी खतरे को टाला जा सके और सेना के भारतीय अंग के विभिन्न हिस्से एक-दूसरे के प्रति संतुलित करते रहें।

  • कंपनी की यूरोपियन सेना का विलय सम्राट की सेना में कर दिया गया।

प्रशासनिक नीति

  • 1858 में एक नया अधिनियम लाया गया और इस अधिनियम के दव्ारा संपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था को परिवर्तित कर दिया गया।

  • ईस्ट (पूर्व) इंडिया (भारत) कंपनी (संघ) के नियंत्रण को समाप्त किया गया। इस नियंत्रण को ब्रिटिश राजतंत्र को हस्तांतरित किया गया।

  • बोर्ड (परिषद) ऑफ कंट्रोल (नियंत्रण) की सर्वोच्च निकाय थी, उसको समाप्त कर दिया गया।

  • एक नये पद भारत मंत्री का सृजन किया गया, जो कि सेक्रेटरी (सचिव) ऑफ (का ) स्टेट (राज्य) कहलाता था।

  • एक नये परिषद् की स्थापना की गयी। यह 15 सदस्यीय परिषद् थी (भारत परिषद्) इसका कार्य था भारत मंत्री को उसके कार्यो में सहायता प्रदान करना।

  • भारत मंत्री ब्रिटिश संसद का एवं साथ में ब्रिटिश मंत्रीमंडल का एक सदस्य था और अपने कार्यो के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी था। वास्तविक शासन व्यवस्था पर नियंत्रण ईस्ट इंडिया कंपनी के ब्रिटिश संसद को हस्तांरित किया गया।

  • इस अधिनियम के दव्ारा प्रशासनिक व्यवस्था में एक मौलिक परिवर्तन लाया गया और इस परिवर्तन को मजबूत आधार दिया गया बाद के अधिनियमों के दव्ारा।

  • 1861 के अधिनियम के दव्ारा वायसराय के कार्यक्षेत्र का विस्तार किया गया और विधायी शक्तियां दी गयी।