सांप्रदायिकता एवं देश का विभाजन (Sectarianism and Partition of Country) Part 1 for Competitive Exams

Glide to success with Doorsteptutor material for competitive exams : Get detailed illustrated notes covering entire syllabus: point-by-point for high retention.

भूमिका

“संप्रदायवाद” एक ऐसी विचारधारा है, जिसमें यह विश्वास किया जाता है कि किसी धर्म के अनुयायियों के सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हित किसी दूसरे धर्म के मानने वालों के हितों से भिन्न होता है। यही विभिन्न दोनों में परस्पर विरोधी एवं शत्रुतापूर्ण भाव को पैदा करती है, जिससे उनके मध्य टकराव हो जाता है।

लेकिन वास्तव में संप्रदायवाद किसी धर्म या राष्ट्र की उपज न होकर संकीर्ण मानवीय मन स्थिति की उपज कही जा सकती है, जिसका उद्देश्य जन-कल्याण अथवा राष्ट्र कल्याण न होकर विदव्ेष में छिपी अपनी व्यक्तिगत स्वार्थपरता की पूर्ति होती है।

भारत ने संप्रदायवाद का उदय 19वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में राष्ट्रवाद के उदय के साथ-साथ हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि एक ओर जहां राष्ट्र आंदोलन को क्षति पहुंची वहीं दूसरी ओर लोगों में आपसी वैमनस्य बढ़ा। इस वैमनस्य का अंतिम परिणाम भारत के विभाजन के रूप में हुआ, जो सांप्रदायकता की चरम परिणति कही जा सकती है। भारतीय आम जीवन में आज भी सांप्रदायिक तनाव को देखा जा सकता है, जो लंबे समय से चले आ रहे इसी वैमनस्य और अविश्वास का प्रतिफल है।

Developed by: