सांप्रदायिकता एवं देश का विभाजन (Sectarianism and Partition of Country) Part 2

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सांप्रदायिकता के विकास कारण

  • अंग्रेजों की ”फूट डालो और शासन करो” की नीति। इसके तहत 1857 की क्रांति के बाद 1870 तक ब्रिटिश शासक ने हिन्दू तृष्टिकरण की नीति अपनाई तथा 1870 के बाद मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति। फलस्वरूप हिन्दू और मुसलमानों में आपसी वैमनस्य बढ़ा। अंग्रेजों की ”फूट डालो और शासन करो” की नीति का परिणाम यह हुआ कि मुस्लिम हर क्षेत्रों-उद्योग, वाणिज्य, व्यापार, सरकारी नौकरियों, शिक्षा आदि में पिछड़ते गए तथा इन सबों के लिए उन्होंने हिन्दुओं को उत्तरदायी माना।

  • कांग्रेस के गरम दल दव्ारा हिन्दू धार्मिक कट्‌टरता को बढ़ावा देना, तिलक दव्ारा गणपति एवं शिवाजी उत्सव शुरू किया जाना, अरविन्द घोष दव्ारा भारत को माता तथा राष्ट्रीयता को धर्म कहना, क्रांतिकारियों दव्ारा देवी काली के आगे शपथ लेना तथा बंगाल विभाजन विरोधी आंदोलन की शुरूआत गंगा में डुबकी लगाकर किया जाना तथा आपसी भाईचारा प्रकट करने के लिए रक्षा बंधन मनाया जाना। यद्यपि ये सारे कृत्य हिन्दू धर्म एवं परंपराओं से संबंद्ध थे तथापि इन महान नेताओंे का उद्देश्य संप्रदायवाद बढ़ाना न होकर राष्ट्रवाद की भावना को आपसी भाईचारा दव्ारा ’मजबूत’ बनाना था।

  • सामाजिक एवं सांस्कृति सुधारों की भूमिका जैसे आर्य समाज (स्वामी दयानंद सरस्वती) ने दूसरे धर्म ग्रहण करने वाले हिन्दुओं को धर्म में वापस लाने के लिए ”शुद्धि आंदोलन” चलाया। इसके प्रति उत्तर में मुसलमानों ने ”तंजिम या तबलिक आंदोलन” चलाया। दयानंद सरस्वती ने नारा दिया ”भारत हिन्दुओं के लिए है तो हिन्दू सभा के नेता लालचन्द्र ने नारा दिया कि ”हिन्दू पहले अपने को हिन्दू तथा बाद में भारतीय समझें।” ठीक इसी प्रकार मुस्लिम नेताओं ने नारा दिया हम मुस्लिम पहले है और भारतीय बाद में” इस प्रकार की भावना सांप्रदायिकता के विकास में सहायक हुई।

  • धर्म विशेष के आधार पर बने शिक्षण संस्थाओं ने भी सांप्रदायिकता के विकास को बढ़ावा दिया। इनमें डी.ए.वी. महाविद्यालय, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय, मो. एंग्लो ओरिएण्टल (पूरबी) महाविद्यालय, जामिया मिलिया इस्लामिया आदि प्रमुख थे।

  • अंग्रेंजों ने कांग्रेस की प्रतिदव्न्दव्ी संस्थाओं की स्थापना के दव्ारा सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया। इसमें 1886 में सर सैयद अहमद खां दव्ारा स्थापित ”एजुकेशनल (शिक्षात्मक) कांग्रेस” तथा 1906 में आगा खां एवं उनके सहयोगियों दव्ारा स्थापित ”मुस्लिम लीग” प्रमुख थे।

  • ब्रिटिश सरकार ने अपने संवैधानिक सुधार में धर्म विशेष के आधार पर पृथक निर्वाचन पद्धति के दव्ारा सांप्रदायिकता को बढ़ावा दिया। जैसे-1909 में मुस्लिमों के लिए, 1919 में सिक्खों के लिए तथा 1935 में ईसाइयों एवं एंग्लो -इंडियन (भारतीय) के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था की गयी।

  • अंग्रेज इतिहासकारों दव्ारा सांप्रदायिकता के आधार पर इतिहास की व्याख्या किया जाना। उदाहरण के लिए जेम्स मील ने भारतीय इतिहास को तीन भागों हिन्दू काल, मुस्लिम काल तथा ब्रिटिश काल में बाँटा।

उपरोक्त कारणों से ही भारत में सांप्रदायिकता का विकास हुआ। लेकिन भारत में सांप्रदायिकता का विकास एकाएक न होकर क्रमिक रूप से हुआ, जिसने विभिन्न स्तरों पर राष्ट्रीय आंदोलन को बुरी तरह से प्रभावित किया।

1905 में बंगाल विभाजन तक मुस्लिम सांप्रदायिकता काफी बढ़ चुकी थी। इसका अनुमान इस आधार पर लगाया जा सकता है कि मुसलमानों का एक वर्ग बंगाल विभाजन का समर्थन कर रहा था तथा इसे सरकार का उचित कदम बता रहा था। इन्हीं लोगों ने आगा खां, सलीमुल्लाह तथा वकारूल मुल्क के नेतृत्व में 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना की ताकि राष्ट्रवादी हिन्दुओं के विरुद्ध अंग्रेजों को मदद किया जा सके तथा अपने समुदाय विशेष के लिए विशेष सहायता पायी जा सकें। इन्हीं के प्रयासों से भारत परिषद अधिनियम, 1909 के दव्ारा मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन मंडल की व्यवस्था की गयी।

लेकिन 1913 के बाद जब मुस्लिम लीग की बागडोर कुछ युवा राष्ट्रवादियों जैसे-मो. अली जिन्ना, अली बंधुओं के हाथों में आयी तो उन्होंने मुसलमानों के राष्ट्रीयता का संचार करना शुरू कर दिया। यही कारण है कि 1916 के कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग साथ मिलकर काम करने के लिए सहमत हो गए। खिलाफत एवं असहयोग आंदोलन के समय तो इनकी एकता चरम पर पहुँच गयी।

लेकिन मोपला कृषक आंदोलन तथा असहयोग आंदोलन के वापस लेने के बाद हिन्दु-मुस्लिम दंगो ने सांप्रदायिकता को एकबार पुन: भड़काया। इस बार मुस्लिम लीग राष्ट्रवादी कट्‌टर दल के रूप में उभर कर सामने आया, जो राष्ट्रवादी मामलों जैसे-साइमन कमीशन का विरोध एवं सविनय अवज्ञा आंदोलन आदि में तो कांग्रेस का साथ देती थी लेकिन मुस्लिम हितों के सवाल पर बिल्कुल रूढ़िवादी हो जाती थी। नेहरू रिपोर्ट का विरोध इसी रूढ़िवादिता का परिणाम था। मुस्लिम लीग ने अपने समुदाय के हित के पोषण के लिए ही तीनों गोलमेज सम्मेलनों में भाग लिया था। इसी समय ब्रिटेन में अध्ययन कर रहे कुछ युवा मुसलमानों, जिसमें चौधरी रहमत अली, लियाकत अली तथा मो. इकबाल प्रमुख थे, पाकिस्तान नाम से एक अलग राष्ट्र का खाका तैयार किया। फलस्वरूप सांप्रदायिकता ने एक अलग स्वरूप धारण किया।

भारत शासन अधिनियम, 1935 के तहत 1937 में होने वाले चुनाव में जिन्ना के नेतृत्व में मुस्लिम लीग ने भाग लिया, जिसका उद्देश्य अपने को राष्ट्रीय दल के रूप में स्थापित करना था। परन्तु चुनाव परिणामों ने उसकी पोल खोल दी। क्योंकि 11 प्रांतों में हुए चुनाव में जहाँ कांग्रेस ने 9 प्रांतों में अपनी सरकार बनायी वहीं मुस्लिम लीग केवल दो प्रांतों में सरकार बनाने में सफल रही। वह भी साझा के रूप में जहाँ सबसे बड़ा दल मुस्लिम लीग न होकर क्षेत्रीय दल था।

इस असफलता से मुस्लिम लीग को भारी झटका लगा, फलस्वरूप वह मौका तलाशने लगी ताकि दव्-राष्ट्र के सिद्धांत पर जनमत तैयार कर सके। यह मौका उसे तब मिला जब दव्तीय विश्व युद्ध में भारत को शामिल करने के ब्रिटिश फैसले के विरोध में कांग्रेस मंत्रिमंडलों ने इस्तीफा दे दिया। मुस्लिम लीग ने इसे मुक्ति दिवस के रूप में मनाया। 1937 के चुनाव परिणाम मुस्लिम लीग को और भी कड़ी मांग रखने पर मजबूर करने लगी थी। क्योंकि यह अब उनके अस्तित्व का प्रश्न बन गया था। 1940 ई. में मो. जिन्ना की अध्यक्षता में मुस्लिम लीग का सम्मेलन लाहौर में हुआ, जिसमें सर्वसम्मति से पाकिस्तान की मांग का प्रस्ताव पारित किया गया। इस घोषणा ने सांप्रदायिकता की भावना को काफी बढ़ाया। इसी समय लार्ड लिनलिथगो ने 1940 में राजनीतिक संकट दूर करने के उद्देश्य ये ”अगस्त प्रस्ताव” पेश किया, जिसमें युद्धोपरांत भारत को औपनिवेशिक राज्य का दर्जा देने के साथ-साथ मुस्लिम हितों की रक्षा का वचन दिया गया। इससे लीग की पाकिस्तान की मांग को प्रोत्साहन मिला तथा उसने दुगुने उत्साह के साथ अपनी मांग के समर्थन में आंदोलन किया। 1942 में भारत आए क्रिप्स मिशन के अन्य प्रस्तावों के अलावा युद्धोपरन्त दो संविधान सभा बनाने का प्रस्ताव रखा। इससे मुस्लिम लीग काफी उत्साहित हुई तथा इसी उत्साह से प्रेरित होकर जिन्ना ने 23 मार्च, 1943 को ”पाकिस्तान दिवस” मनाया तथा कराची अधिवेशन में ”बांटो और जाओ” का नारा दिया। विभाजन संबंधी मांग तथा सांप्रदायिक समस्या के समाधान के लिए 1944 में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सी. राजगोपालाचारी ने ”सी. आर. फॉर्मूला” पेश किया। जिसमें मुस्लिम लीग को कांग्रेस के साथ मिलकर स्वतंत्रता की मांग करने को कहा गया तथा स्वतंत्रता के बाद मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में जनमत संग्रह कराकर विभाजन संबंधी राय पूछने की बात कही गयी। लेकिन मुस्लिम लीग ने इसे अस्वीकार कर दिया।

1946 में भारत आए कैबिनेट मिशन ने यद्यपि पाकिस्तान संबंधी मांग को स्पष्ट रूप से अस्वीकार कर दिया लेकिन संविधान सभा के चुनाव के लिए उसने भारतीय राज्यों को समूह क, ख, एवं ग में बांटा, इससे पाकिस्तान का खाका स्पष्ट रूप से तैयार हो गया।

मुस्लिम लीग उत्साह के साथ कैबिनेट मिशन योजना के तहत 1946 में होने वाले संविधान सभा के चुनाव में भाग लिया लेकिन उसे 1/4 से भी कम सीटों पर सफलता मिली। फलस्वरूप लीग ने इसे अस्वीकार करते हुए दो संविधान सभा की मांग रखी। कांग्रेस पर दबाव बनाने के उद्देश्य से लीग ने 16 अगस्त, 1946 को प्रत्यक्ष कार्रवाई दिवस मनाया। इससे देश भर में कई स्थानों पर दंगे हुए। लेकिन जब इसका कोई फायदा नहीं हुआ तो मुस्लिम लीग ने नेहरू की अध्यक्षता वाली अंतरिम सरकार में प्रवेश का फैसला किया। लेकिन इसका उद्देश्य सरकार को अस्थिर करना था ताकि बाध्य होकर कांग्रेस दव्-राष्ट्र सिद्धांत को मान लें।

भारत विभाजन तथा सांप्रदायिक समस्या के समाधान का अंतिम प्रयास नवंबर, 1946 में एटली के दव्ारा किया गया, जिसके तहत लंदन में एक सम्मेलन का आयोजन किया गया। लेकिन मो. जिन्ना की हठधर्मिता के कारण सम्मेलन असफल रहा। फलस्वरूप एटली ने संविधान सभा की विफलता की घोषणा की तथा कहा कि जून, 1948 तक भारत को स्वतंत्र कर दिया जाए। इस कार्य के लिए लार्ड माउंटबेटन को वायसराय बनाकर भारत भेजा गया।

लार्ड माउंटबेटन ने कांग्रेस एवं मुस्लिम लीग के नेताओं से बातचीत के आधार पर निष्कर्ष दिया कि भारत में सांप्रदायिकता संबंधी समस्या का एकमात्र समाधान भारत का विभाजन है। इस उद्देश्य से माउंटबेटन ने 3 जून, 1947 को भारत विभाजन संबंधी प्रस्ताव पेश किया। इसे लीग ने तत्काल स्वीकार कर लिया। कांग्रेस ने भी इस आधार पर इसे स्वीकार किया कि सांप्रदायिकता समस्या के समाधान तथा स्वतंत्रता प्राप्ति का एकमात्र उपाय विभाजन है। माउंटबेटन योजना के आधार पर 4 जुलाई, 1947 को ब्रिटिश संसद में ”भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम” पेश किया गया, जिसे 18 जुलाई, 1947 को पारित कर दिया गया। इसके आधार पर 15 अगस्त, 1947 को भारत एवं पाकिस्तान को विभाजित कर स्वतंत्र घोषित कर दिया गया।