सांप्रदायिकता एवं देश का विभाजन (Sectarianism and Partition of Country) Part 3

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हिन्दू सांप्रदायिकता

कांग्रेस के नेता राष्ट्रवादी होने के साथ-साथ हिन्दू भी थे। बालगंगाधर तिलक, विपिनचन्द्र पाल तथा लाला लाजपतराय आदि के प्रेरणा स्रोत हिन्दू धर्म, हिन्दू सभ्यता एवं हिन्दू संस्कृति ही थे। उग्र राष्ट्रवादी संकीर्ण एवं संकुचित विचार के नहीं थे। तिलक जनता में राष्ट्रीय आंदोलन के प्रति जागृति उत्पन्न करने के लिए शिवाजी-उत्सव तथा गणपति-उत्सव मनाते थे। ब्रिटिश कूटनीतिज्ञों के प्रभाव में आकर मुसलमानों ने इसका गलत अर्थ लगाया।

1906 ई. में मुस्लिम लीग का जन्म हुआ। इसका एक मात्र उद्देश्य मुसलमानों का हित साधन करना था। मुस्लिम लीग की प्रतिक्रिया स्वरूप 1907 ई. में पंजाब में हिन्दू-महासभा की स्थापना की गई। इसने लॉर्ड मिन्टो के सांप्रदायिक निर्वाचन योजना का विरोध किया।

1916 ई. के लखनऊ अधिवेशन में मुस्लिम लीग तथा कांग्रेस के बीच समझौता हुआ। कांग्रेस ने मुस्लिम लीग की मांग के समक्ष घुटने टेक दिये। 1922 ई. में मालाबार क्षेत्र में मौलानाओं के दव्ारा भीषण मजहबी दंगे हुए जिसमें हिन्दुओं के साथ नृशंस व्यवहार किए गए।

हिन्दुओं ने भी अपने धर्म की रक्षा के लिए 1923 ई. में महामना मदनमोहन मालवीय के नेतृत्व में ’अखिल भारतीय हिन्दू-महासभा’ की स्थापना की। उस समय वह राष्ट्रीय संस्था भी। इन्होंने घोषणा की कि सभी हिन्दू कांग्रेस का साथ देंगे। 1924 ई. के हिन्दू महासभा के अधिवेशन में मौलाना मुहम्मद अली, मौलाना शौकत अली, डॉ. महमूद तथा मौलाना आजाद भी उपस्थित थे।

मदनमोहन मालवीय तथा पंजाब केसरी लाला लाजपत राय भी मुसलमानों को प्रसन्न करने की कांग्रेसी नीति को पसंद नहीं करते थे। सन्‌ 1924 ई. में कोहाट में भीषण दंगा हुआ। एक मुसलमान ने स्वामी श्रद्धानंद की हत्या कर दी। इससे हिन्दुओं में बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया हुई। दिल्ली अधिवेशन में हिन्दू-महासभा ने शासन में भाग लेने का निश्चय किया। सामाजिक तथा सांस्कृतिक क्षेत्रों के अतिरिक्त उसने राजनीतिक में भी भाग लेना शुरू किया।

1938 ई. में वीर सावरकर ने संस्था के बारे में बताया, ”हमारी राजनीति केवल हिन्दू-राजनीति होगी, जिसका स्वरूप केवल हिन्दुत्व पूर्ण होगा, जिससे कि हिन्दू-राष्ट्र की स्वतंत्रता के स्थायित्व तथा जीवनी- शक्ति में वृद्धि होगी”। उन्होंने मुसलमानों को यह आदेश दिया कि उनको अल्पसंख्यक संप्रदाय की स्थिति स्वीकार करनी चाहिए, न कि विशेष अधिकारी की मांग करनी चाहिए।’ भारत की राजनीति हिन्दू राजनीति होगी, जो मुसलमानों को स्वीकार करनी होगी।

सावरकर के बाद डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के हाथ में हिन्दू-महासभा की बागडोर आयी। उन्होंने सांप्रदायिक पंचाट तथा 1935 ई. के अधिनियम की कड़ी आलोचना की। जब मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान का नारा दिया, तब उन्होंने भी अखंड हिन्दुस्तान का नारा दिया। भारत एक अविभाज्य राज्य है। इसी आधार पर इस संस्था ने अगस्त योजना, क्रिप्स योजना कैबिनेट मिशन योजना तथा एटली योजना का विरोध किया।

मुस्लिम लीग का जिस तरह मुसलमानों ने साथ दिया, हिन्दुओं ने उसी रूप में हिन्दू-महासभा को सहयोग नहीं किया। 1947 ई. के 15 अगस्त के ’स्वतंत्रता दिवस’ के उत्सव में इसने भाग नहीं लिया। 1948 ई. में इस संस्था को गैर कानूनी घोषित कर दिया गया। डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु के बाद इस संस्था का बहुत हृास हुआ।

स्पष्ट है कि हिन्दू महासभा की सांप्रदायिक नीति एवं उनके नेताओं की मुस्लिम विरोधी नीति के कारण भी पाकिस्तान की मांग जोर पकड़ती गयी और अंतत: पाकिस्तान बना।