सांप्रदायिकता एवं देश का विभाजन (Sectarianism and Partition of Country) Part 4

Download PDF of This Page (Size: 185K)

पाकिस्तान की मांग के कारण

मुस्लिम लीग के पास अन्य कार्यक्रम का अभाव

मुस्लिम लीग का एकमात्र उद्देश्य भारतीय मुसलमानों के लिए संरक्षण एवं सुविधा प्राप्त करना था। 1937 ई. तक उसकी बहुत सी मांगे पूरी हो चुकी थी। बिना किसी कार्यक्रम के वह मुसलमानों पर अपना प्रभाव कायम नहीं रख सकती थी। अत: उसने पृथक राज्य की मांग करना शुरू कर दिया तथा ”इस्लाम खतरे में है” का नारा बुलंद किया।

हिन्दुओं का तथाकथित अत्याचार

सामन्य मुसलमानों के बीच उदव्ेग की लहर उत्पन्न करने के लिए मुस्लिम लीग ने हिन्दुओं के अत्याचार का प्रचार करना शुरू किया। 1935 ई. के अधिनियम के अंतर्गत 1937 ई. में जब विभिन्न प्रांतों में कांग्रेस का मंत्रिमंडल बना तब मुस्लिम लीग ने यह मिथ्या प्रचार शुरू कर दिया कि हिन्दू सरकार मुसलमानों पर अत्याचार कर रही है। इस झूठे प्रचार से मुस्लिम जनता पर काफी प्रभाव पड़ा।

अंग्रेजों की कूटनीति

भारतीय राजनीति में सांप्रदायिकता का जहर फैलने में अंग्रेजों की प्रमुख भूमिका थी। उन्होंने हिन्दू-मुसलमानों के बीच अविश्वास की खाई पैदा कर दी। कुछ अंग्रेज पदाधिकारियों ने पाकिस्तान की मांग के प्रति काफी उत्साह दिखाया। पाकिस्तान की मांग के प्रति भारत सचिव एमरी की भी पूरी सहानुभूति थी। उसने कहा भी था, ’भारतीय स्वतंत्रता के भावी कगार पर कई भवनों के लिए स्थान है।’

हिन्दु सांप्रदायिकता

सरकार की भेदपूर्ण नीति और मुस्लिम सांप्रदायिकता के विकास के फलस्वरूप हिन्दुओं की रक्षा हेतु कुछ हिन्दु नेताओं ने एक संगठन की आवश्यकता महसूस की। इसी के फलस्वरूप 1922 ई. में हिन्दु महासभा की स्थापना हुई। आरंभ में हिन्दू महासभा ने कांग्रेस के साथ सहयोग की नीति अपनाई। परन्तु बाद में उसने खुले रूप में हिन्दू राष्ट्र का प्रचार करना शुरू किया। इस संगठन के नेताओं का कहना था कि भारत हिन्दू और मुसलमान दो अलग-अलग संप्रदाय हैं। इससे मुस्लिम लीग के अवसरवादी नेताओं को पाकिस्तान की मांग करने में प्रोत्साहन मिला।

1937 ई. के निर्वाचन में मुस्लिम लीग को पूरी सफलता नहीं मिली

सिंध एवं असम में मुस्लिम लीग के मंत्रिमंडल का गठन नहीं हो सका। इन प्रदेशों में संयुक्त मंत्रिमंडल का गठन हुआ। इससे मुस्लिम जनता का विश्वास प्राप्त करने के लिए लीग ने यह प्रचार करना शुरू किया कि संयुक्त भारत में मुसलमानों की रक्षा असंभव हे। अत: जिन्ना कांग्रेस को हिन्दुओं की एक संस्था बताते हुए पृथकता दिखाने लगे।

जिन्ना की महत्वकांक्षा

जिन्ना तीक्ष्ण मस्तिष्क के योग्य व्यक्ति थे। कांग्रेस के अंदर जब वे अपना प्रभाव पूरी तरह स्थापित नहीं कर पाए तो कांग्रेस छोड़ दिया। जब मोहम्मद शफी गुट का प्रभाव बढ़ा तो 1929 में लीग को छोड़ लंदन चले गए। 1934 में दुबारा लीग का नेतृत्व संभाला और 1937 के चुनाव में करारी हार का सामना किया। अब उन्हें खुद को साबित करना था और इस जिद ने भी जिन्ना को पाकिस्तान की मांग की ओर प्रेरित किया।

सांप्रदायिक दंगे

भारत में सांप्रदायिक दंगों का इतिहास 1798 से मिलता है, जब अहमदाबाद में दंगे हुए। 1828 में वाराणसी में दंगे हुए परन्तु ये दंगे घटना मात्र थे। भारत में दंगों दव्ारा वास्तविक कड़वाहट का प्रारंभ 1906 के मैमनसिंह दंगे, 1921 के मोपला दंगे, तत्पश्चात्‌ 1922-27 में संपूर्ण मध्य भारत में लगभग 500 दंगे से हुआ। इन घटनाओं ने दोनों कौमों के मध्य अगर कड़वाहट बढ़ाया तो 1946 में प्रत्यक्ष कार्यवाही दिवस के पश्चात्‌ फैले दंगो ने पाकिस्तान की इमारत को ही खड़ा कर दिया। 16 अगस्त, 1946 से प्रारंभ हुआ दंगा दिसम्बर, 1947 तक भारत में लगभग दस लाख लोगों की मृत्यु का कारण बना और भारत लगभग गृहयुद्ध की कगार पर आ खड़ा हुआ।

मुस्लिम लीग की ओर से पाकिस्तान की मांग 1938 ई. में की गई। 1940 ई. में लीग के लाहौर अधिवेशन में उसकी यह मांग और भी बलवती हो गई। लाहौर अधिवेशन में मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के गठन के प्रस्ताव को पास किया। अपने अध्यक्षीय भाषण में जिन्ना ने घोषणा की, ’राष्ट्र की किसी भी परिभाषा के अनुसार मुसलमान एक राष्ट्र हैं।’ अत: उनकी अपनी निवास भूमि, अपना प्रदेश और अपना राज्य होना चाहिए।