समाज एवं धर्म सुधार आंदोलन (Society and Religion Reform Movement) Part 10

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जाति प्रथा के विरुद्ध आंदोलन

भारतीय समाज प्राचीन काल से ही जाति एवं उपजातियों में विभाजित था। समय के संदर्भ में ये संस्थाएँ कठोर रूप धारण करने लगी और कुरीतियों की बोलबाला इन संस्थाओं में हो गयी। ब्रिटिश काल में समाज सुधार आंदोलन के प्रचार का एक प्रमुख लक्ष्य जाति प्रथा की समाप्ति था। उस समय हिन्दू असंख्य जातियों में बँटे थे। राष्ट्रीय आंदोलन अपनी शुरूआत से ही उन सब संस्थाओं के खिलाफ था जिनकी प्रवृत्ति भारतीय जनता को विभाजित करने की थी। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस प्रारंभ से ही जातिगत विशेषाधिकारों की विरोधी थी। उसने जाति, लिंग या धर्म के भेदभाव के बिना व्यक्ति के विकास के लिए समान नागरिक अधिकारों तथा समान स्वतंत्रता के लिए संघर्ष किया। गांधीजी ने अस्पृश्यता उन्मूलन के लिए कठिन प्रयास किए। इस कार्य के लिए उन्होंने 1932 में अखिल भारतीय हरिजन संघ की स्थापना की। उन्होंने इसे कांग्रेस के रचनात्मक कार्यक्रम का अभिन्न हिस्सा बना दिया। सार्वजनिक सभाओं में समान भागीदारी ने लोगों के बीच जातीय चेतना को और कमजोर किया।

हालांकि इस क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण कारक संभवत: नई शिक्षा पद्धति थीं, जो पूरी तरह धर्म निरपेक्ष एवं जातियों के खिलाफ थी। इसके प्रसार से निम्न जातियां अपने बुनियादी अधिकारों के प्रति जागरुक हुई और उन्होंने अपने अधिकारों के लिए खड़ा होना प्रारंभ किया। उन्होंने धीरे-धीरे उच्चतर जातियों के परंपरागत उत्पीड़न के खिलाफ एक शक्तिशाली आंदोलन खड़ा किया। 19वीं सदी के अन्त तक महाराष्ट्र और मद्रास में सेवाओं एवं सामान्य सांस्कृतिक जीवन पर ब्राह्यणों के वर्चस्व ने ब्राह्यण विरोध आंदोलन को जन्म दिया। इस उद्देश्य से ज्योतिबा फूले ने सत्यशोधक समाज की स्थापना की। थोड़े समय बाद इसी तरह मद्रास में शिक्षा एवं सेवाओं पर ब्राह्यणों के वर्चस्व के विरुद्ध तमिल वेल्लालों, तेलुगू रेड्‌िडयों एवं कम्माओं तथा केरल में नायरों ने संघर्ष छेड़ा। इस दिशा में जस्टिस (न्याय) मूवमेंट (पल) से संबंद्ध सी.एम. मुदालियार, टी. एम. नायर एवं पी. त्यागराज चेट्‌टी ने 1915-16 में शिक्षा, सरकारी सेवाओं एवं राजनीति में ब्राह्यण वर्चस्व के विरुद्ध मध्यवर्ती जाति आंदोलन एवं सेल्फ (स्वयं) रेस्पैक्ट (सम्मान) मूवमेंट (पल) चलाया। केरल में श्री नारायण गुरु ने जाति प्रथा के विरुद्ध आजीवन संघर्ष किया। उन्होंने संपूर्ण मानवता के लिए ’एक धर्म, एक जाति और एक ईश्वर’ का नारा दिया। डॉ. भीमराव अंबेडकर, जो स्वयं एक अछूत जाति के थे, ने अपना सारा जीवन जातिगत जुल्मों के खिलाफ लड़ने में लगा दिया। इसी उद्देश्य से उन्होंने अखिल भारतीय दलित वर्ग संघ की स्थापना की। पानी, मंदिर प्रवेश एवं काउंसिलों (परिषदों) में दलितों के लिए पृथक स्थान की मांग को लेकर अंबेडकर ने ’महार सत्याग्रह’ का नेतृत्व किया। अनुसूचित जातियों के अन्य नेताओं ने इसी समय ’अखिल भारतीय दलित वर्ग परिषद’ की स्थापना की। सारे भारत में मंदिर प्रवेश पर रोक तथा इसी तरह के अन्य प्रतिबंधों के विरोध में दलित जातियों ने अनेक सत्याग्रह आंदोलन, जैसे केरल में वायकोम तथा गुरुवायुर में मंदिर प्रवेश आंदोलन चलाया। महात्मा गांधी जी के हस्तक्षेप के पश्चात्‌ अछूतों को इन मंदिरों में प्रवेश का अधिकार मिल पाया। यह निम्न जाति आंदोलन के लिए एक मील का पत्थर था। ठीक इसी प्रकार के आंदोलन महार सत्याग्रह और एजाबा मंदिर प्रवेश आंदोलन में चलाये गए।

परन्तु विदेशी शासन के दौरान अस्पृश्यता के विरुद्ध संघर्ष पूरी तरह सफल नहीं हो सका। ब्रिटिश सरकार को डर था समाज के रूढ़िवादी लोगों का विरोध कहीं भड़क न उठे। इसके अलावा ब्रिटिश सरकार की ’बांटो और राज करो की नीति’ ने सवर्णों एवं निम्न जातियों के बीच विच्छेद को और बढ़ाया। इसने जाति के आधार पर जनगणना कराइ एवं सामाजिक महत्ता के लिए भी जाति को आधार बनाया।