समाज एवं धर्म सुधार आंदोलन (Society and Religion Reform Movement) Part 11

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मुसलमानों में समाज सुधार आंदोलन

मुसलमानों में समाज दो भागों में विभक्त था-उच्च अभिजात्य वर्ग तथा जन साधारण के अधिकांश मुसलमान मूलरूप में हिन्दू थे और धर्म परिवर्तन के बाद भी उनके सामाजिक जीवन में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं हुआ था। उच्च अभिजात्य वर्ग के लिए 18वीं-19वीं सदी में राजनीतिक प्रभुत्व की समाप्ति अवश्य संकटमय घटना थी। यह वर्ग राजकीय नियुक्तियों अथवा सामंतीय जागीरों का इतना अभ्यस्त था कि उसने व्यवसाय अथवा व्यापार की ओर ध्यान ही नहीं दिया। सुलभ आय से अकर्मण्यता इस वर्ग में सहज ही प्रवेश कर चुकी थी। 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में यह अपनी प्रतिष्ठित स्थिति को ब्राह्य रूप बनाए रखने से अधिक खोखला होता गया। 1857-58 ई. की विपत्ति से रही सही प्रतिष्ठा भी समाप्त हो गई क्योंकि अंग्रेज प्रशासकों ने इस विप्लव के लिए उच्चवर्गीय मुसलमानों को विशेष रूप से उत्तरदायी माना।

उच्च वर्ग के मुसलमानों की प्रमुख सामाजिक समस्या उनकी ’लकीर के फकीर’ बने रहना तथा परिवर्तित परिस्थितियों को न पहचानना था। परिणामस्वरूप यह वर्ग पिछड़ता चला गया और 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में भारत में दोनों प्रमुख सम्प्रदायों में आर्थिक भेद अधिक बढ़ता गया। लेकिन इस बढ़ती हुई आर्थिक विषमता का मूल कारण यह था कि मुस्लिम उच्च वर्गो ने समय की आवश्यकता के अनुसार कार्य न करने की नीति अपनाई थी। मुसलमानों में समाज सुधार आंदोलन का प्रमुख लक्ष्य इस उच्च वर्ग को समय की आवश्यकता बताना तथा उसके अनुसार पश्चिमी शिक्षा की ओर ध्यान दिलाना था। इस प्रकार मुसलमानों का समाज सुधार आंदोलन भिन्न था। एक अन्य भिन्नता यह थी कि मुसलमानों में सामाजिक और धार्मिक जीवन को पूर्ण रूप से उनकी धर्म पुस्तक ’कुरान’ पर आधारित माना जाता था इसलिए सामाजिक जीवन की किसी भी पद्धति को बदलने के लिए यह आवश्यक था कि कुरान का नया अर्थ बताया जाए।