समाज एवं धर्म सुधार आंदोलन (Society and Religion Reform Movement) Part 12

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अलीगढ़ आंदोलन

1870 ई. के पश्चात्‌ मुसलमानों की सामाजिक स्थिति को सुधारने के लिए सर सैय्यद अहमद खां ने एक आंदोलन आरंभ किया। सर सैय्यद का उद्देश्य मुसलमानों को ’आत्म निर्भरता’ और ’अपनी मदद आप’ का पाठ पढ़ाना था। वह जानते थे कि मुसलमान अपने अतीत में खोए हुए थे, उन्हें वर्तमान की बहुत कम चिंता थी। उन्होंने ’तहजीब-उल-अखलाक’ नाम की पत्रिका दिसंबर, 1870ई. में प्रकाशित करना आरंभ किया। सर सैय्यद मुसलमानों को बदली परिस्थिति से अवगत कराना चाहते थे। सामाजिक मूल्यों तथा रहन-सहन के तरीको को वे समय के अनुकूल नहीं मानते थे, मुसलमान सामान्यत: अपने सामाजिक जीवन को कुरान तथा हदीस पर आधारित समझते थे, इसलिए उन्हें विवश होकर धर्म संबंधी विवाद आरंभ करना पड़ा।

सर सैय्यद ने कुरान का अर्थ समझाने के लिए एक नए ’इल्म कलाम’ (व्याख्या करने के नए आधार) की आवश्यकता पर बल दिया। इस नई व्याख्या का मुख्य आधार यह था कि समस्त सृष्टि का निर्माता ईश्वर है और वही कुरान का रचीयता है। इसलिए कुरान किसी भी रूप से वास्तविक स्थिति में भिन्न नहीं हो सकती।

कुरान के साथ मुसलमानों के परंपरागत सामाजिक मूल्यों की भी नई व्याख्या की गई। सर सैय्यद ने ’तहजीब उल अखलाक’ का उद्देश्य ही मुसलमानों को सभ्य बनाना घोषित किया। वे सभ्य नहीं बन सकते थे, जब तक वे कुछ पुरानी परंपराओं को छोड़कर नई परंपराएं न अपना लें। उनका कहना था कि प्रत्येक परंपरा समय की परिस्थितियों के अनुसार अपनाई जाती है। समय बदलने के पश्चात्‌ वे परंपराएं अनुपयोगी हो जाती हैं। मुसलमानों के पिछड़े रहने का कारण उनका पुराने बंधनों में बंधे रहना और समय की आवश्यकता को न पहचानना था। दूसरा दोष मुसलमानों में ’पूर्वाग्रह’ का व्यापक रूप से फैलाव था जिसके कारण वे अच्छाइयों को ग्रहण नहीं कर सकते थे और अपनी अच्छाइयों से दूसरे को अवगत भी नहीं करा सकते थे। मुल्लाओं और फकीरों के लिए सर सैय्यद ने बहुत कठोर शब्द कहे। उन्होंने हज करना, जकात बांटना, मस्जिद बनवाना आदि को निम्न स्तर की तथा अल्पकालीन अच्छाइयों जैसा बताया। दीर्घकालीन अच्छाई शिक्षा प्रसार में सहायता करना बताया गया। सर सैय्यद ने पश्चिमी खान पान की पद्धति को अपनाने की जोरदार वकालत की। साथ ही उन्होंने इस्लाम पर लगाए कई आक्षेपों को, जैसे-तलाक को प्रोत्साहन देना, दास प्रथा को स्वीकृति प्रदान करना-निराधार बताया।

सिक्ख सुधार आंदोलन

19वीं शताब्दी में भारत में चल रहे विभिन्न धर्म एवं समाज सुधार आंदोलन से सिक्ख समुदाय भी अछूता नही रह सका तथा इसमें भी विभिन्न समाज एवं धर्म सुधार आंदोलन आंरभ हुए 1873 में अमृतसर में सिंह सभा आंदोलन आरंभ हुआ। इसके दो प्रमुख उद्देश्य थे-सिक्खों के लिए आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा की उपलब्धता सुनिश्चित करना तथा सिक्ख धर्म के हितों को नुकसान पहुंचाने वाली रूढ़ियों के खिलाफ संघर्ष करना। आधुनिक पाश्चात्य शिक्षा के प्रसार के लिए सिंह सभा ने पूरे पंजाब में खालसा महाविद्यालय की स्थापना की। लेकिन सिंह सभा के प्रयासों में गतिशीलता तब आई जब अकाली आंदोलन आरंभ हुआ।

अकाली, गुरुदव्ारों को इन भ्रष्ट उदासी महंतों से मुक्त करना चाहते थे जो सरकारी संरक्षण की आड़ में विभिन्न प्रकार के भ्रष्ट कार्यों में लिप्त थे। अकालियों को प्रमुख सफलता तब मिली जब 1922 में सिक्ख गुरुदव्ारा एक्ट (अधिनियम) पास हुआ। इस एक्ट दव्ारा गुरुदव्ारो का प्रबंध सिक्खों की शीर्ष संस्था शिरोमणि गुरुदव्ारा प्रबंधक समिति को सौंप दिया गया।