समाज एवं धर्म सुधार आंदोलन (Society and Religion Reform Movement) Part 13 for Competitive Exams

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कंपनी (संघ) काल में सामाजिक परिवर्तन

राजनीतिक उथल-पुथल और आर्थिक शोषण के बावजूद कंपनी शासन में कुछ ऐसे कार्य हुए जो भारत के सामाजिक इतिहास में क्रांतिकारी माने जाते हैं। अपने शासन के प्रारंभिक काल में कंपनी सरकार ने सामाजिक और धार्मिक मामले में उदारतापूर्ण तटस्थता की नीति अपनाई। 1813 (वस्तुत: 1833 तक) तक कंपनी ने भारतीय समाज की प्रथाओं और रीति-रिवाजों में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया। तटस्थता की नीति इतनी सशक्त थी कि अनेक दबावों के बावजूद कंपनी ने भारतीयों की मनोवृत्ति को ध्यान में रखकर भारत से ईसाई धर्म का प्रचार तक नहीं किया। उसने भारतीयों के सभी धार्मिक एवं सामाजिक अनुष्ठानों, रीति-रिवाजों एवं प्रथाओं के प्रति न केवल सहिष्णुता तथा उदारता का भाव दिखलाया अपितु उनका सम्मान तक किया।

भारतीय समाज के प्रति कंपनी दव्ारा अपनाई गई तटस्थ नीति के दो कारण थे: प्रारंभ में कंपनी का ध्यान मुख्य रूप से व्यापार एवं राजस्व की ओर था। वह व्यापार में वृद्धि लाकर अधिकाधिक धनार्जन करना चाहती थी और इस ध्येय से वह राजस्व प्रशासन में अधिक समय लगाती थी। अत: उसने भारतीय समाज में सुधार लाने की ओर कभी भी नहीं सोचा। दूसरा, भारतीय समाज और संस्कृति का सुदृढ़ आधार धर्म था। अंग्रेज यह सोचते थे कि अगर भारतीयों की संस्कृति और धर्म में उनका हस्तक्षेप होगा तो भारतीय संभवत: उनका विरोध करने लगेंगे और नव-स्थापित कंपनी शासन की नींव भारत में हिल जाएगी।

18वीं शताब्दी के अंतिम चरण में अंग्रेज भारतीय समाज में हस्तक्षेप करने और सुधार लाने की बात सोचने लगे। इस काल के अंग्रेज नेताओं ने भारतीय समाज का सर्वेक्षण किया और उन्होंने अनुभव किया कि भारत की प्रगति के लिए भारतीय समाज में परिवर्तन लाना आवश्यक है।

कंपनी की परिवर्तित नीति, भारत के संबंध में अपनाई गई सामाजिक नीति और पश्चिमी शिक्षा के प्रारंभ के कारण भारत के लोग यूरोपीय संस्कृति से परिचित होने लगे। यद्यपि अभी भी भारतीय सरकार की हस्तक्षेप नीति का विरोध करते रहे, किन्तु बंगाल में पुनर्जागरण का आगमन हो गया था और इससे समस्त भारत प्रभावित होने वाला था।

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