समाज एवं धर्म सुधार आंदोलन (Society and Religion Reform Movement) Part 2

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ईसाई मिशनरियों का आगमन

दक्षिणी भारत में ईसाई मिशनरियां बहुत पहले से धर्म प्रचार में लगी हुई थीं, लेकिन 18वीं -19वीं सदी की ईसाई मिशनरियों से वे इस अर्थ में भिन्न थीं कि उन्हें राजनीतिक सत्ता का समर्थन नहीं मिल सका। 1793 ई के चार्टर (राज-पत्र) एक्ट (अधिनियम) के अनुसार इंग्लैंड की ईसाई मिशनरियों को भारत आने की अनुमति नहीं थी। लेकिन उन्होंने चोरी-छिपे आना आरंभ कर दिया। वैधानिक प्रस्तावों को ध्यान में रखते हुए उन्होंने अपना मुख्य कार्यालय सेरामपुर (श्रीरामपुर) बंगाल गांव को बनाया जो डच अधिकार में था। 1813 ई. के एक्ट (अधिनियम) से उनका आगमन नियमित कर दिया गया और 1833 ई. के पश्चात्‌ उन्हें भारत आकर बसने की खुली छूट दे दी गई।

ईसाई मिशनरियों का प्रमुख लक्ष्य भारत में ईसाई धर्म का प्रचार तथा यहां के निवासियों को ईसाई बनाना था। प्रचार कार्य केवल छापेखाने, पुस्तक तथा पुस्तिकाओं के प्रकाशन तथा स्कूलों (विद्यालय) की स्थापना से ही संभव था। धर्म परिवर्तन के लिए ईसाइयों ने प्रचार एवं बल तथा प्रलोभन का प्रयोग किया। मिशनरी खुले बाजारों में हिन्दु धर्म, तथा सामाजिक और धार्मिक रीति-रिवाजों की आलोचना करके ईसाई धर्म की सर्वोच्चता बताया करते थे। उन्होंने हिन्दुओं की धार्मिक तथा सामाजिक रीतियों एवं परंपराओं के दोषों का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया।

भारत में लोगों को ईसाई बनाने के लिए मिशनरियों ने शिक्षा संस्थाओं तथा समाचार पत्रों की स्थापना की। इन मिशनरियों के प्रचार का ही परिणाम था कि 1813 ई. के चार्टर (राजपत्र) एक्ट में शिक्षा तथा साहित्य के विकास के लिए एक लाख रुपए वार्षिक खर्च की व्यवस्था की गई। आरंभ में कंपनी (संघ) के संचालक इस धनराशि के खर्च के संबंध में कोई योजना नहीं बना सके। केवल ईसाई मिशनरियां ही शिक्षा प्रचार के लिए अत्यधिक प्रयत्नशील रहीं। उन्होंने 1818 ई. में दिग्दर्शन (मासिक) और समाचार दर्पण (साप्ताहिक) पत्रिकाओं का प्रकाशन भी आरंभ किया। विभिन्न शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की गई। इन शिक्षा संस्थाओं में प्रगतिशील भारतीय नेताओं का भी योगदान रहा। मिशनरियों के कार्य से शिक्षा का प्रचार व्यापक रूप से हुआ।

ईसाइयों ने सबसे पहले बाइबिल का विभिन्न भाषाओं में अनुवाद कराया। इसके पश्चात्‌ उन्होंने स्कूलों (विद्यालय) के पाठ्‌य पुस्तकों को तैयार करवाने पर बल दिया। इस दिशा में बहुत सी अंग्रेजी पुस्तकों का स्थानीय तथा क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया गया। अनुवाद की आवश्यकता को पूरा करने के लिए उन भाषाओं के साहित्य तथा व्याकरण का अध्ययन किया गया। पुस्तकों तथा समाचार-पत्रों के प्रकाशन से क्षेत्रीय भाषाओं के साहित्य का विकास हुआ। मिशनरियों के कार्य की देखा-देखी बंगाल में भारतीयों ने भी पत्र-पत्रिकाओं और शिक्षा संस्थाओं की स्थापना की ओर ध्यान दिया।

मिशनरियों के प्रचार तथा प्रकाश में हिन्दुओं की पर्याप्त आलोचना तथा उन पर अतिशयोक्तिपूर्ण दोषारोपण होता था। हिन्दुओं ने अंग्रेजी शिक्षा की ओर आकर्षित होना भी आरंभ कर दिया। भारतीय नेताओं ने 1823 ई. में सरकार से अनुरोध किया कि सरकारी राशि केवल अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार पर ही खर्च की जाए। कुछ ब्राह्यणों ने सर एडवर्ड हाइड ईस्ट (पूर्वी) (सुप्रीम (उच्च) कोर्ट (न्यायालय) के मुख्य न्यायाधीश) के नेतृत्व में 1817 ई. में हिन्दु महाविद्यालय की स्थापना की। इस काल में 1826 ई. में डेरोजियो को सहायक अध्यापक नियुक्त किया गया। उसने आरंभ में बंगाल के नवयुवकों को बहुत प्रभावित किया। अंग्रेजी पढ़े-लिखे बंगाली नवयुवकों में प्रचलित धर्म तथा समाज के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण विकसित हुआ। लेकिन इन नवयुवकों का आलोचनात्मक दृष्टिकोण केवल हिन्दु धर्म तक ही सीमित नहीं रहा। जब उन्होंने प्रचलित ईसाई धर्म को तर्क की कसौटी पर तौलना आरंभ किया तब ईसाई भी इस नई प्रवृत्ति से चिंतित हो उठे और उन्होंने ईसाई धर्म की शिक्षा पर अधिक बल देना आंरभ किया। हिन्दु महाविद्यालय में पढ़े हुए व्यक्तियों ने शिक्षा के प्रचार के लिए अधिक प्रयत्न किए।