समाज एवं धर्म सुधार आंदोलन (Society and Religion Reform Movement) Part 3

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राजा राममोहन राय एवं समाज सुधार

समाज सुधार के क्षेत्र में राजा राममोहन राय का सबसे बड़ा योगदान सती प्रथा के विरोध में था। सती प्रथा मौलिक रूप से अत्यंत प्राचीन थी, किन्तु इसके साथ स्वेच्छा आवश्यक थी। बंगाल में 18वीं सदी के अंत में इस प्रथा के कुछ उदाहरण तो मिलते हैं, किन्तु 19वीं सदी के आरंभ में यह प्रथा अधिक प्रचलित हो गई। 1812 ई. में अंग्रेजी सरकार के आदेशानुसार नशीली वस्तुओं के प्रभाव में विधवाओं को सती होने से मना कर दिया गया।। 1815 ई. तथा 1817 ई. में सती प्रथा से संबंधित कुछ आदेश पारित किए गए जिनके अनुसार कुछ श्रेणियों की विधवाओं को सती होने की मनाही कर दी गई इसका परोक्ष प्रभाव यह हुआ कि अब सभी विधवाओं को सती होने की सरकारी मान्यता मिल गई। 1815-17 ई. के मध्य अकेले बंगाल में 864 स्त्रियों सती हुई और बंगाल में भी कलकत्ता जिले में सती की सबसे अधिक घटनाएं हुई।

बंगाल में सती प्रथा को समाप्त करने के पक्ष में कुछ लोग 19वीं सदी के आरंभ से ही प्रयत्नशील थे। 1805 ई. में कलकता की सदर निजामत अदालत के हिन्दु पंडितों के परामर्श से सरकार ने 1812 ई. के आदेश प्रसारित किए। 1818 ई. में कलकता के कुछ हिन्दुओं ने सरकार के 1815-1817 ई. के आदेशों के विरुद्ध एक ज्ञापन दिया। दूसरी ओर अगस्त, 1818 ई. में कलकता के प्रतिष्ठित हिन्दुओं ने एक विरोध पत्र में सती प्रथा को अमानवीय कहा तथा उन्होंने सरकार से यह आशा की कि वह भविष्य में इसे कम करने के लिए प्रयास करे। राजा राममोहन राय ने 1811 ई. में अपने बड़े भाई की मृत्यु पर अपनी भाभी को सती होते देखा था और तभी से वे इसका विरोध कर रहे थे। राजा राममोहन राय ने 1818 ई. में दो व्यक्तियों-सती प्रथा के समर्थक तथा विरोधी- के मध्य एक वार्तालाप प्रकाशित किया जिसमें स्त्री जाति के पक्ष में तर्क देते हुए मानवता पर आधारित यह अपील की गई कि उन्हें जीवित न जलाया जाए। विभिन्न धर्म-शास्त्रों तथा टीकाकारों का उद्धरण देकर उन्होंने यह बताने का प्रयत्न किया कि सती का विरोध धर्मशास्त्रों में भी है। राजा राममोहन राय सती का विरोध शास्त्रीय आधार पर करते थे।

लार्ड विलियम बेंटिक उपयोगितावादी विचार से प्रभावित था और राज्य दव्ारा नियम बनाकर समाज में परिवर्तन लाना चाहता था। भारत आने के पूर्व ही उसने सती प्रथा को समाप्त करने का निर्णय कर लिया था। उसे यह आशंका थी कि इस प्रथा को बंद कर देने से सेना में विद्रोह हो जाएगा। इसलिए उसने सैनिक अथवा असैनिक अधिकारियों से पूछा, 49 सेना अधिकारियों में 24 प्रथा 15 असैनिक अधिकारियों में 8 इस प्रथा के अंत किए जाने के पक्ष में थे, शेष में अधिकांश इस प्रथा को धीरे-धीरे समाप्त करने के पक्ष में थे। इसलिए बेंटिक ने इस प्रथा को समाप्त करने का निर्णय लिया। राममोहन ने बेंटिक के निर्णय का विरोध किया। वह चाहते थे कि इस प्रथा को धीरे-धीरे जनमत के दव्ारा समाप्त होने दिया जाए। मिस कोलेट भी राजा राममोहन राय के दृष्टिकोण से उचित ठहराती हैं, क्योंकि राममोहन वैधानिक दृष्टि से दबाव डालकर कार्य करने के विरुद्ध थे।

सती प्रथा समाप्त करने के संबंध में राजा राममोहन राय के कार्य को ठीक मूल्यांकन सामन्यत: नहीं किया जाता। सती का विरोध राममोहन के पूर्व ही आरंभ हो चुका था और सती निषेध आज्ञा में राममोहन का कोई योगदान नहीं था। इतना अवश्य है कि बाद में निषेध आज्ञा का समर्थन राममोहन ने किया तथा इस बात का बाद में प्रचार करने कि सती प्रथा उन्मूलन कानून समाज दव्ारा भी लागू किया जाना चाहिए, में उनकी मुख्य भूमिका थी। समाज दव्ारा इस प्रथा का विरोध हो इसके लिए राजा राममोहन राय ने जगह-जगह सभाएं की तथा लोगों को प्रेरित किया। वास्तव में सती प्रथा के विरुद्ध जनमत तैयार करने में उन्होंने सर्वाधिक योगदान दिया, जो उस काल में सबसे बड़ा कार्य था।