समाज एवं धर्म सुधार आंदोलन (Society and Religion Reform Movement) Part 5

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स्वामी दयानदं सरस्वती और आर्य समाज आंदोलन

स्वामी दयानदं सरस्वती दव्ारा चलाया गया आर्य समाज आंदोलन कई प्रकार से ब्रह्य समाज से भिन्न था। संस्कृत के प्रकांड विदव्ान और संयासी होने से वह राममोहन से कुछ बातों से अलग थे। उनका वेदों की उच्चता, पुनर्जन्म और कर्म सिद्धांत में अटूट विश्वास था। पूजा विधि की भी उन्होंने पुरानी पद्धति को अपनाया। वह अंग्रेजी भाषा से अपरिचित थे। उनका प्रचार कार्य केवल अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों तक ही सीमित न होकर सामान्य जनता तक फैला हुआ था।

दयानंद प्रचलित हिन्दु धर्म की बुराइयों की कटु आलोचना से नहीं चुकते थे। विभिन्न स्थानों पर धार्मिक शास्त्रार्थ में प्रचलित हिन्दु धर्म के समर्थकों को उन्होंने बहुत बुरा-भला कहा। इस समय ईसाई मिशनरियों की गतिविधियां अधिक व्यापक हो गई थीं। वे अपने धार्मिक प्रचार के साथ-साथ हिन्दू धर्म के पास ’पवित्र पुस्तक’ का अभाव बताकर उन्हें ईसाई धर्म में परिवर्तित करना चाहते थे। इसलिए स्वामी दयानदं सरस्वती ने वेदों को अमोघ तथा ईश्वरीय कहा। वेदों के सर्वगुण संपन्न होने से उन्हें आंतरिक उत्साह तथा प्रेरणा मिलती थी और वेदों के बताए हुए मार्ग को ही वह सत्य मानते थे। इसलिए हिन्दू धर्म पर आक्षेप करने वालों को उन्हीं के स्तर पर उत्तर देते थे। दयानंद यह समझते थे कि हिन्दू धर्म की प्रतिरक्षा के लिए उसके आलोचकों की आलोचना आवश्यक थी। वह चाहते थे कि हिन्दुओं को भी प्रचार तथा धर्म परिवर्तन कार्य में योगदान देना चाहिए। उनका विश्वास था कि वेदों में निहित सत्य केवल हिन्दुओं के लिए ही नहीं बल्कि विश्व भर के समाज के लिए है।

अप्रैल, 1875 ई. में बंबई में आर्य समाज की पहली शाखा स्थापित की गई। जून, 1877 ई. में लाहौर में आर्य समाज की एक अन्य शाखा खोली गई। कालांतर में इस आंदोलन का प्रमुख कार्यालय लाहौर ही बन गया। इस समय स्वामीजी ने आर्य समाज के 10 सिद्धांतों का प्रतिपादन किया कुछ सिद्धांत निम्नलिखित हैं-

  • समस्त ज्ञान का निमित्त कारण और उसके माध्यम से समस्त बोध ईश्वर है।

  • ईश्वर सर्वशक्तिमान, अदव्तीय, सर्वज्ञ, अमर तथा सर्वव्यापी है।

  • सच्चा ज्ञान वेदों में निहित है। आर्यो का परम धर्म वेदों का पठन-पाठन है।

  • प्रत्येक व्यक्ति को सदा सत्य ग्रहण करने और असत्य को छोड़ने के लिए तैयार रहना चाहिए।

  • कार्य धर्मानुसार, अर्थात सत्य और असत्य को विचार करके करने चाहिए।

  • संसार का उपकार करना इस समाज का मुख्य उद्देश्य है।

  • प्रत्येक को अपनी ही उन्नति में संतुष्ट नहीं रहना चाहिए, सबकी उन्नति में अपनी उन्नति समझनी चाहिए।

इन सिद्धांतों में आठ सामान्य नियम थे। केवल दो सिद्धांतों में निराकार ब्रह्य (ईश्वर) की उपासना और वेदों के समस्त ज्ञान का स्त्रोत होने पर बल दिया गया है। इसलिए आर्य समाज की प्रमुख विशेषता वेदों के अमोघ होने में थी। दयानंद दव्ारा चलाए गए आंदोलन ने साम्राज्यवादियों दव्ारा पश्चिमी ज्ञान तथा ईसाई धर्म प्रचारकों दव्ारा अपने धर्म की उच्चता के प्रचार से प्रस्तुत चुनौती का उचित प्रत्युतर प्रस्तुत किया। आर्य समाज दव्ारा वेदों के आधार पर हिन्दू धर्म को पुन: स्थापित करने के प्रयत्न को पुनरुत्थानवादी आंदोलन कहा जाता है। 19वीं सदी तक शताब्दियों से चले आ रहे अनावश्यक परंपराओं तथा तत्वों को धर्म से अलग करने और धर्म को उसके असली रूप में प्रस्तुत करने के लिए इससे अच्छा अन्य कोई प्रयत्न नहीं हो सकता था। आर्य समाज आंदोलन किसी बाह्य तथ्यों की अपेक्षा मूल रूप से प्राचीन भारत से प्रेरित था। यूरोप में प्रोटेस्टेंट (कट्‌टर) धर्म सुधार आंदोलन भी बाइबिल के पुन: अध्ययन के आधार पर अत्यधिक प्रभावशाली बना था। वेदों के अध्ययन पर बल देकर दयानंद ने कई दूरगामी परिवर्तनों का सूत्रपात किया। पहले वेदों का अध्ययन केवल ब्राह्यणों का ही एकाधिकार था। दयानंद ने सब वर्ण के लोगों को वेदों के अध्ययन तथा व्याख्या का अधिकार दिया।

आर्य समाज वास्तव में स्वामी दयानंद के बहुमुखी व्यक्तित्व का प्रतिबिंब है। 1883 ई. में स्वामीजी की मृत्यु से आंदोलन के विकास को कुछ धक्का लगा। यद्यपि असंख्य आर्य समाजियों ने मिलकर कार्य करने का दृढ़ संकल्प किया, फिर भी कुछ विषयों पर मतभेद के कारण आर्य समाज के अनुयायियों के 1892 ई. में दो दल बन गए। यह मतभेद इस मौलिक समस्या को लेकर आंरभ हुआ कि क्या एक आर्य समाजी के लिए केवल 10 सिद्धांतों का ही मानना आवश्यक है अथवा दयानंद के विभिन्न आदेशों एवं वेदों की व्याख्या को मानना भी आवश्यक है। यह विवाद दयानंद दव्ारा दिए गए व्याख्या के अधिकार से संबंधित था। क्या एक आर्य समाजी अपनी व्यक्तिगत जीवन पद्धति में स्वतंत्र है अथवा बहुमत के अधीन है। मांसाहारी अथवा शाकाहारी भोजन और डी.ए. वी. महाविद्यालय में शिक्षा पद्धति के प्रश्न आर्य समाज को विभक्त करने में निर्णायक रहें।

  • यह समस्य 10 सिद्धांतों के अतिरिक्त व्यक्तिगत व्याख्या और विश्वासों की स्वतंत्रता की थी कालान्तर में शिक्षा के क्षेत्र में दो दल बन गए। वह जो प्राचीन गुरुकुल आश्रम के आधार पर शिक्षा प्रसार चाहते थे।।

  • वह जो आधुनिक अंग्रेजी शिक्षा के समर्थक थे। आर्य समाज के ये दोनों दल अपने-अपने मार्ग पर चलते हुए भी कालांतर में मिलकर कार्य करते रहे।