समाज एवं धर्म सुधार आंदोलन (Society and Religion Reform Movement) Part 7

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स्वामी विवेकानंद एवं रामकृष्ण मिशन (लक्ष्य)

गदाधर चट्‌टोपाध्याय जिन्हें कालान्तर में तोतापुरी नामक वेदांती संन्यासी दव्ारा श्री रामकृष्ण परमहंस की संज्ञा दी गई, कलकता के दक्षिणेश्वर काली मंदिर में पुजारी थे। उन्होंने भैरवी ब्राह्यणी नामक स्त्री से तंत्र की भी शिक्षा प्राप्त की थी। बाद में अन्य धर्मों के तत्व को समझने के लिये क्रिश्चियन एवं इस्लाम दोनों मार्ग पर चलकर देखा। भक्तिवाद को समझने के लिए राधा का रूप धारण कर कृष्ण की अराधना की। इस प्रकार उनका चिंतन सभी धर्मो में समानता के भाव पर आधारित था। विजय कृष्ण गोस्वामी एवं केशवचंद्र सेन जैसे धार्मिक विचारक उनके प्रभाव में आये पर उनकी आध्यात्मिक भावना और चिंतन का वास्तविक प्रकाशन स्वामी विवेकानंद की प्रखर विचारधारा में प्रकट हुई। विवेकानंद ने अपनी समस्त विचारशक्ति को अपने गुरु की विचारधारा से उत्पन्न माना।

स्वामी विवेकानंद ने अपनी विचारधारा को ’प्रबुद्ध भारत एवं उद्बोधन नामक पत्रों के माध्यम से सामने लाया एवं राजयोग तथा कर्मयोग जैसी पुस्तकों के लेखन दव्ारा भागवत्‌ गीता के सिद्धांत एवं दर्शन की नवीन व्याख्या प्रस्तुत की। स्वामीजी भारत की आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक एकता को उद्घाटित करते हुए भारत गढ़ो का संदेश दिया। शिकागों की विश्व धर्म सभा (1897) में स्वामीजी के संभाषण दव्ारा वैदिक धर्म की महत्ता का प्रकाशन हुआ एवं भारतीय धर्म को आत्म गौरव की प्राप्ति हुई।

स्वामीजी भारतीय सामाजिक दुरावस्था का कारण भारतीय जन मानस में आयी अकर्मण्यता को माना एवं ’उतिष्ठ के लिये’ प्रयत्न करने के लिये कहा। स्वामी विवेकानंद प्रथम ऐसे समाज सुधारक थे, जिन्होंने निर्धनता के प्रश्न को सामाजिक कुरीतियों से जोड़कर देखा। उन्होंने कहा जब तक एक भी मानव धरती पर भूखा है समस्त मानवता को धोखे की बात माना जाना चाहिए। स्वामीजी ने रोटी के आधार पर धर्म परिवर्तन की प्रखर आलोचना की तथा राष्ट्रीय एकता का आधार सांप्रदायिक सौहार्द्र को माना। उन्होंने ’मुस्लिम बॉडी एवं हिन्दू माइन्ड’ का नारा दिया। जिसका तात्पर्य है- हिन्दू मानस की भांति उदारता एवं मुस्लिम साामजिक संगठन की भांति एकता।

स्वामीजी ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना की एवं उसे दो महत्वपूर्ण कार्यों में लगाया। प्रथमत: आध्यात्मिक संवदेना का विकास एवं दव्तीयत: राष्ट्रवादी शिक्षा। स्वामीजी ने विदेशों में वेदांत सोसायटी (समाज) की स्थापना वेदांत दर्शन के प्रचारार्थ की तथा वहां से प्राप्त धन को भारत में भेजा।

वस्तुत: विवेकानंद का आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ही कालान्तर में प्रखर राष्ट्रवाद का आधार बना। अतैव उन्हें सुभाषचंद्र बोस ने भारतीय राष्ट्रवाद के आध्यात्मिक पिता की संज्ञा दी।