समाज एवं धर्म सुधार आंदोलन (Society and Religion Reform Movement) Part 8

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थियोसोफिकल (आध्यात्मविद्या) सोसायटी (समाज) और श्रीमती एनी बेसेंट

थियोसोफिकल सोसायटी की स्थापना सबसे पहले 1875 ई. में अमेरिका के न्यूयॉर्क नगर में हुई थी। भारत में इसकी स्थापना का श्रेय रूसी महिला ब्लावत्स्की तथा अमेरिकी सेना के कर्नल हेनरी स्टील ऑलकॉट को है।

भारत में इन लोगों ने 1886 ई. में इस संस्था की स्थापना की। श्रीमती एनी बेसेंट एक आयरिश महिला थीं। थियोसोफिकल सोसायटी की एक सदस्या के रूप में वे 1893 ई. में भारत आई और यहीं बस गई। उन्होंने हिन्दू धर्म अपनाकर प्राचीन भारतीय आदर्शों और परंपराओं को फिर जीवित करने का प्रयास किया। उन्होंने वेदों और उपनिषदों में अपने विश्वास की उद्घोषणा की। उन्होंने कहा कि हिन्दू संस्कृति पश्चिमी सभ्यता की तुलना में काफी उत्कृष्ट है अर्थात्‌ उन्होंने हिन्दू धर्म की प्राचीन रूढ़ियों, विश्वासों और कर्मकांडो का प्रबल समर्थन करते हुए प्राचीन भारत के आदर्शों तथा परंपराओं को पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। उन्होंने आर्य समाज और ब्रह्य समाज के विपरीत मूर्तिपूजा का समर्थन किया। उन्होंने सती प्रथा को भी उस अवस्था में न्यायोचित बताया, यदि विधवा स्वेच्छा से सती होना पसंद करती हो। उन्होंने बनारस में सेंट्रल (केन्द्रीय विद्यालय) स्कूल की स्थापना की। आगे चलकर यह विद्यालय महाविद्यालय में बदल गया और बाद में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के रूप में परिणत हो गया। रामकृष्ण मिशन की तरह ही इस संस्था के अनुयायियों का भी विश्वास है कि सभी धर्म सच्चे हैं और सबमें मौलिक एकता है। इसके अनुयायी जाति, धर्म या वर्ण के आधार पर किसी प्रकार का भेदभाव नहीं करते। चूँकि यह आंदोलन प्राचीन भारतीय संस्कृति और सभ्यता का समर्थन करता था, इसलिए शीघ्र ही बहुत लोकप्रिय हो गया। इस आंदोलन का व्यापक प्रभाव दक्षिण भारत के सामाजिक तथा धार्मिक जीवन पर पड़ा है।

इस प्रकार, धर्म और समाज सुधार के आंदोलन में डॉ. एनी बेसेंट और उनकी थियोसोफिकल सोसायटी का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। भारत के सामाजिक तथा धार्मिक जीवन पर इस आंदोलन का व्यापक प्रभाव पड़ा। आगे चलकर श्रीमती बेसेंट ने होमरूल आंदोलन का प्रारंभ किया जिसका भारत के राष्ट्रीय सामाजिक और धार्मिक जागरण में महत्वपूर्ण स्थान है। श्रीमती बेसेंट ने 1914 ई. में एक साप्ताहिक समाचार-पत्र ’द (यह) कॉमन (सामान्य) बिल (विधेयक)’ प्रारंभ किया। कुछ ही दिनों बाद उन्होंने एक दैनिक पत्र ’मद्रास स्टैंडर्ड’ (मानक) खरीद लिया और बाद में उसका नाम बदलकर ’न्यू (नया) इंडिया’ (भारत) रख दिया। अपने विभिन्न लेखों दव्ारा उन्होंने भारत की स्वतंत्रता के लिए अपना विचार व्यक्त किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो हिस्से जिनके नेता बाल गंगाधर तिलक एवं गोपालकृष्ण गोखले थे, के एकीकरण में उनका काफी योगदान रहा। उन्होंने ’ऑल इंडिया (पूरे भारत) होमरूल लीग (संघ)’ की स्थापना 1916 ई. में की। 1917 ई. में उन्हें भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का अध्यक्ष चुना गया। उनके संबंध में जवाहरलाल नेहरू ने लिखा है, ”वह मेरी और मुझसे पहले की पीढ़ी की एक विलक्षण विभूति थीं जिन्होंने हमें बहुत अधिक प्रभावित किया। निस्संदेह भारत के स्वाधीनता संग्राम मेें उन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।”